Saturday, 31 December 2011

naye varsh par vishesh

जाने वाले वर्ष २०११ तुझे अल्ला हाफ़िज़- आने वाले वर्ष २०१२ को सादर प्रणाम-
नएपन का अहसास भुला देता है न जाने  कितने जख्म
हर इतिहास का पन्ना खून के धब्बों से नहीं लिखा होता l l विनय कांत l l  
 

Friday, 30 December 2011

sathi hamasafar

साथी हमसफ़र अब नाज़ है तुम पर l
बीते ज़माने की सीता कौन चाहता है! l
वो खेत की जोत वो हल की खरोच l  
ताउम्र परीक्षा ही अब कौन देता है! l
साथी हमसफ़र............................l l विनय कांत l l
 

aao ganv chalen

किसान का बेटा पूछ रहा था बाबू  शहर इधर ही है l
वह मजबूरी में मजदूर का बुझता चिराग़ ही तो था l l  विनय कांत l l  

Thursday, 29 December 2011

मित्रों! एक कविता नए वर्ष के अवसर पर आप सभी को समर्पित-
नया साल
नया एहसास
सुर्ख आँखों में
है तैर जाती
वृहत्तर कल्पना
सोचकर ही
प्रत्येक
नएपन के एहसास को
स्फूर्त होता मन
तब वासांसि जीर्णानि यथा विहाय.....
उठता है कौंध
बुद्ध का क्षणवाद
दर्शन का चिंतन
हर नएपन की
करता है परख.....
सचमुच
नयापन
असमंजस भरा
और कभी सुखद
नया हर पल
होता ही है आह्लादकारी!
ओ रे धक् धक्
धड़कता ह्रदय
समय को
खींचती
तानती
घड़ियाँ
और
हैं उनकी सूइयां
नश्तर सी चुभती
स्मृतियों की धुंधली रेखा बीच
है खो जाती
पहले प्यार की प्रतीक्षा!
अब नयापन
बाज़ारों की फूटपाथों
पर रोजमर्रा की
जरुरत का सामान जुटाती
तलाशती
तरेरती
हैं सुर्ख आँखें!

Wednesday, 28 December 2011

chunavi shankhanad

सत्ता का खेल पीस पार्टी का मेल
विधानसभा चुनाव २०१२ में उत्तर प्रदेश की सियासत गिरगिट की तरह रंग बदलती दिखलाई पड़ रही है. कल तक जो अपने थे वे दामन छुड़ाकर दूसरे दलों की तरफ जा रहे हैं. बहुजन समाज पार्टी, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के असंतुष्टों को पीस पार्टी विधानसभा चुनावों में अपना दलीय उमीदवार बना रही है. नेपाल से सटे उत्तर प्रदेश के सीमाई इलाकों में पीस पार्टी, समाजवादी पार्टी के सत्ता तक पहुँचने का खेल बिगाड़ सकती है. गोरखपुर, देवीपाटन, वाराणसी और बस्ती मंडल की लगभग ५० सीटों पर पीस पार्टी सपा को प्रभावित कर रही है. निचले तबके के अधिकांश मुस्लिम मतदाताओं का कहना है कि जब दलित एकजुट होकर बसपा की सरकार बनवा सकते हैं तब मुसलमान पीस पार्टी को सत्ता की सीढ़ियों पर तो चढ़वा ही सकते हैं. कांग्रेस भी पढ़ेलिखे उच्चवर्गीय मुस्लिम मतदाताओं का वोट पा सकती है. मुस्लिम मतदाताओं का सर्वाधिक नुकसान समाजवादी पार्टी को है जबकि बसपा उन्हीं सीटों पर  मुस्लिम मतदाताओं का वोट पाएगी जहाँ बसपा के मुस्लिम उम्मीदवार होंगे. पीस पार्टी ने पूंजीपतियों, बाहुबलियों को खूब टिकट दिया है. जाति बिरादरी का ध्यान रखते हुए ब्राह्मन, ठाकुर बिरादरी के उम्मीदवारों की अच्छी खासी  संख्या भी पीस पार्टी में है.फिलहाल चुनाव बाद बनाने वाली सरकार में पीस पार्टी की अहम् भूमिका होगी. एक संभावना यह भी है कि यदि पीस पार्टी बराबरी पर चुनावी कदम ताल करती रही तो बसपा और भारतीय जनता पार्टी कि सीटें बढ़ सकती हैं. वैश्य और अन्य बिरादरी के प्रतिबद्ध वोटर अभी भी  बी जे पी के साथ ही चुनावी समर में रहेंगे. आगे आगे देखिए होता है क्या!   

