Monday, 12 August 2013

अस्त होता देश- भारत इस समय संक्रमण के दौर में है। तमाम विचारधारों के बीच रगड़ खाती देश की अवसरवादी राजनीति और नौकरशाही लूट तंत्र में तब्दील होती जा रही है। भारत के संभावित भविष्य मोदी की अमेरिका परस्ती उनके नारों में साफ़ झलकती है। पूत के पाँव पालने में ही, वाली कहावत नरेन्द्र मोदी पर सौ फीसदी फिट बैठती है। तब एक सवाल दिल और दिमाग को झकझोरता है ----- फिर जनता किसे चुने? बहुत से लोग सोचते होंगे कि मोदी नया भारत बनायेंगे? कांग्रेस फिर आयेगी, तीसरा मोर्चा मुल्क की तकदीर बदल देगा? यदि हम और आप ऐसा सोचते हैं तब हम और आप दोनों गलत हैं। सवाल इस मुल्क के अधिकाँश व्यक्तियों के भीतर पनप रही मक्कारी और ऐय्यारी का है। टी वी खोलिए तो लगता है कि पूरा देश खुश है। गाँवों में जाइये तो आपको अलग किस्म की दुनिया दिखलाई देगी। आप देखेंगे कि इस देश की 75 प्रतिशत आबादी को जीवंन व्यतीत करने के लिए न्यूनतम सुविधाएं भी नहीं हासिल हैं। इसके अलावा सवाल व्यक्ति की सोच का है। प्रत्येक दशा में इस देश के मतदाताओं को अपनी सोच को परिवर्तित करना होगा। साथियों! जाति, धर्म, सम्प्रदाय और क्षेत्र और अनेकानेक वादों की मानसिकता से ऊपर उठकर पहले गंभीरता पूर्वक सोचना शुरू कीजिये फिर वोट दीजिए। नेताओं का क्या? उन्हें तो हर हाल में सत्ता सुख चाहिये। सवाल यह भी है कि हमारे और आपके बीच का निर्वाचित नेता

अस्त होता देश-
भारत इस समय संक्रमण के दौर में है। तमाम विचारधारों के बीच रगड़ खाती देश की अवसरवादी राजनीति और नौकरशाही लूट तंत्र में तब्दील होती जा रही है। भारत के संभावित भविष्य मोदी की  अमेरिका परस्ती उनके नारों में साफ़ झलकती है। पूत के पाँव पालने में ही, वाली कहावत नरेन्द्र मोदी पर सौ फीसदी फिट बैठती है।  तब  एक सवाल दिल और दिमाग को झकझोरता है ----- फिर जनता किसे चुने? बहुत से लोग सोचते होंगे कि मोदी नया भारत बनायेंगे? कांग्रेस फिर आयेगी, तीसरा मोर्चा मुल्क की तकदीर बदल देगा? यदि हम और आप ऐसा सोचते हैं तब हम और आप  दोनों गलत हैं।  सवाल इस मुल्क के अधिकाँश व्यक्तियों के भीतर पनप रही मक्कारी और ऐय्यारी का है। टी वी खोलिए तो लगता है कि पूरा देश खुश है।  गाँवों में जाइये तो आपको अलग किस्म की दुनिया दिखलाई देगी। आप  देखेंगे कि  इस देश की 75 प्रतिशत आबादी को जीवंन व्यतीत करने के लिए न्यूनतम सुविधाएं भी नहीं हासिल हैं। इसके अलावा सवाल व्यक्ति की सोच का है।  प्रत्येक दशा में इस देश के मतदाताओं  को अपनी सोच को परिवर्तित करना  होगा। साथियों! जाति, धर्म, सम्प्रदाय और क्षेत्र और अनेकानेक वादों की मानसिकता से ऊपर उठकर  पहले गंभीरता पूर्वक सोचना शुरू कीजिये फिर वोट दीजिए। नेताओं का क्या? उन्हें तो हर हाल में सत्ता सुख चाहिये।  सवाल यह भी है कि हमारे और आपके बीच का निर्वाचित नेता चुनाव के बाद इतना मक्कार कैसे हो जाता है? कुछ तो है…. ज़रा बताइये क्या! 

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