साथियों! आप सोचते हैं कि आप के लोकसभा चुनाव लड़ने से बी जे पी को नुकसान होगा! सवाल यह है कि आप के कितने विधायक 500 से अधिक मतों से चुनाव जीते हैं? लोकसभा चुनावों में हार जीत का अंतर हजारों वोटों के करीब होता है। फिर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा और पंजाब की सियासत में अगड़ा, पिछड़ा, हिन्दू, मुसलमान, आरक्षण और गैर आरक्षण के आधार पर ही वोटिंग होती है। इसका क्या होगा? मायावती के एक भी दलित मतदाता कम नहीं हुए हैं। मुसलमान तीन खेमों में वोट देंगे। पहला बड़ा खेमा कांग्रेस के साथ खड़ा होगा। सपा के मुस्लिम प्रत्याशियों को मुसलमानों का वोट मिलेगा। बसपा के भी मुस्लिम उम्मीदवारों को मुस्लिम मतदाताओं का वोट मिलेगा। इस तरह दलित मतदाताओं का वोट पाकर बसपा भी २० से ३० सीटों पर चुनाव जीत जायेगी। बिहार में भी नितीश पर मुसलमान कितना भरोसा करेंगे, यह आने वाला वक्त ही बतलायेगा। यदि मुस्लिम बिरादरी के मतदाता बिखरे तो इसका सीधा फ़ायदा बी जे पी को होने जा रहा है।
Tuesday, 31 December 2013
Friday, 27 December 2013
आप सरकार बनाएगी। मतलब सादगी में सरकार बनेगी। सादगी में सत्ता सुख और भी अधिक उन्मादकारी होता है। सवाल देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को नौकरशाही से मुक्ति दिलाने का है। जितना गम्भीर सवाल राजनीति के अपराधीकरण रोकने का है उतना ही गम्भीर सवाल सियासत के नौकरशाही मुक्त होने का भी है। अपराधी और उच्च नौकरशाह के रूप में सत्ता सुख भोग चुके लोग भी राजनीति के लिए आतुर हैं। दोनों के पास नंबर दो का पैसा है।भारतीय राजनीति नंबर दो के पैसे को नंबर एक में रूपांतरित करती है।
सुलगते सवाल-
क्या चाटुकारों को प्रबुद्धजन की श्रेणी में शामिल किया जा सकता है? चाटुकारों से समाज का कौन सा हित सम्भव है? इसके अलावा उनका कितना दोष है जो ज्ञानी-विज्ञानी होते हुए भी चाटुकारों को ही तरजीह देते हैं? क्या तेल खाने और खिलाने वाले से समाज का पतन नहीं होता? सामाजिक-सांस्कृतिकशुचिता प्रभावित नहीं होती? भारतीय विश्ववविद्यालयों में अधिकाँश वी सी चाटुकार और सत्ता के दलाल ही नहीं काबिज़ हैं? क्या देश के अधिकाँश विश्वविद्यालयों के डीन और विभागाध्यक्ष कुलपति चमचई नहीं करते?
Wednesday, 25 December 2013
इधर भी नजर करें-
चाटुकारिता भी हद दर्जे की कला है। जो जितना बड़ा चाटुकार, वह उतना ही बड़ा साहित्यकार, पत्रकार, कला मर्मज्ञ, जनसेवक, समाजसेवक और न जाने क्या क्या है। भदेस भाषा में चाटुकारों को तेलू के नाम से नवाजा जाता है। दुर्भाग्य से इतिहास भी तेलू का, तेलू द्वारा और तेल मारने के लिए लिखा जाने वाला एक दस्तावेज मात्र है।
Thursday, 19 December 2013
Monday, 9 December 2013
दिल्ली ब्यूरोक्रेसी की दोहरी मार झेलेगी-
दिल्ली दिलवालों की न होकर उच्च नौकर शाहों की बन चुकी है। प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह साहब पूर्व में उच्च नौकरशाही के अंग रह चुके हैं। अब पूर्व में उच्च नौकरशाही से ताल्लुक रखने वाले अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री की दौड़ में हैं। उनकी पत्नी अभी भी उच्च नौकरशाही की अंग हैं। दिल्ली की झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाला आम आदमी एक बार फिर छला गया। दोबारा चुनाव चुनाव हुए तो इसकी सजा आम आदमी ही भुगतेगा। दिल्ली की जनता ने यदि मिला जुला जनादेश दिया है तो सरकार भी मिली जुली ही बननी चाहिए। असल में जनादेश के विरुद्ध सरकार न बनने देना भी आप की तानाशाही की प्रवृत्ति को प्रदर्शित करती है। यदि आप यह कहते हैं कि दिल्ली में मोदी का जादू नहीं चला तो आप गलत हैं क्योंकि मोदी न होते तो आज आम आदमी पार्टी के भ्रम जाल में फंसकर जनता उन्हें 40 से 45 सीटों पर विजयी बना देती। वैसे आज़ाद भारत में अभिजात्यों ने हमेशा आम आदमी को छला है।
दिल्ली दिलवालों की न होकर उच्च नौकर शाहों की बन चुकी है। प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह साहब पूर्व में उच्च नौकरशाही के अंग रह चुके हैं। अब पूर्व में उच्च नौकरशाही से ताल्लुक रखने वाले अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री की दौड़ में हैं। उनकी पत्नी अभी भी उच्च नौकरशाही की अंग हैं। दिल्ली की झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाला आम आदमी एक बार फिर छला गया। दोबारा चुनाव चुनाव हुए तो इसकी सजा आम आदमी ही भुगतेगा। दिल्ली की जनता ने यदि मिला जुला जनादेश दिया है तो सरकार भी मिली जुली ही बननी चाहिए। असल में जनादेश के विरुद्ध सरकार न बनने देना भी आप की तानाशाही की प्रवृत्ति को प्रदर्शित करती है। यदि आप यह कहते हैं कि दिल्ली में मोदी का जादू नहीं चला तो आप गलत हैं क्योंकि मोदी न होते तो आज आम आदमी पार्टी के भ्रम जाल में फंसकर जनता उन्हें 40 से 45 सीटों पर विजयी बना देती। वैसे आज़ाद भारत में अभिजात्यों ने हमेशा आम आदमी को छला है।
Saturday, 30 November 2013
दीपक की लौ
दीपक की लौ
नगर के सभी मकानों में
बेहद खूबसूरती बिखेर रही थी
अगली सुबह टूटे हुए थे दीये
बच्चे तराजू बनाकर खेल चुके थे दीये
तराजू का खेल
तो बच्चे सीख रहे थे
उन दीयों से व्यापार।
अगले दिन वे दीये खंडित थे
हर उजाले के बाद
दीपक की तरह बुझता है सच!