Tuesday, 27 December 2011

jativadi hai u.p. ki siyasat

"जातिवादी है यू पी की सियासत(जातीय समीकरण और यू पी चुनाव)"-
इस बार के यू पी विधानसभा चुनाव में कुछ भी कहना मुश्किल है. मुस्लिम मतों को दलीय मत के रूप में बदलने के लिए सपा, बसपा और कांग्रेस में जबरदस्त रस्साकशी जारी है. आरक्षण का जिन्न बोतल से बाहर निकल चुका है. कांग्रेस के आरक्षण कार्ड से सपा और बसपा सदमे में है. उधर पीस पार्टी की मुस्लिम मतों के निचले तबके में गहरी पैठ है. अब तक के चुनावों में एकमुश्त पड़ने वाला माइनोरिटी वोट विखंडित है. ब्राह्मन मतदाता कन्फ्यूज हैं. ब्राह्मण मतदाताओं का एक मुश्त वोट किसी भी दल को नहीं मिलाने की संभावना है.उनकी बसपा से मोहभंग की स्थिति है.उच्च शिक्षा में पिछले पांच वर्षों में एक भी नौकरी सवर्णों को नहीं मिली है.  सपा के साथ ठाकुर मतदाता हैं. ठाकुर वर्ग के  मतदाताओं का कहना है जो बसपा को हराएगा उसी को वोट देंगे. कुर्मी मतदाता अपना दल के साथ सपा को भी वोट देंगे. जाटों पर  अजित सिंह की मजबूत पकड़ है. यादव जाति का समूह पूरी तरह मुलायम सिंह के साथ है. बेनी प्रसाद वर्मा की वजह से एक छोटे से इलाके का कुर्मी वोट कांग्रेस को मिल सकता है लेकिन ओ बी सी कोटे को काटने की वजह से पिछड़े वर्ग के मतदाता कांग्रेस से काफी नाराज हैं. इस बार के चुनाव में पिछड़े वर्ग के मतदाता समाजवादी पार्टी को एकमुश्त वोट दे सकते हैं. बी जे पी भी साइलेंट वोटिंग में बढ़त बना सकती है. फिलहाल आगे आगे देखिए होता है क्या!    
  

Sunday, 25 December 2011

lokatantr-10

लोकतंत्र   बिक   रहा,  नेता   हैं   खरीदारार l
जातिवाद मदमस्त है,पंथ करे व्यभिचार l l विनय कांत l l

Saturday, 24 December 2011

chunav abhiyan

राजनीति के इस दौर में, चल रहा सियासी दांव l 
जनता जय जयकार करे, नेता करे कांव कांव l l  विनय कांत l l  

katl

साजिशन,  घर  की  दुनिया  तब  लुटीl
जब मौत ने दरवाजे पर दस्तक दी ll
कातिल  कोई   और   दूसरा  न   था l 
अपना   ही  पड़ोसी तो  राजदार  था ll   विनय कांत l l  a

katl

साजिशन,  घर  की  दुनिया  तब  लुटीl
जब मौत ने दरवाजे पर दस्तक दी ll
कातिल  कोई   और   दूसरा  न   था l 
अपना   ही  पड़ोसी तो  राजदार  था ll   विनय कांत l l  

Tuesday, 20 December 2011

satta ka khel

सत्ता तंत्र में खेलना भी बाजीगरी है! सब कुछ प्रायोजित..... पिछले छः महीनों से चल रहे सचिन के महा शतक अभियान ने देश की तमाम समस्याओं महंगाई, बेरोजगारी और बालमजदूरी आदि से ध्यान भंग करने की कोशिश ही की है. क्रिकेट के खेल ने देश के विकास की गति को अवरुद्ध किया है.....सरकार द्वारा इस खेल को बढ़ावा देने के पीछे यह मंशा काम करती है कि देश कि विफलताओं की तरफ देश के नागरिकों का ध्यान न जाए!    

