आन्दोलनात्मक कविता लुप्त हो रही है-
विनय कांत मिश्र। कवि होंगे और कविताएं भी होंगी किन्तु पाठक न होंगे। कविताओं का भविष्य एक गोष्ठी तक ही सिमटकर रह जाएगा। देखने में आ रहा है है कि अब कवि गोष्ठियों के व्यापक दौर का प्रारम्भ हो चुका है जिसमें बारी बारी से उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति कविता पाठ करते हैं। बहुत बार ऐसा प्रतीत होता है कि यह कविता के चारण युग की पुनर्प्रतिष्ठा भी है। आज से 15-20 वर्ष पूर्व छोटे, मंझोले अथवा बड़े नगरों में जब कवि सम्मलेन हुआ करते थे जिसमें श्रोताओं द्वारा वाह वाह की प्रतिध्वनि गूंजा करती थी।
गौरतलब है कि उन दिनों कवियों का श्रोताओं से पहचान भी नहीं हुआ करता था लेकिन कवि सम्मलेन के बाद कवि अनचीन्ह कई श्रोताओं से घिर जाते थे। उस समय अभूतपूर्व दृश्य होता था। अब ऐसा नहीं हो पा रहा है। उदारीकरण के दौर के जब प्रकाशकों और पुरस्कारों की संख्या बढ़ी तो तेजी से कवि भी आए और उनके कविता संग्रह भी छपे। धीरे धीरे विश्वविद्यालयीन शिक्षकों का कविता की जमीन पर पट्टा हो गया। हिन्दी कविता की दुनिया की पुरस्कार समितियों में भी जोड़ तोड़ की शुरूआत हुई। इसके बाद कविता पुरस्कार तक ही सिमटकर रह गई। धीरे धीरे उसमें जनांदोलन बनने की कूबत का विलोप होता जा रहा है। ऐसे में एक बार फिर कबीर, तुलसी, सूर, मीरां, निराला, महादेवी, अज्ञेय, मुक्तिबोध और नागार्जुन सरीखे कवियों की वर्तमान समाज को दरकार है जिनकी पंक्तियाँ जन सामान्य और पाठकों की जुबाँ पर चढ़ सकें।
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