Tuesday, 26 November 2013
Friday, 15 November 2013
देश के युवाओं को काम चाहिए
देश के युवाओं को काम चाहिए-
भारतीय सियासत मुफ्तखोरी सिखलाती है। सियासी दल आम जनता से वादे करते हैं कि हमारी सरकार बनने पर राज्य अथवा राष्ट्र में मुफ्त में अनाज वितरित होंगे। इस मुल्क की अवाम को "मुफ्तखोरी" नहीं बल्कि काम चाहिए। राष्ट्र की वर्त्तमान राजनीति को "कर्मशील भारत" का स्वप्न देखना चाहिए।कर्मशील स्वप्न से ही नक्सलवाद जैसी कई समस्याओं का अंत सम्भव है।
Thursday, 24 October 2013
आज़ादी के बाद
आज़ादी के बाद क्या मिला? वंशानुगत शासन, पीढ़ी दर पीढ़ी क़र्ज़ चुकाते अभिशप्त किसान, बेरोज़गार युवक, साम्प्रदायिक उन्माद का दंश झेलते हिन्दू और मुसलमान, नौकरशाह के रूप में शोषक बन बैठे अपने ही बीच के आम; अब ख़ास भारतीय , सत्ता सुख के लिए सामाजिक विध्वंशक सियासी दल! सोचिये साथियों सोचिये!
Wednesday, 23 October 2013
तानाशाही और लोकतंत्र-
हम लोग पहले ही उत्साहित हो जाते हैं। अब देखिये नारा दिया रहा है कि मोदी लाओ देश बचाओ। ……… पिछली बार था- भाजपा लाओ देश बचाओ। ………. सवाल यह है कि क्या एक व्यक्ति के बहाने देश में प्रजातांत्रिक तानाशाह को नहीं तलाशा जा रहा है! तानाशाही के दौर में एक झूठ को दस बार बोला जाता है ताकि वह सच प्रतीत हो। Tuesday, 22 October 2013
रहस्यों में हैं भारत भाग्य विधाता-
मुझे नहीं लगता कि मोदी नए भारत भाग्य विधाता होंगे। वह लोक तंत्र जो पैसे के जोर पर चलता हो, जहां ग्राम प्रधानी से लेकर सांसदी तक के निर्वाचन में शराब की निर्णायक भूमिका हो; उस लोक तंत्र का भविष्य आसानी से आंका जा सकता है। सवाल मोदी की सभा में भव्य मंच का है। फ़िल्मी हीरो की तरह उनकी सभाओं के लिए टिकट लगते हैं। सोच लीजिए पद अर्जित करने के पहले ही यह हाल है जब वे प्रधानमंत्री बन जायेंगे तब न जाने किस किस पर टिकट लगेगा। साथियों! आप बता सकते हैं कि चुनावी जन सभाओं के पूर्व स्वतंत्र भारत के इतिहास में प्रधान मंत्री पद के किसी उम्मीदवार की किसी भी जन सभा में किसी भी तरह का टिकट लगाया गया हो।Sunday, 15 September 2013
Friday, 13 September 2013
हिन्दी दिवस-
हिन्दी दिवस-
सांस्कृतिक रूप से समृद्ध हिन्दी के शव दफ़न की तैयारी शुरू हो चुकी है। उच्च नौकरशाही पर काबिज इंडियन हिन्दी से मीलों दूर होते जा रहे हैं। हिन्दी वाले हिन्दी हिन्दी चिल्लाकर मलाई काट रहे हैं। धीरे धीरे हिन्दी के शब्दों को अंग्रेजी के शब्दों द्वारा विस्थापित किया जा रहा है। सवाल सिर्फ हिन्दी को बचाने का ही नहीं है सवाल हिन्दी के साथ प्रत्येक भारतीय भाषाओं की अस्मिता को संरक्षित रखने का है। जाहिर है यह काम सरकार का नहीं वरन एक अरब से अधिक भारतीय जन सैलाब का है।
सांस्कृतिक रूप से समृद्ध हिन्दी के शव दफ़न की तैयारी शुरू हो चुकी है। उच्च नौकरशाही पर काबिज इंडियन हिन्दी से मीलों दूर होते जा रहे हैं। हिन्दी वाले हिन्दी हिन्दी चिल्लाकर मलाई काट रहे हैं। धीरे धीरे हिन्दी के शब्दों को अंग्रेजी के शब्दों द्वारा विस्थापित किया जा रहा है। सवाल सिर्फ हिन्दी को बचाने का ही नहीं है सवाल हिन्दी के साथ प्रत्येक भारतीय भाषाओं की अस्मिता को संरक्षित रखने का है। जाहिर है यह काम सरकार का नहीं वरन एक अरब से अधिक भारतीय जन सैलाब का है।
Tuesday, 10 September 2013
Monday, 9 September 2013
मर रही है जनता-
रूपया जब टूट रहा था तब मुज्जफर नगर में दंगे की रूप रेखा तय हो रही थी। जब देश की जनता महंगाई के कारण बिलख रही थी तब भावनाओं को भड़काया जा रहा था। अब भयावह परिणाम सबके सामने है। जब सांसदों के हित का मसला होता है तब संसद में ध्वनि मत से प्रस्ताव पारित होते हैं जब मुल्क की अवाम का मसला होता है तब संसद नहीं चलेगी। समस्या यह है कि जनता चुने किसे। बेवफाई कई जनप्रतिनिधियों की फितरत बन चुकी है चालबाज़ आशिक की तरह। Sunday, 8 September 2013
ऐसे हो उच्च शिक्षा में शिक्षक चयन-
आचार्यों की प्रतिभा पर तनिक भी संदेह नहीं है। मसला विभाग में अयोग्य उत्तराधिकारियों के चयन का है। केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के लिए यूनियन पब्लिक एजुकेशन सर्विस का प्रावधान किया जाना चाहिए। इसमें प्रशासनिक और शैक्षणिक अनुभागों का गठन कर विश्वविद्यालय के लिए क्रमशः प्रशासनिक अधिकारी मसलन रजिस्ट्रार इत्यादि और असिस्टैंट प्रोफ़ेसर इत्यादि को चयनित किया जाना चाहिए, ताकि आचार्यों की मठाधीशी टूटे। Friday, 6 September 2013
साथियों! एक पोस्ट पर दुबारा- मैंने सभी प्रोफेसरों की बात न कहकर कुछ की बात की है। आप जे एन यू मत जाएँ। अपने विभाग में देखिये और खोजिये। सच बतलाइयेगा। यू पी एस सी को छोड़ कहीं भी चयन ज्ञान और तर्क आधारित नहीं होता है। ढूंढिए आप! ढूँढते रह जायेंगे। विश्वविद्यालयों में तो चयन का तरीका ही गलत है। जिस उच्चतर सेवा की बात आप कर रहे हैं वह महाविद्यालयों में शिक्षकों का चयन करता है न कि विश्वविद्यालयों में। सूत्र बतलाते हैं कि वहां भी प्रवक्ता के पद बिकते हैं और कुछ प्रोफ़ेसर साब लोग महज टी ए-डी ए और सम्बन्ध बनाकर एक दो चेलों को फिट करने जाते हैं। दूसरे विश्वविद्यालय में चयन का तरीका क्या है? आप मुझसे बेहतर जानते हैं। बतलाइये। कागजी नहीं प्रैक्टिकल वाला। उत्तर प्रदेश के विश्विद्यालयों के कई शिक्षक शोध छात्रों से घर की सब्जी तक ढुलवाते हैं। उत्तर प्रदेश में कई शिक्षक अधिकाँश शोध छात्रों को खूनी आसूं तक गिरवा लेते हैं। संयोग से दिल्ली में ऐसा नहीं है। लेकिन दिल्ली में जो है वह यहाँ नहीं हैं। सवाल यह है कि क्यों नहीं यू जी सी एक अध्यापक परीक्षा ले कर साक्षात्कार द्वारा शिक्षक चयन करता। नेट के बाद भी। गुरुवर बातें बहुत हैं। बातों का क्या? क्यों असिस्टैंट प्रोफ़ेसर से एसोसिएट प्रोफ़ेसर और प्रोफ़ेसर पद पर पदोन्नति के लिए लिखित परीक्षाएं आयोजित नहीं की जातीं!
