अक्षरों की सत्ता सार्वकालिक है-
अक्षर अर्थात जिसका क्षरण न हो सके। जिस तरह अक्षरों की सत्ता सार्वकालिक है ठीक उसी तरह ईश्वरीय सत्ता भी है। अनगिनत रूपों में ईश्वरीय चेतना सार्वकालिक है। रही बात "नास्ति" की तो यह शब्द भी अक्षरों का सार्थक समूह ही है। "नास्ति" का अनुगामी ही नास्तिक है। जब कुछ है ही नहीं तब फिर किसका अनुयायी! असल में सत्ता तो शब्द की ही होती है। जिसकी सत्ता होगी वह निराकार तो होगा नहीं, यहीं से एक नए विमर्श की सम्भावना भी बनती है।
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