Monday, 9 September 2013

मर रही है जनता-
रूपया जब टूट रहा था तब मुज्जफर नगर में दंगे की रूप रेखा तय हो रही थी।  जब देश की जनता महंगाई के कारण बिलख रही थी तब भावनाओं को भड़काया जा रहा था। अब भयावह परिणाम सबके सामने है।  जब सांसदों के हित का मसला होता है तब संसद में ध्वनि मत से प्रस्ताव पारित होते हैं जब मुल्क की अवाम का मसला होता है तब संसद नहीं चलेगी।  समस्या यह है कि जनता चुने किसे।  बेवफाई कई जनप्रतिनिधियों की फितरत बन चुकी है चालबाज़ आशिक की तरह।    

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