सर! नाम न गिनवाइये। लेकिन इतना जरुर कहना चाहूँगा कि काश नामवर जी जैसा चयन अब के चयन समिति में शामिल प्रोफ़ेसर कर पाते! हिंदी का कोई प्रोफ़ेसर किसी प्रोफ़ेसर का दामाद है तो कोई किसी का बेटा। कोई किसी की बेटी तो कोई किसी की बीबी। मामला आपसी अनैतिक खरीद फ़रोख्त का है। सब लगे बझे हैं। किसने अधिकार दिया आप को कि आप आने वाली नस्लों को रीढ़ विहीन बना डालें। दुर्भाग्य से देश के अधिकाँश विश्वविद्यालय उपाधियाँ वितरित करने वाली फैक्ट्री के रूप में तब्दील हो चुके हैं। यह भी हकीकत है कि दुनिया के २०० विश्वविद्यालयों में आप और हम कहीं भी नहीं हैं।
Thursday, 5 September 2013
शिक्षक और पंडा-
फेस बुक पर जब फर्जी क्रांतिकारियों को देखता हूँ तब उन पर तरस आती है। खासकर कुछ प्रोफेसरों को जिनकी औकात विश्वविद्यालय और सम्बद्ध कालेजों में शिक्षक चयन के मुद्दे पर एक कठपुतली भर से अधिक कुछ नहीं होती। इस तरह के कई क्रांतिकारी हैं जिन्हें सिर्फ क्रांति जगत का पंडा भर कहा जा सकता है। वही बनारसी पंडों की तरह। Wednesday, 4 September 2013
आदरणीय शिक्षकों को प्रणाम-
आदरणीय शिक्षकों को प्रणाम-
आज शिक्षक दिवस है। आज का दिन महान शिक्षक राधा कृष्णन का जन्म दिवस है। महान शिक्षक वे होते हैं जो अपनी प्रतिभा को विद्यार्थियों में अंकुरित कर दें। कोई जरुरी नहीं कि कक्षा में पढ़ने और पढ़ाने के दौरान ही गुरु शिष्य का रागात्मक प्रेम पुष्पित-पल्लवित हो। जिन शिक्षकों से शिक्षा मिली उनमें प्रो पुरुषोत्तम अग्रवाल सर की शिक्षण शैली अद्भुत रही। डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी सर के घर पर साहित्यिक संस्कार मिला। डॉ वेद प्रकाश सर से मित्रवत गुरु शिष्य सम्बन्ध बना। डॉ आशुतोष कुमार सर से कोई विद्यार्थियों की मदद करना सीख सकता है। फेस बुक पर आदरणीय मोहन श्रोत्रिय सर से मुलाक़ात हुई। पत्रकारिता की बारीकियों को अग्रज अम्बरीश कुमार सर ने खबर लिखने के दौरान बतलाया। सभी को प्रणाम।
Tuesday, 3 September 2013
मनुष्यत्व बोध से मजबूत होंगी महिलायें
मनुष्यत्व बोध से मजबूत होंगी महिलायें-
नाजुक बनने से बेहतर है कि महिलायें बलिष्ठ शरीर बनाने का प्रयास करें। माशर्ल आर्ट, खेल कूद, दौड़ कसरत, सैनिक ट्रेनिंग बालिकाओं के विद्यालय में अनिवार्य कर दिया जाए। स्त्रियों को शरीर, बुद्धि और आर्थिक दिशा में समन्वित रूप से शक्तिशाली बनाने का प्रयास किया चाहिए। वीनस विलियम्स और सेरेना विलियम्स बहनों को देखिये तो सही। है किसी में दम कि उन जैसी लड़कियों के साथ कोई जबरिया कर दे। देंगी कनपटी पर घुमा के। बात यह है कि लड़कियों को स्त्री बोध से मुक्ति दिलवानी होगी। इसके साथ ही पुरुषों को भी पुरुषत्व अभिमान से मुक्त होना होगा। बलिष्ठ समाज की संकल्पना हेतु समाज में मनुष्यत्व बोध को जागृत करना होगा।
नाजुक बनने से बेहतर है कि महिलायें बलिष्ठ शरीर बनाने का प्रयास करें। माशर्ल आर्ट, खेल कूद, दौड़ कसरत, सैनिक ट्रेनिंग बालिकाओं के विद्यालय में अनिवार्य कर दिया जाए। स्त्रियों को शरीर, बुद्धि और आर्थिक दिशा में समन्वित रूप से शक्तिशाली बनाने का प्रयास किया चाहिए। वीनस विलियम्स और सेरेना विलियम्स बहनों को देखिये तो सही। है किसी में दम कि उन जैसी लड़कियों के साथ कोई जबरिया कर दे। देंगी कनपटी पर घुमा के। बात यह है कि लड़कियों को स्त्री बोध से मुक्ति दिलवानी होगी। इसके साथ ही पुरुषों को भी पुरुषत्व अभिमान से मुक्त होना होगा। बलिष्ठ समाज की संकल्पना हेतु समाज में मनुष्यत्व बोध को जागृत करना होगा।
Monday, 2 September 2013
सर्वहारा का अस्तित्व खतरे में है
सर्वहारा का अस्तित्व खतरे में है-
इन दिनों चमचमाती कारों, आलीशान मकानों और अभिजात्यवर्गीय पहनावों में क्रान्ति की ज्वाला धधक रही है। प्रत्येक अभिजात्यवर्गीय इंसान सर्वहारा की लड़ाई लड़ने को व्यग्र है। सर्वहारा का अस्तित्व साहित्य में बिकाऊ माल के अलावा कुछ भी नहीं, वह पुरस्कार पाने के लिए साहित्यकारों को पुख्ता जमीन मुहैया कराता है। Sunday, 1 September 2013
गुरु-
पट्टू राम नाम का क्रान्ति पाठ पढ़ रहा था। क्रान्ति की ज्वाला धार्मिक, सांप्रदायिक और जातिवादी अवचेतन में गुरु के ह्रदय में धधक रही थी। गुरु दलित विमर्श में नए पट्टू राम गढ़ रहे थे जो जय भीम का सुग्गा पाठ पढ़ रहा था। गुरु प्रत्येक ब्राह्मण जाति को सशंकित मानसिकता के साथ देखते थे। उन्हें प्रत्येक चाणक्य वंशीय चन्द्रगुप्त कुलीन नजर आता था जैसे कि वह नन्द वंश का नाश करने के लिए पढ़ रहा हो। एक ओर पंडों का जोर दूसरी तरफ दलितों की तलवारें खिंची रहती थीं। पंडा बनारस से राम रटु राम रटु राम रटु जिह्वा का भोजपुरिया पाठ पढ़ कर आया था। विश्वविद्यालय में गुरु अपने पालतू तोताओं को राम रटु राम रटु का पाठ पढ़ाने के लिए छोड़ गए। सुना है "वहां" अब रीढ़ विहीन नस्लें जन्म ले रही हैं।
