Saturday, 30 November 2013

दीपक की लौ

दीपक की लौ  
नगर के सभी मकानों में  
बेहद खूबसूरती बिखेर रही थी 
अगली सुबह  टूटे हुए थे दीये  
बच्चे तराजू बनाकर खेल चुके थे दीये  
तराजू का खेल 
तो बच्चे सीख रहे थे 
उन दीयों से व्यापार। 
अगले दिन वे दीये खंडित थे 
हर उजाले के बाद 
दीपक की तरह बुझता  है सच! 

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