Friday, 27 December 2013

सुलगते  सवाल-
क्या चाटुकारों को प्रबुद्धजन की श्रेणी में शामिल किया जा सकता है? चाटुकारों से समाज का कौन सा हित सम्भव है? इसके अलावा उनका कितना दोष है जो ज्ञानी-विज्ञानी होते हुए भी चाटुकारों को ही तरजीह देते हैं? क्या तेल खाने और खिलाने वाले से समाज का पतन नहीं होता? सामाजिक-सांस्कृतिकशुचिता प्रभावित नहीं होती? भारतीय विश्ववविद्यालयों में अधिकाँश वी सी चाटुकार और सत्ता के दलाल ही नहीं काबिज़ हैं? क्या देश के अधिकाँश विश्वविद्यालयों के डीन और विभागाध्यक्ष कुलपति  चमचई नहीं करते?

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