पट्टू राम नाम का क्रान्ति पाठ पढ़ रहा था। क्रान्ति की ज्वाला धार्मिक, सांप्रदायिक और जातिवादी अवचेतन में गुरु के ह्रदय में धधक रही थी। गुरु दलित विमर्श में नए पट्टू राम गढ़ रहे थे जो जय भीम का सुग्गा पाठ पढ़ रहा था। गुरु प्रत्येक ब्राह्मण जाति को सशंकित मानसिकता के साथ देखते थे। उन्हें प्रत्येक चाणक्य वंशीय चन्द्रगुप्त कुलीन नजर आता था जैसे कि वह नन्द वंश का नाश करने के लिए पढ़ रहा हो। एक ओर पंडों का जोर दूसरी तरफ दलितों की तलवारें खिंची रहती थीं। पंडा बनारस से राम रटु राम रटु राम रटु जिह्वा का भोजपुरिया पाठ पढ़ कर आया था। विश्वविद्यालय में गुरु अपने पालतू तोताओं को राम रटु राम रटु का पाठ पढ़ाने के लिए छोड़ गए। सुना है "वहां" अब रीढ़ विहीन नस्लें जन्म ले रही हैं।
गुरु-
पट्टू राम नाम का क्रान्ति पाठ पढ़ रहा था। क्रान्ति की ज्वाला धार्मिक, सांप्रदायिक और जातिवादी अवचेतन में गुरु के ह्रदय में धधक रही थी। गुरु दलित विमर्श में नए पट्टू राम गढ़ रहे थे जो जय भीम का सुग्गा पाठ पढ़ रहा था। गुरु प्रत्येक ब्राह्मण जाति को दलित मानसिकता से देखते थे। एक ओर पंडों का जोर दूसरी तरफ दलितों की तलवारें खिंची रहती थीं। पंडा बनारस से राम रटु राम रटु राम रटु जिह्वा का भोजपुरिया पाठ पढ़ कर आया था। विश्वविद्यालय में गुरु अपने पालतू तोताओं को राम रटु राम रटु का पाठ पढ़ाने के लिए छोड़ गए। वहां अब रीढ़ विहीन नस्लें जन्म ले रही हैं।
पट्टू राम नाम का क्रान्ति पाठ पढ़ रहा था। क्रान्ति की ज्वाला धार्मिक, सांप्रदायिक और जातिवादी अवचेतन में गुरु के ह्रदय में धधक रही थी। गुरु दलित विमर्श में नए पट्टू राम गढ़ रहे थे जो जय भीम का सुग्गा पाठ पढ़ रहा था। गुरु प्रत्येक ब्राह्मण जाति को दलित मानसिकता से देखते थे। एक ओर पंडों का जोर दूसरी तरफ दलितों की तलवारें खिंची रहती थीं। पंडा बनारस से राम रटु राम रटु राम रटु जिह्वा का भोजपुरिया पाठ पढ़ कर आया था। विश्वविद्यालय में गुरु अपने पालतू तोताओं को राम रटु राम रटु का पाठ पढ़ाने के लिए छोड़ गए। वहां अब रीढ़ विहीन नस्लें जन्म ले रही हैं।
Saturday, 31 August 2013
धर्म के मर्म को समझिए
धर्म के मर्म को समझिए-
मेरे ख़याल से देश का एक नागरिक पहले धार्मिक होता है और तब देशभक्त। यदि देश की 95 प्रतिशत हिन्दू धर्म के अनुयायी पहले हिन्दू रहें और 95 प्रतिशत मुस्लिम अनिवार्य ढंग से मुस्लिम रहें तब कहीं विवाद है ही नहीं। दिक्कत यह है कि देश की 95 प्रतिशत आबादी न हिन्दू है और न मुसलमान। वह परिधानों में लिपटा हुआ चलता हुआ शव है। काश शिव बन पाते। विवाद और उन्माद तब है जब धर्म का इस्तेमाल व्यक्ति,समूह और दल राजनीति के लिए करते हैं। जब अनुयायियों का उद्देश्य सियासी दूकान चमकाकर सत्ता सुख हासिल करना हो जाए तब बेड़ा गर्क समझिये। धर्म कहीं भी तोड़ फोड़ की बात नहीं करता बल्कि भारत में सदियों से इंसानियत को बचाए रखने में वेद, पुराण, रामायण, गीता और कुरआन ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।
मेरे ख़याल से देश का एक नागरिक पहले धार्मिक होता है और तब देशभक्त। यदि देश की 95 प्रतिशत हिन्दू धर्म के अनुयायी पहले हिन्दू रहें और 95 प्रतिशत मुस्लिम अनिवार्य ढंग से मुस्लिम रहें तब कहीं विवाद है ही नहीं। दिक्कत यह है कि देश की 95 प्रतिशत आबादी न हिन्दू है और न मुसलमान। वह परिधानों में लिपटा हुआ चलता हुआ शव है। काश शिव बन पाते। विवाद और उन्माद तब है जब धर्म का इस्तेमाल व्यक्ति,समूह और दल राजनीति के लिए करते हैं। जब अनुयायियों का उद्देश्य सियासी दूकान चमकाकर सत्ता सुख हासिल करना हो जाए तब बेड़ा गर्क समझिये। धर्म कहीं भी तोड़ फोड़ की बात नहीं करता बल्कि भारत में सदियों से इंसानियत को बचाए रखने में वेद, पुराण, रामायण, गीता और कुरआन ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।
सफलता बनाम असफलता-
जिसके पास कोई सिद्धांत नहीं है उसकी सफलता सुनिश्चित है क्योंकि उसका साध्य सफलता है न कि कोई सिद्धांत। वह प्रत्येक उस बात से समझौता कर लेगा जिससे सफलता मिल सकती हो। इसके विपरीत सिद्धांतवादी का साध्य उसके सिद्धांत अनुरक्षण है सफलता नहीं। अतः सिद्धांतवादी व्यक्ति के सफल होने का प्रश्न ही नहीं उठता।
जिसके पास कोई सिद्धांत नहीं है उसकी सफलता सुनिश्चित है क्योंकि उसका साध्य सफलता है न कि कोई सिद्धांत। वह प्रत्येक उस बात से समझौता कर लेगा जिससे सफलता मिल सकती हो। इसके विपरीत सिद्धांतवादी का साध्य उसके सिद्धांत अनुरक्षण है सफलता नहीं। अतः सिद्धांतवादी व्यक्ति के सफल होने का प्रश्न ही नहीं उठता।
Thursday, 29 August 2013
ऐसे बच सकता है देश का सोना-
भारतीय लोकतंत्र में सर्वाधिक पवित्र स्थल है-"संसद"। इसलिए इस स्थल में बैठने वाले सभी मंत्री और सांसद देश हित में अपने अपने घरों में रखे हुए सोने को राष्ट्र-कोष में दान कर सकते हैं। इसके बाद भारतीय लोकतंत्र की मजबूत रीढ़ उच्च नौकरशाह हैं। राष्ट्र हित के लिए अपने अपने घरों में रखे हुए आधे सोने को वे भी राष्ट्र-कोष में अर्पित कर सकते हैं। इसके अलावा भारत के सभी 28 राज्यों के मुख्यमंत्री और सभी प्रदेशों के मंत्री भी मुहिम में आगे आ सकते हैं। वे भी कंगाल हो चले मुद्रा कोष को भरने का प्रयास कर सकते हैं। भारतीय लोकतंत्र के दो संस्करणों-व्यवस्थापिका और कार्यपालिका के लोग प्रथम पंक्ति में शामिल होकर देश के संकट को टाल सकते है।
Wednesday, 28 August 2013
तड़प रही है सोने की चिड़िया!