Monday, 19 December 2011

discovery of india

पंडित जवाहर लाल नेहरू की पुस्तक "डिस्कवरी आफ इंडिया" को वी के कृष्णमेनन ने 'रीराईट' किया था. मतलब कई जगह उनकी पैनी नजर ने किताब को परिष्कृत किया था. उनकी अंगरेजी बहुत ही परिष्कृत थी. १९४४ में जवाहर लाल नेहरू ने पूरा कर लिया था लेकिन चेक करके और छप कर आने में दो वर्ष लगे. बाद में वी के कृष्ण मेनन स्वतंत्र भारत में मंत्री भी बने. 

Sunday, 18 December 2011

khanakati avaj ka jadu

वो खनकती आवाज का जादू, मेरे मौला लौटा दे l
अब दर्द दवा बनकर, दिल को राहत पहुंचाती है l l
मेरे दीदी को समर्पित जो अब गाने को गाना छोड़ चुकी हैं. सचमुच वे बहुत अच्छा गाती थीं. काश! अभी भी उनके गाने सुनने को मिलते!  

loktantr-9

स्टेशन पर चमक रही, मेरे लाल की दो आँखें l
इक  सपने की हसरत में,शहरों को गाड़ी जाती है l l  विनय  कांत l l  
 

lokatantr-8

चाँद धुंधला दिख रहा, आसमान सर्द चादर है l
लोकतंत्र के संसद में, अब बिकने का आफर है l l विनय कांत l l    

Friday, 16 December 2011

ab pachhataye hot kya!

गलतफहमी रिश्तों में दरार पैदा करती है. आखिर इन्सान गलतफहमी को मन में पनपने ही क्यों देता है! रिश्ते लाचारगी और बेचारगी की हद तक पहुँच जाते हैं. जब पलटकर इन्सान देखता है तब बहुत देर हो चुकी होती है. आख़िरकार उसे मालूम पड़ता है कि उसने भावनाओं में बहकर स्वयं के जीवन को विनाश के पथ पर ही ढकेला था. ओह रे! अविनाशी आत्मा; चित्त क्यों न हुआ स्थिर! 

tulaseedas

संभु प्रसाद सुमति हिय हुलसी l
राम चरित मानस कवि तुलसी l l  तुलसीदास l l
तुलसीदास भक्तिकाल के सचेत कवि हैं सिर्फ भक्त नहीं lउन्होंने  कविता को भक्ति की चासनी में और अधिक स्वादिष्ट बनाया l  

lokatantr-7

दिन दिन ठंडी बढ़ रही, छाया आसमान में धुंध l
लोग घरों में सिमट चले, नहीं प्रकाश का पुंज l l
  

Thursday, 15 December 2011

loktantr-6

विधायक निवास छूट गया, पलेट भी सब खाली है l
राम राज्य का नारा भी, पब्लिक पे अब भारी है l l विनय कांत l l

annagiree

यार! यह कोई बात थोड़े ही होती है कि जब चाहा कहीं भी धरना दे दिया. अब अन्ना हैं कि इस बार सोनिया गांधी के घर पर धरना देने का ऐलान कर चुके हैं. अब सरकार ठहरी कमजोर! यदि टीम अन्ना में दम है तो मायावती जी के घर के सामने अनशन करके दिखाएँ....... प्रेशर ग्रुप का मतलब जबर्दस्ती थोड़े ही होती है. एक बात और जो गौरतलब रही; वह यह कि अन्ना ने एक दिन का सांकेतिक धरना दिल्ली में महाराष्ट्र भवन से ही क्यों शुरू किया? क्या यह स्वतंत्र भारत में मराठा राज्य की सर्वोच्चता का संकेत नहीं था. इतिहास गवाह रहा है कि मराठों ने देश के लिए कितना खून बहाया...........झूठ नहीं बोलूंगा! कानून बनाने में वक्त तो लगता ही है जैसे प्यार का पहला ख़त लिखने में वक्त लगता है. अन्ना और उनकी टीम तो देश की जनता को ऐसा सन्देश दे रही है कि मानो कांग्रेस ने अब तक देश के विकास के लिए कुछ किया ही नहीं. ऐसा नहीं है कि देश ने तरक्की नहीं की है. लोगों का जीवन स्तर उठा है.  पूर्व के "ब्यूरोक्रेट्स" को लेकर चले हैं भारत-भाग्यविधाता बनने! अन्ना खुद जबर्दस्त "ब्यूरोक्रेसी" और महत्वाकांक्षियों  की चपेट में हैं!   

