Friday, 6 September 2013

सर! नाम न गिनवाइये। लेकिन इतना जरुर कहना चाहूँगा कि काश नामवर जी जैसा चयन अब के चयन समिति में शामिल प्रोफ़ेसर कर पाते! हिंदी का कोई प्रोफ़ेसर किसी प्रोफ़ेसर का दामाद है तो कोई किसी का बेटा। कोई किसी की बेटी तो कोई किसी की बीबी। मामला आपसी अनैतिक खरीद फ़रोख्त का है। सब लगे बझे हैं। किसने अधिकार दिया आप को कि आप आने वाली नस्लों को रीढ़ विहीन बना डालें। दुर्भाग्य से देश के अधिकाँश विश्वविद्यालय उपाधियाँ वितरित करने वाली फैक्ट्री के रूप में तब्दील हो चुके हैं।  यह भी हकीकत है कि दुनिया के २०० विश्वविद्यालयों में आप और हम कहीं भी नहीं हैं।   

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