सोने की चिड़िया तड़प रही है। आज़ादी के बाद देश को अपनों ने ही लूटा है। ज़रा तलाश कीजिए अपने मुल्क को। दिखा कहीं देश। नहीं न। इस समय देश चीन, पाकिस्तान के साथ म्यांमार भी अपने देश में घुसपैठ की कोशिश कर रहा है। लाचारगी की हालत में हैं हम। देश विकल्पहीनता की स्थिति में है। इस देश की सेना और जनता किंकर्तव्यविमूढ़ है। दोनों देश के रहनुमाओं अर्थात नेताओं के भरोसे हैं। हमारे देश के सोने को गिरवी रखने की तैयारी चल रही है। सोने की कीमत पर खाद्य सुरक्षा की तैयारी है। देश के भविष्य अर्थात बच्चे दिमागी बुखार से मर रहे हैं। पूरी भारत सरकार चार्वाक दर्शन की अनुगामी बन चुकी है- यावत् जीवेत सुखं जीवेत, ऋणं कृत्वा घृतं पीवेत। सौ में निन्यानबे बेईमान फिर भी भारत देश महान बना हुआ है । एक बात कहूं- "जब भारत गुलाम था तब अंग्रेज राष्ट्र भावना के तहत अपने देश को लूट रहे थे, उनकी लूट एक देश इंग्लैण्ड के हित के लिए थी लेकिन आज अपने ही बेटे भारत माता का चीर हरण कर रहे हैं। भारत के जय चंदों की लूट व्यक्तिगत भण्डार के लिए है। सोना विदेश जाने की सुगबुगाहट से एक बार फिर सोने की चिड़िया तड़प रही है। चलिए हम सब मर्सिया गाने की तैयारी करते हैं!
सोने की चिड़िया तड़प रही है। आज़ादी के बाद देश को अपनों ने ही लूटा है। ज़रा तलाश कीजिए अपने मुल्क को। दिखा कहीं देश। नहीं न। इस समय देश चीन, पाकिस्तान के साथ म्यांमार भी अपने देश में घुसपैठ की कोशिश कर रहा है। लाचारगी की हालत में हैं हम। देश विकल्पहीनता की स्थिति में है। इस देश की सेना और जनता किंकर्तव्यविमूढ़ है। दोनों देश के रहनुमाओं अर्थात नेताओं के भरोसे हैं। हमारे देश के सोने को गिरवी रखने की तैयारी चल रही है। सोने की कीमत पर खाद्य सुरक्षा की तैयारी है। देश के भविष्य अर्थात बच्चे दिमागी बुखार से मर रहे हैं। पूरी भारत सरकार चार्वाक दर्शन की अनुगामी बन चुकी है- यावत् जीवेत सुखं जीवेत, ऋणं कृत्वा घृतं पीवेत। सौ में निन्यानबे बेईमान फिर भी भारत देश महान बना हुआ है । एक बात कहूं- "जब भारत गुलाम था तब अंग्रेज राष्ट्र भावना के तहत अपने देश को लूट रहे थे, उनकी लूट एक देश इंग्लैण्ड के हित के लिए थी लेकिन आज अपने ही बेटे भारत माता का चीर हरण कर रहे हैं। भारत के जय चंदों की लूट व्यक्तिगत भण्डार के लिए है। सोना विदेश जाने की सुगबुगाहट से एक बार फिर सोने की चिड़िया तड़प रही है। चलिए हम सब मर्सिया गाने की तैयारी करते हैं!
Tuesday, 20 August 2013
Monday, 19 August 2013
Friday, 16 August 2013
अभिव्यक्ति की आज़ादी पर पहरा-
उत्तर प्रदेश के एक जिम्मेदार आला अफसर के एक फरमान के मुताबिक़ अब लोग अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर किसी पर व्यक्तिगत प्रहार नहीं कर पाएंगे। इस तरह अब व्यक्तिगत बनाम सामूहिक का द्वन्द देखने को मिलेगा। प्राथमिक स्तर पर प्रत्येक चीजें व्यक्तिगत ही होती हैं। राजनीति के अखाड़े के निर्वाचित विधायक अथवा सांसद सभी व्यक्ति हैं। साथियों! जब मुल्क की सरकारें सोशल नेटवर्किंग साइटों से दहशतज़दा हो जाएँ तब आप समझ लीजिए कि मुल्क की तकदीर बदलने वाली है! सवाल उठता है कि जिस पुलिस का गठन आम जनता के हित के लिए किया गया है उस पुलिस को सरकारें अपने हित के लिए ही हमेशा क्यों प्रयुक्त करती रही हैं ? क्यों लोकतंत्र में एक एक वोट पर भीड़ में पुलिसिया डंडे बरसाये जाते हैं ? और भी बहुत से सवाल।
सच बताऊँ-
लोकतांत्रिक पर्वों का मतलब
देश की आम जनता के एक हाथ में लड्डू है!
सिर पर दाल रोटी का बोझ
पैर- पीठ पर डंडा!
और गले में फांसी का फंदा!
एक भारतीय होने के नाते
प्रेम से बोलो
जय हिन्द
जय भारत
भारत माता की जय।
बापू अमर रहें!
