मानवाधिकार कार्यकर्ता-
मानवाधिकार कार्यकर्ता भले ही कुछ कहें लेकिन हकीकत यह है पुलिस अक्सर सही कार्य करती है। कहीं न कहीं आदमी की आपराधिक संलिप्तता होती है तभी पुलिस उठाती है। सेना भी यही कार्य करती है। अभी एक महानगर में जाति और धर्म विशेष की एक आपराधिक बस्ती बसने वाली है जिसके इंजीनियर को निर्देशित किया गया है कि कालोनी के लिए महज 10 फुट का रास्ता ही दें ताकि पुलिस की जीप रास्ते में जाकर वापस न आ सके। पुलिस और सेना के अफसरों और कर्मचारियों की शहादत पर मानवाधिकार कार्यकर्ता क्यों चुप्पी साध लेते हैं। तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्ता पुलिस और सेना का ऐसा चरित्र प्रस्तुत करते हैं मानो पुलिस अपराधी हो और अपराधी महमना। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को पुलिस सुधार की वकालत करनी चाहिए। इसके साथ ही दूधियों के आतंक पर भी विचार विमर्श जरुरी है। खाद्यान्न में मिलावट पर भी पुलिस की बजाय लाला जी को कोसना चाहिये।
मानवाधिकार कार्यकर्ता भले ही कुछ कहें लेकिन हकीकत यह है पुलिस अक्सर सही कार्य करती है। कहीं न कहीं आदमी की आपराधिक संलिप्तता होती है तभी पुलिस उठाती है। सेना भी यही कार्य करती है। अभी एक महानगर में जाति और धर्म विशेष की एक आपराधिक बस्ती बसने वाली है जिसके इंजीनियर को निर्देशित किया गया है कि कालोनी के लिए महज 10 फुट का रास्ता ही दें ताकि पुलिस की जीप रास्ते में जाकर वापस न आ सके। पुलिस और सेना के अफसरों और कर्मचारियों की शहादत पर मानवाधिकार कार्यकर्ता क्यों चुप्पी साध लेते हैं। तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्ता पुलिस और सेना का ऐसा चरित्र प्रस्तुत करते हैं मानो पुलिस अपराधी हो और अपराधी महमना। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को पुलिस सुधार की वकालत करनी चाहिए। इसके साथ ही दूधियों के आतंक पर भी विचार विमर्श जरुरी है। खाद्यान्न में मिलावट पर भी पुलिस की बजाय लाला जी को कोसना चाहिये।
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