doha-4

फेसबुक पर टैग करें, मित्र अब नंगी  तस्वीर l  
फ्रेंड होते अन्फ्रेंड सब , मन में बढ़ती  पीर l l

lokatantr ka doha-4

लोकतंत्र में खौल रहा, राजनीति का खेल l
जनता पग पग ढूँढती, आपस का चहुंमेल l l

Wednesday, 14 December 2011

lokatantr ka doha-3

लोकतंत्र में सभी जगह, हुई घूस की छूट l
काम करने के बदले, अफसर  लेते  लूट l l
 

lokatantr-2

लोकतंत्र में सब जगह, नेताओं का जोर l  
जनता ठगी सी घूमती, पांच साल पुरजोर  l l - विनय कांत l l  

Tuesday, 13 December 2011

hot na aagya bin paisa re

                                                                     होत न आज्ञा बिन पैसा रे
राम दुआरे तुम रखवारे, होत न आज्ञा बिन पैसा रे.. घोर कलयुग है बंधु. लोकतंत्र में बिना पैसा दिए अथवा चढ़ावा चढ़ाए कोई चमत्कार संभव नहीं है. साहब से मिलना है तो तुरंत अर्दली को १०० का नोट थमाइए. बाबू से किसी फ़ाइल को निकलवाना है तब २०० से लेकर ५०० का नोट दिखाइये. साहब से आर्डर करवाना है तब नोटों की २ से ५ गड्डी दीजिए. मंत्री जी तो नोटों के बण्डल मामले में सलाखों के पीछे जाते ही रहते हैं.लोकतंत्र रुपी पहरुआ रक्षक के रूप में खड़ा है. जनता भज रही है- होत न आज्ञा बिन पैसा रे.....जै हो कलयुगी देवताओं की: जै हो!  

loktantr

अब होगा तंत्र का राज, मौज मनाएंगे बेहिसाब.
जनता घुट घुट जीयेगी, रावन करेगा अट्टहास..

aaj ki dilli

आज की दिल्ली पर-
न कपड़ों के मिल मालिक मजे में हैं, न दरजी मजे में हैं.
नई पोशाक चलन में है, अब तो दिल्ली के मच्छर मजे में है.. 

Monday, 12 December 2011

satta sukh

बोले जय श्री राम, राम को किया बदनाम l  
जब सत्ता सुख मिला, बिसर गए हरिनाम l l   

Sunday, 4 December 2011

usaki resham see deha ka jadu

 उसने मुझसे
मोहब्बत के बारे मे पूछा
मैं क्या कहता
मेरी आँखों के आईने में
हसरतों की काँपती ख्वाहिशें
लाल डोरे बनकर तैर रही थीं
उसने पूछा सुर्ख गुलाबों की
खामोशी का राज
गुनगुनी धूप की उजली हंसी का
पिघलते जाना और ढक  लेना
दरख्तों के नरम जिस्म का जंगल
मेरे पास मदहोश खामोशियों का
बदनाम कारवां था
नशा था बेसब्री के आलम में
इश्क की ग़ज़लें गुनगुनाता हुआ
उसकी रेशम सी देह का...
रंजना श्रीवास्तव की यह कविता प्रेम को अलग नज़रिये से देखती है.

Thursday, 1 December 2011

nepali kavi chandr gurung

नेपाली कवि चन्द्र गुरुंग की "अचेल साइरन बजेको छैन" की चंद पंक्तियाँ देखिए! 
" प्रत्येक पहरहरुमा हुकूम बजेको छैन.
 प्रत्येक श्वास-प्रश्वासमा
 शोसणको गंध आउदैन
 टायम -टायममा साइरन बजेको छैना."
 मित्रों! अब मैथिलि कोकिल विद्यापति की हिंदी से मिलान कीजिए. आप नेपाली को पढ़ेंगे तो आसानी  से समझ में आयेगी.
   