Monday, 12 August 2013
अस्त होता देश- भारत इस समय संक्रमण के दौर में है। तमाम विचारधारों के बीच रगड़ खाती देश की अवसरवादी राजनीति और नौकरशाही लूट तंत्र में तब्दील होती जा रही है। भारत के संभावित भविष्य मोदी की अमेरिका परस्ती उनके नारों में साफ़ झलकती है। पूत के पाँव पालने में ही, वाली कहावत नरेन्द्र मोदी पर सौ फीसदी फिट बैठती है। तब एक सवाल दिल और दिमाग को झकझोरता है ----- फिर जनता किसे चुने? बहुत से लोग सोचते होंगे कि मोदी नया भारत बनायेंगे? कांग्रेस फिर आयेगी, तीसरा मोर्चा मुल्क की तकदीर बदल देगा? यदि हम और आप ऐसा सोचते हैं तब हम और आप दोनों गलत हैं। सवाल इस मुल्क के अधिकाँश व्यक्तियों के भीतर पनप रही मक्कारी और ऐय्यारी का है। टी वी खोलिए तो लगता है कि पूरा देश खुश है। गाँवों में जाइये तो आपको अलग किस्म की दुनिया दिखलाई देगी। आप देखेंगे कि इस देश की 75 प्रतिशत आबादी को जीवंन व्यतीत करने के लिए न्यूनतम सुविधाएं भी नहीं हासिल हैं। इसके अलावा सवाल व्यक्ति की सोच का है। प्रत्येक दशा में इस देश के मतदाताओं को अपनी सोच को परिवर्तित करना होगा। साथियों! जाति, धर्म, सम्प्रदाय और क्षेत्र और अनेकानेक वादों की मानसिकता से ऊपर उठकर पहले गंभीरता पूर्वक सोचना शुरू कीजिये फिर वोट दीजिए। नेताओं का क्या? उन्हें तो हर हाल में सत्ता सुख चाहिये। सवाल यह भी है कि हमारे और आपके बीच का निर्वाचित नेता
अस्त होता देश-
भारत इस समय संक्रमण के दौर में है। तमाम विचारधारों के बीच रगड़ खाती देश की अवसरवादी राजनीति और नौकरशाही लूट तंत्र में तब्दील होती जा रही है। भारत के संभावित भविष्य मोदी की अमेरिका परस्ती उनके नारों में साफ़ झलकती है। पूत के पाँव पालने में ही, वाली कहावत नरेन्द्र मोदी पर सौ फीसदी फिट बैठती है। तब एक सवाल दिल और दिमाग को झकझोरता है ----- फिर जनता किसे चुने? बहुत से लोग सोचते होंगे कि मोदी नया भारत बनायेंगे? कांग्रेस फिर आयेगी, तीसरा मोर्चा मुल्क की तकदीर बदल देगा? यदि हम और आप ऐसा सोचते हैं तब हम और आप दोनों गलत हैं। सवाल इस मुल्क के अधिकाँश व्यक्तियों के भीतर पनप रही मक्कारी और ऐय्यारी का है। टी वी खोलिए तो लगता है कि पूरा देश खुश है। गाँवों में जाइये तो आपको अलग किस्म की दुनिया दिखलाई देगी। आप देखेंगे कि इस देश की 75 प्रतिशत आबादी को जीवंन व्यतीत करने के लिए न्यूनतम सुविधाएं भी नहीं हासिल हैं। इसके अलावा सवाल व्यक्ति की सोच का है। प्रत्येक दशा में इस देश के मतदाताओं को अपनी सोच को परिवर्तित करना होगा। साथियों! जाति, धर्म, सम्प्रदाय और क्षेत्र और अनेकानेक वादों की मानसिकता से ऊपर उठकर पहले गंभीरता पूर्वक सोचना शुरू कीजिये फिर वोट दीजिए। नेताओं का क्या? उन्हें तो हर हाल में सत्ता सुख चाहिये। सवाल यह भी है कि हमारे और आपके बीच का निर्वाचित नेता चुनाव के बाद इतना मक्कार कैसे हो जाता है? कुछ तो है…. ज़रा बताइये क्या!
Thursday, 8 August 2013
Wednesday, 7 August 2013
Tuesday, 6 August 2013
Monday, 5 August 2013
Monday, 29 July 2013
Sunday, 16 June 2013
Saturday, 15 June 2013
Saturday, 8 June 2013
Friday, 17 May 2013
Friday, 26 April 2013
सामाजिक भागेदारी
सामाजिक भागेदारी-
औरतें अपनी शर्तों पर अपनी सामाजिक भागेदारी तय करें। माफ़ करिएगा मैम! कन्या भ्रूण हत्या में शामिल डाक्टर और नर्स एक महिला ही होती है। खुद के प्रति स्त्री प्रतिबद्धता का मुद्दा भी बेहद अहम् है। Wednesday, 24 April 2013
समान ड्रेस कोड
समान ड्रेस कोड-
भारत के सभी स्कूलों में समान ड्रेस कोड लागू किया जाए। सरकारी स्कूलों के बच्चों के समान ही निजी क्षेत्रों के स्कूली बच्चे एक समान ड्रेस पहनें। देखने में आता है कि स्कूलों में किशोर वय के छात्र और छात्रा ड्रेस तो पहनते हैं लेकिन कोचिंग सेंटर में वही बच्चे फैशन शो की तरह शिरकत करते है। इसलिए कोचिंग केन्द्रों में भी एक किस्म का स्कूली ड्रेस कोड लागू किया जाना निहायत जरुरी है। समान ड्रेस कोड लागू कर सभी वर्गों के विद्यार्थियों को समान अवसर का संवैधानिक अवसर भी प्रदान कर सकते हैं।
भारत के सभी स्कूलों में समान ड्रेस कोड लागू किया जाए। सरकारी स्कूलों के बच्चों के समान ही निजी क्षेत्रों के स्कूली बच्चे एक समान ड्रेस पहनें। देखने में आता है कि स्कूलों में किशोर वय के छात्र और छात्रा ड्रेस तो पहनते हैं लेकिन कोचिंग सेंटर में वही बच्चे फैशन शो की तरह शिरकत करते है। इसलिए कोचिंग केन्द्रों में भी एक किस्म का स्कूली ड्रेस कोड लागू किया जाना निहायत जरुरी है। समान ड्रेस कोड लागू कर सभी वर्गों के विद्यार्थियों को समान अवसर का संवैधानिक अवसर भी प्रदान कर सकते हैं।
Monday, 22 April 2013
ऐसे बदलेगी औरत
बेटी, बहन, माँ और पत्नी के रूपों में औरतों को स्नेह, सम्मान, प्रेम और स्वतन्त्रता समय की मांग है। बी पी एल से नीचे जिन्दगी बसर करने वाली देश की नब्बे प्रतिशत आम जनता हो अथवा छह प्रतिशत निम्न मध्यवर्ग हो याकि दो प्रतिशत की आबादी वाला मध्य मध्य वर्ग और 1.5 प्रतिशत उच्च मध्यवर्गीय जनता हो और 0.5 प्रतिशत उच्च वर्ग के लोग हों, सभी जगह स्त्रियों की समान दशा नहीं है। गाँवों में खुले में शौच के कारण आए दिन हिंसक वारदातें होती रहती हैं। स्कूलों अथवा देश के विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रम देश के भविष्य को भाग्यवादी बना रही है। नन्हीं परी और गुड़िया मेरी प्यारी गुड़िया जैसे पाठों को समाप्त कर झांसी की रानी जैसे पाठों को प्रत्येक कक्षाओं के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए। प्रारंभिक कक्षाओं से ही लड़कियों को जूडो और कराटे सिखलाकर आत्म रक्षा के गुर सिखलाए जाएं। स्कूलों और कालेजों में शिक्षकों की आधी संख्या महिलाओं की हो। देश के पुलिस थानों में महिला पुलिस की तैनाती भी जरुरी है। इसके अलावा जरुरी है कि देश की केंद्र अथवा राज्य सरकारों में मंत्रियों की आधी संख्या महिलाओं की हो। संघ लोक सेवा आयोग और राज्य लोक सेवा आयोग से चयनित होने वाले अफसरों में आधी संख्या महिलाओं की होनी चहिए। सवाल सत्ता में महिलाओं की हिस्सेदारी का है। सत्ता प्रतिष्ठानों में महिलाओं की भागेदारी से महिलाओं की प्रस्थिति में सुधार आ सकता है। दुःख तब होता है जब जिले की महिला पुलिस कप्तान को सर कहकर संबोधित किया जाता है! क्या मैम के रूप में संबोधित होकर वह अफसरी नहीं कर सकती हैं। औरतों के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण को परिवर्तित किए जाने की सर्वाधिक जरुरत है।
