दीपक की लौ
नगर के सभी मकानों में
बेहद खूबसूरती बिखेर रही थी
अगली सुबह टूटे हुए थे दीये
बच्चे तराजू बनाकर खेल चुके थे दीये
तराजू का खेल
तो बच्चे सीख रहे थे
उन दीयों से व्यापार।
अगले दिन वे दीये खंडित थे
हर उजाले के बाद
दीपक की तरह बुझता है सच!
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