poonjivad shuru me hi tha

प्रारम्भिक भारत में सामंतवादी एवं पूंजीवादी दोनों ताकतों का सत्ता में जबर्दस्त हस्तक्षेप था. जहाँ आसानी से खेती सर्वसुलभ नहीं थी वहीँ व्यापारी वर्त्तमान भारत की तरह प्रारंभ में भी सत्ता के सूत्रधार हुआ करते थे. यहाँ तक की राजाओं को व्यापारियों ने अपने सिक्के चलाए जाने के लिए मजबूर किया रहा होगा.  इसके लिए व्यापारियों को अनुमति प्रदान तत्कालीन राजाओं की मजबूरी भी रही होगी.  ऐसा न करने पर राजाओं को व्यापारियों द्वारा सत्ता परिवर्तन का भय सताता रहा होगा. यह ऐतिहासिक तथ्य है कि आदिकालीन भारत में व्यापारियों और स्वर्णकारों की श्रेणियों ने भी अपने कुछ सिक्के चलवाए थे. गुप्त वंश व्यापारिक घराना था, जिसने ३३५ ईस्वी से लेकर ४५५ ईस्वी तक भारत को एकता के सूत्र में आबद्ध किया. मतलब साफ़ है कि अंग्रेजी पूंजीवाद अथवा इस्लामिक पूंजीवाद से बहुत पहले ही पूंजी के बल पर भारत को गुप्त वंश के व्यापारिक शासकों ने एकता के सूत्र में आबद्ध करने की कोशिश की थी. उसका कारण तत्कालीन व्यापार पर उनका पूरी तरह काबिज होना था. चौथी सदी आते आते सामंतवादी ताकतें कमजोर पड़ने लगीं. व्यापारिक ताकतों के अगुआ चन्द्रगुप्त प्रथम  ने ३१९-३२० ने अपने राज्यारोहण की प्रसन्नता में गुप्त संवत भी चलवाया. इतना ही नहीं ज्यों ज्यों व्यापारिक ताकतें सत्ता में हस्तक्षेप करने लगीं त्यों त्यों तमाम सामाजिक बुराइयां भी समाज में व्याप्त हो चलीं थीं.  
     

Thursday, 24 November 2011

pratirodh

"जब महँगाई डाईन  लगती है l
 तब जूते  थप्पड़ फिर  पड़ते हैं l l
 जब जनता तिल तिल मरती है l
 तब क्रांति बिगुल बज उठती है l l "
 मित्रों! लोकतंत्र में प्रतिरोध की संस्कृति वयस्क हो रही हैl जागो सरकार जागो!

Wednesday, 23 November 2011

subah nahi huyee

अब न कोई गिला और न ही कोई शिकवा. उसकी हंसती खेलती दुनिया को किसी की नज़र लग गई थी. मोहब्बत की दुनिया उजड़ चुकी थी.उसकी देह आग में झुलस चुकी थी. बीबी अलविदा कह  चुकी थी.अब वह जिंदा रहकर भी क्या करता? उसने सोचा था कि वह झंझावातों की दुनिया से दूर फुरसत के कुछ छड़ जीने के लिए जा रहा है. लेकिन यह क्या अब तो डाक्टर नीरज के पास सन्नाटा बुनने के सिवाय कुछ नहीं बचा था. बिलखते हुए उसने कहा कि मेरी तो दुनिया ही उजड़ गई.डाक्टर अनुमिता  के लिए वह आख़िरी रात थी. जी हाँ मित्रों! यह किसी कहानी का अंश नहीं, बल्कि बर्निंग ट्रेन बनी दून हावड़ा एक्सप्रेस के भोर का दृश्य है. ए ख़ुदा! ऐसी सुबह किसी की जिन्दगी में न आए. अब तो हम आप घर से निकलते वक्त यही सोचें कि सही सलामत घर अथवा गंतव्य तक पहुँच जाएँ तो धन्यभाग!

peetana mana hai

जरा पियक्कड़ों के दिल का दर्द सुनिए. शाम को मदिरा की दूकान पर बैठे  पियक्कड़ जानते  हैं  कि अन्ना नहीं यह डान है. कितने कसीदे पढ़े गए थे कुछ दिन पहले ही अन्ना की शान में. अभी कुछ दिन ही तो हुए, मालूम पड़ रहा था कि "गांधी-टोप-युग" की वापसी हो गई. सारे पियक्कड़ों की नींद अब जाकर खुली जब कोड़े मारकर सरेआम पिटाई वाली बात सामने आयी. बंधु! गांधी टोपी के नीचे हिटलरी अंदाज है.वाह वाह क्या बात है? अच्छा; चलो मदिरा पीना बुरी बात है लेकिन यह क्या कि पियक्कड़ को पीटा जाये! अन्ना को नहीं मालूम कि आबकारी विभाग जब पैसा देता है तब देश के अधिकांश नौकरी पेशा वालों के घरों में चूल्हे जलते है. चलिए बोलिए तो मित्रों! सभी पियक्कड़ों की जै. हिटलर शाही  नहीं चलेगी, नहीं चलेगी.......... 

