सर्वहारा का अस्तित्व खतरे में है-
इन दिनों चमचमाती कारों, आलीशान मकानों और अभिजात्यवर्गीय पहनावों में क्रान्ति की ज्वाला धधक रही है। प्रत्येक अभिजात्यवर्गीय इंसान सर्वहारा की लड़ाई लड़ने को व्यग्र है। सर्वहारा का अस्तित्व साहित्य में बिकाऊ माल के अलावा कुछ भी नहीं, वह पुरस्कार पाने के लिए साहित्यकारों को पुख्ता जमीन मुहैया कराता है।
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