Sunday, 21 April 2013
मानवाधिकार कार्यकर्ता
मानवाधिकार कार्यकर्ता-
मानवाधिकार कार्यकर्ता भले ही कुछ कहें लेकिन हकीकत यह है पुलिस अक्सर सही कार्य करती है। कहीं न कहीं आदमी की आपराधिक संलिप्तता होती है तभी पुलिस उठाती है। सेना भी यही कार्य करती है। अभी एक महानगर में जाति और धर्म विशेष की एक आपराधिक बस्ती बसने वाली है जिसके इंजीनियर को निर्देशित किया गया है कि कालोनी के लिए महज 10 फुट का रास्ता ही दें ताकि पुलिस की जीप रास्ते में जाकर वापस न आ सके। पुलिस और सेना के अफसरों और कर्मचारियों की शहादत पर मानवाधिकार कार्यकर्ता क्यों चुप्पी साध लेते हैं। तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्ता पुलिस और सेना का ऐसा चरित्र प्रस्तुत करते हैं मानो पुलिस अपराधी हो और अपराधी महमना। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को पुलिस सुधार की वकालत करनी चाहिए। इसके साथ ही दूधियों के आतंक पर भी विचार विमर्श जरुरी है। खाद्यान्न में मिलावट पर भी पुलिस की बजाय लाला जी को कोसना चाहिये।
मानवाधिकार कार्यकर्ता भले ही कुछ कहें लेकिन हकीकत यह है पुलिस अक्सर सही कार्य करती है। कहीं न कहीं आदमी की आपराधिक संलिप्तता होती है तभी पुलिस उठाती है। सेना भी यही कार्य करती है। अभी एक महानगर में जाति और धर्म विशेष की एक आपराधिक बस्ती बसने वाली है जिसके इंजीनियर को निर्देशित किया गया है कि कालोनी के लिए महज 10 फुट का रास्ता ही दें ताकि पुलिस की जीप रास्ते में जाकर वापस न आ सके। पुलिस और सेना के अफसरों और कर्मचारियों की शहादत पर मानवाधिकार कार्यकर्ता क्यों चुप्पी साध लेते हैं। तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्ता पुलिस और सेना का ऐसा चरित्र प्रस्तुत करते हैं मानो पुलिस अपराधी हो और अपराधी महमना। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को पुलिस सुधार की वकालत करनी चाहिए। इसके साथ ही दूधियों के आतंक पर भी विचार विमर्श जरुरी है। खाद्यान्न में मिलावट पर भी पुलिस की बजाय लाला जी को कोसना चाहिये।
Saturday, 20 April 2013
पुलिस को सियासत ने नपुंसक बना डाला है
पुलिस को सियासत ने नपुंसक बना डाला है-
पुलिस का फंडा हनक पर काम करता है। इस देश की सिविल पुलिस को सियासत ने नपुंसक बना डाला है। स्वतंत्र ढंग से कार्य करने हेतु जिलों के पुलिस कप्तानों की नियुक्ति राष्ट्रीय स्तर पर सुनिश्चित की जानी चाहिए। आई पी एस संवर्ग को राज्यों के दबाव से मुक्त किया जाना भी निहायत जरुरी है। बलात्कारियों को सरेआम चौराहों पर कोड़े लगवाकर फांसी दिलवाए जाने का संवैधानिक प्रावधान सुनिश्चित होना चाहिए। यदि किसी ने बलात्कारियों के मानवाधिकार की बात की तो उसे भी जूते मरवाए जाने का संवैधानिक प्रावधान किया जाना भी जरुरी है। और अंत में देश की जनता से एक आह्वान- "तख़्त बदल दो ताज बदल दो, क्लीवों का अभिशाप बदल दो।"।
पुलिस का फंडा हनक पर काम करता है। इस देश की सिविल पुलिस को सियासत ने नपुंसक बना डाला है। स्वतंत्र ढंग से कार्य करने हेतु जिलों के पुलिस कप्तानों की नियुक्ति राष्ट्रीय स्तर पर सुनिश्चित की जानी चाहिए। आई पी एस संवर्ग को राज्यों के दबाव से मुक्त किया जाना भी निहायत जरुरी है। बलात्कारियों को सरेआम चौराहों पर कोड़े लगवाकर फांसी दिलवाए जाने का संवैधानिक प्रावधान सुनिश्चित होना चाहिए। यदि किसी ने बलात्कारियों के मानवाधिकार की बात की तो उसे भी जूते मरवाए जाने का संवैधानिक प्रावधान किया जाना भी जरुरी है। और अंत में देश की जनता से एक आह्वान- "तख़्त बदल दो ताज बदल दो, क्लीवों का अभिशाप बदल दो।"।
Friday, 19 April 2013
अक्षरों की सत्ता सार्वकालिक है
अक्षरों की सत्ता सार्वकालिक है-
अक्षर अर्थात जिसका क्षरण न हो सके। जिस तरह अक्षरों की सत्ता सार्वकालिक है ठीक उसी तरह ईश्वरीय सत्ता भी है। अनगिनत रूपों में ईश्वरीय चेतना सार्वकालिक है। रही बात "नास्ति" की तो यह शब्द भी अक्षरों का सार्थक समूह ही है। "नास्ति" का अनुगामी ही नास्तिक है। जब कुछ है ही नहीं तब फिर किसका अनुयायी! असल में सत्ता तो शब्द की ही होती है। जिसकी सत्ता होगी वह निराकार तो होगा नहीं, यहीं से एक नए विमर्श की सम्भावना भी बनती है। अक्षरों की सत्ता सार्वकालिक है
अक्षरों की सत्ता सार्वकालिक है-
अक्षर अर्थात जिसका क्षरण न हो सके। जिस तरह अक्षरों की सत्ता सार्वकालिक है ठीक उसी तरह ईश्वरीय सत्ता भी है। अनगिनत रूपों में वे सार्वकालिक और सर्वव्यापी हैं। रही बात नास्तिक की तो यह शब्द भी अक्षरों का सार्थक समूह ही है। असल में सत्ता तो शब्द की ही होती है। जिसकी सत्ता होगी वह निराकार तो होगा नहीं, यहाँ से एक नए विमर्श की सम्भावना भी बनती है। Tuesday, 16 April 2013
Thursday, 4 April 2013
नशे का लोकतंत्र
धड़कते हुए दिल को थामते हुए होशियार सिंह ने परिजनों से कहा कि अबकी बार फिर हमारी जीत पक्की है। उधर हरिजन बस्ती में आज़ादी के 6 5 साल बाद होने वाले ग्राम प्रधानी के इलेक्शन में चरन दास जिंदाबाद का नारा सुनाई पड़ रहा था। यादव टोली के यादव टिर्रा यादव को ग्राम प्रधान बनाना चाहते थे। जैसे ही सुबह 7 बजे से पोलिंग शुरू हुई, दो घंटे बाद दलित बस्ती में दारू की बोतल और एक हजारा नोट बंटने लगा। सब तितर बितर, होशियार सिंह फिर ग्राम प्रधान बने।
Wednesday, 3 April 2013
पिछड़ी जातियों में वर्चस्व की राजनीति
देश की राजनीति में पिछड़ी जातियों में वर्चस्व की राजनीति चल रही है। बेनी प्रसाद कुर्मी उप बिरादरी के नेता
के रूप में अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं जबकि मुलायम सिंह यादव का पिछड़ी राजनीति पर वर्चस्व स्थापित है। उत्तर प्रदेश में पिछड़ों की संगठित शक्ति को कांग्रेस बिखेरने का प्रयास कर रही है। पदोन्नति में आरक्षण के मुद्दे पर विरोध का स्वर मुलायम ने बुलंद किया था तब बेनी प्रसाद कहाँ थे! बिहार के नितीश बाबू भी चुप थे!