Tuesday, 22 November 2011

bharat akhand hai

अमेरिका ने भारत की आपत्ति के बाद भारतीय मानचित्र को सुधार दिया है. बाकायदा भारत से माफी भी मांग ली है.लेकिन एक राग तो अलाप ही दिया है.अब देखिए! नवसाम्राज्यवादी ताकतें कौन सी शैतानी चाल चलती हैं.जो भारत को खंडित करना चाहते हैं उन्हें यह जानना और समझना चाहिए कि भारत के विषय में बहुत पहले ही वायु पुराण में लिखा है- 
      "उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणं.l
      वर्षं तद्भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः l l " इसी के साथ ही विष्णु पुराण में भी लिखा है-
     " गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे l 
       स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात l l"यहाँ देवगणों का अभिप्राय सज्जनों से है.महान लोगों से है.  

bhikshukh ki naee vyakhya


निराला की एक कविता है भिक्षुक. संवेदनात्मक दृष्टि से बहुत मार्मिक कविता है.लेकिन भिक्षुक कविता भारतीयों का उपहास उड़ाती है. कविता इस तरह है-वह आता/दो टूक कालेजे के करता/पछताता पथ पर आता/पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक/चल रहा लकुटिया टेक/मुट्ठी भर दाने को/भूख मिटाने को/मुख फटी पुरानी झोली फैलाता/.........साथ दो उसके बच्चे.......l इस कविता का अब तक कुपाठ हुआ है.लकुटिया टेकने वाला और कोई नहीं बल्कि निराला... की दृष्टि में गांधी जी हैं.हाड़ मांस का वह पुतला गाँधी ही हो सकते हैं.लकुटिया भी वही टेकते थे. वह भिक्षा भी आज़ादी की ही थी. दो बच्चे नेहरू और जिन्ना थे.आप पूरी कविता को ध्यान से पढ़ें तो यह गांधीवाद का उपहास उड़ाती है.सभी जानते हैं कि गांधी जी की पेट और पीठ में अंतर नहीं था. दोनों एक से प्रतीत होते थे. गांधी जी आज़ादी के मार्ग पर चल रहे थे.वे नरमपंथी थे.शान्तिपरक बातचीत को ही वे बेहतर मानते थे. दरअसल क्रांतिकारी चेतना से लैस कवि निराला का नेहरू से अंतर्विरोध था और गांधी का नेहरू प्रेम जगजाहिर है.अब जरा भिक्षुक कविता का पुनर्पाठ कीजिए तो मित्रों

Monday, 21 November 2011

kitanee seeta

".....उनसे मिलने की  कोई न तमन्ना थी.वह घर बार की जिम्मेदारी छोड़कर  सुरा और सुन्दरी के मोहपाश में उन्मत्त थे. रिश्ता  कई वर्षों से उसे बोझ सा लगने लगा था. आए दिन की खटपट और तनाव भरी जिन्दगी ने सीता को न जाने कितने जन्मों तक अग्निपरीक्षा दिलवाई थी.वह सोच रही थी-पापा जानते थे कि सीता ने राम के कारण वनवास झेला था फिर भी नाम सीता ही रख दिया था. आखिर नाम का फर्क पड़ना ही था. अपने दो बच्चों के साथ वह कहाँ जाती? पति पुराने राजा महाराजाओं कि तरह आई ए एस के ओहदे पर फैजाबाद में डी एम के पद पर तैनात था. बेचारी सीता गाँव में दो बच्चों को पालती पोसती हुई जीवन गुजार रही थी."मित्रों यह लिखी जा रही कहानी  "कितनी सीता" का अंश है.     