के रूप में अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं जबकि मुलायम सिंह यादव का पिछड़ी राजनीति पर वर्चस्व स्थापित है। उत्तर प्रदेश में पिछड़ों की संगठित शक्ति को कांग्रेस बिखेरने का प्रयास कर रही है। पदोन्नति में आरक्षण के मुद्दे पर विरोध का स्वर मुलायम ने बुलंद किया था तब बेनी प्रसाद कहाँ थे! बिहार के नितीश बाबू भी चुप थे!
Sunday, 31 March 2013
Thursday, 28 March 2013
मुल्क की सियासत
मुल्क की सियासत में दीमक लग चुके हैं। हर इंसान परेशान है। वह सोचता है कि आने दो बच्चू अबकी बारी चुनावों में नेता जी को सबक सिखाएंगे। चुनाव आता है तब तक जीता हुआ जनप्रतिनिधि बाहुबली और माननीय के रूप में तब्दील हो जाता है। कौन जाए आफत मोल लेने……। भारतीय लोकतांत्रिक संस्करण में सभी छोटे मोटे सामंत विधायक और सांसद बन चुके हैं। बड़े पूंजीपतियों के लिए राज्य सभा का दरवाजा खुला रहता है।
Tuesday, 26 March 2013
भ्रष्टाचार की होली
भ्रष्टाचार की होली-
भ्रष्टाचार की होली जलाएं। मन के भीतर पाप की होली जलाएं। मित्रों! यह कदापि न कहिएगा कि आप पाक साफ़ हैं! तो फिर मान लेते हैं कि हम आत्म मंथन के युग में प्रवेश कर चुके हैं।
भ्रष्टाचार की होली जलाएं। मन के भीतर पाप की होली जलाएं। मित्रों! यह कदापि न कहिएगा कि आप पाक साफ़ हैं! तो फिर मान लेते हैं कि हम आत्म मंथन के युग में प्रवेश कर चुके हैं।
Friday, 22 March 2013
मकसद गलत है-
पुलिस और जांच एजेंसियों का इस्तेमाल जनहित में होना चाहिए न कि विरोधी सियासी दलों के उत्पीड़न के लिए। द्रमुक ने जब तक कांग्रेस का साथ दिया तब तक वह ईमानदार था, समर्थन वापस लेते ही वह बेईमान कैसे हो गया? समाजवादी पार्टी भी सी बी आई और अन्यान्य जांच एजेंसियों के इस्तेमाल से भयभीत है वरना अब तक समर्थन वापस हो चुका होता।
पुलिस और जांच एजेंसियों का इस्तेमाल जनहित में होना चाहिए न कि विरोधी सियासी दलों के उत्पीड़न के लिए। द्रमुक ने जब तक कांग्रेस का साथ दिया तब तक वह ईमानदार था, समर्थन वापस लेते ही वह बेईमान कैसे हो गया? समाजवादी पार्टी भी सी बी आई और अन्यान्य जांच एजेंसियों के इस्तेमाल से भयभीत है वरना अब तक समर्थन वापस हो चुका होता।
Friday, 18 January 2013
आन्दोलनात्मक कविता लुप्त हो रही है-
विनय कांत मिश्र। कवि होंगे और कविताएं भी होंगी किन्तु पाठक न होंगे। कविताओं का भविष्य एक गोष्ठी तक ही सिमटकर रह जाएगा। देखने में आ रहा है है कि अब कवि गोष्ठियों के व्यापक दौर का प्रारम्भ हो चुका है जिसमें बारी बारी से उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति कविता पाठ करते हैं। बहुत बार ऐसा प्रतीत होता है कि यह कविता के चारण युग की पुनर्प्रतिष्ठा भी है। आज से 15-20 वर्ष पूर्व छोटे, मंझोले अथवा बड़े नगरों में जब कवि सम्मलेन हुआ करते थे जिसमें श्रोताओं द्वारा वाह वाह की प्रतिध्वनि गूंजा करती थी।
गौरतलब है कि उन दिनों कवियों का श्रोताओं से पहचान भी नहीं हुआ करता था लेकिन कवि सम्मलेन के बाद कवि अनचीन्ह कई श्रोताओं से घिर जाते थे। उस समय अभूतपूर्व दृश्य होता था। अब ऐसा नहीं हो पा रहा है। उदारीकरण के दौर के जब प्रकाशकों और पुरस्कारों की संख्या बढ़ी तो तेजी से कवि भी आए और उनके कविता संग्रह भी छपे। धीरे धीरे विश्वविद्यालयीन शिक्षकों का कविता की जमीन पर पट्टा हो गया। हिन्दी कविता की दुनिया की पुरस्कार समितियों में भी जोड़ तोड़ की शुरूआत हुई। इसके बाद कविता पुरस्कार तक ही सिमटकर रह गई। धीरे धीरे उसमें जनांदोलन बनने की कूबत का विलोप होता जा रहा है। ऐसे में एक बार फिर कबीर, तुलसी, सूर, मीरां, निराला, महादेवी, अज्ञेय, मुक्तिबोध और नागार्जुन सरीखे कवियों की वर्तमान समाज को दरकार है जिनकी पंक्तियाँ जन सामान्य और पाठकों की जुबाँ पर चढ़ सकें।
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