Friday, 18 November 2011

shodh ki chunautiyan

पिछले दिनों बी एच यू वाराणसी में "बदलते वक्त में शोध की चुनौतियाँ" विषय पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन हुआ.गोष्ठी में मुख्य अतिथि हिंदी अदब के जाने माने विद्वान् प्रो पुरुषोत्तम अग्रवाल रहे. आलोचक प्रो अग्रवाल ने अपने रोचक व्याख्यान में कहा कि ज्ञान के किसी अनुष्ठान का सीधे सीधे सामाजिक उपयोग हो, यह जरुरी नहीं है. असल में फिलासफी हमारे सामने जीवन के बुनियादी सवाल पैदा करती है लेकिन उत्तरों के लिए हम कविता कि शरण में जाते हैं. साहित्य का कोई तत्काल उपयोग भले ही न दिखे, और वह दिखना भी नहीं चाहिए.साहित्य दुनिया को देखने का एक वैकल्पिक दृष्टि देता है, वह एक प्रकार से समग्र दृष्टि देता है. आज चल रहे सुपर स्पेशलिटी के मुद्दे पर प्रो अग्रवाल ने कहा कि वह ज्ञान के आत्म संघर्ष की सूचना देने वाला है.साहित्य की आकांक्षा सुपर स्पेशलाईजेशन  की नहीं है.टेक्नालोजी के मुद्दे उनका कहना था कि इसके प्रति नकार का भाव हमारे देशज होने का प्रमाण है.तकनीकी का परिवर्तन बिना चाहे भी होगा.गोष्ठी में महत्वपूर्ण प्रश्न उठाते हुए उन्होंने कहा कि एक छात्र अपने काम से अध्यापक को क्यों नहीं संतुष्ट कर पाता है? उन्होंने छात्रों से कहा कि यदि नौकरी के लिए आप को शोध करना है तो आप न करें वही बेहतर है. मुद्दा नौकरी का नहीं है. मुद्दा शोधार्थियों  के लिए यह है कि आप नया क्यों कर सकते हैं? यह महत्वपूर्ण है. "रिसर्च" का कुछ लक्ष्य और कुछ उद्देश्य होना चाहिए.लेकिन वह सिर्फ नया ही न हो. "नया क्यों"; ही महत्वपूर्ण है.आज हम किस बदलते वक्त में जी रहे हैं? यह देखना चाहिए. २० वीं सदी उम्मीद और संवेदनाओं की सदी थी. २१ वीं सदी विशुद्ध पहचानों की सदी बन गई है.वह तात्कालिक चिंताओं की सदी बन गई है. अगले ५० सालों में विश्व व्यवस्था बदल जाएगी. अभी कोई नहीं जानता कि बदलाव बेहतर होने वाला है या बदतर! उन्होंने कहा कि आज यह देखना महत्वपूर्ण है कि हम किस वक्त में मौजूद हैं और क्या चुनौतियाँ है? बड़ी संख्या में मौजूद छात्रों से मुखातिब होते हुए प्रो अग्रवाल ने कहा कि विनम्रता और दृढ़ता के साथ आप सवाल पूछना सीखें. सिर्फ पांव न छूते रहें. या सवाल पूछने में न हिचकें. उन्होंने उपस्थित अध्यापकों से कहा कि शोध में चरण छूने  की संस्कृति को डिस्करेज किया जाना चाहिए. नचिकेता का उदहारण  देते हुए उन्होंने कहा कि नचिकेता ने असुविधाजनक सवाल किए थे. पिता के सामने सवाल  करना सच्ची क्रांतिकारिता है. पिता की सत्ता  सबसे बड़ी होती है.नचिकेता ने सत्ता से सवाल किया था. जरुरत इस बात की है कि सही सवाल पूछे जाएँ. विश्वविद्यालयों में नचिकेता संस्कृति का विकास करने  की ज़रूरत है.दरअसल हम सही सवाल ही नहीं पूछते. रिसर्च की सबसे बड़ी चुनौती है की सही सवाल पूछिए. यमराज से नचिकेता ने सही सवाल पूछे थे.अध्यापकों से उन्होंने कहा कि आप को भी छात्रों को सुनने की जरुरत है. छात्र क्या समस्याएं महसूस करते हैं; उन्हें जानने की जरुरत है. शोध के लिए आप की चेतना में जो चीजें जड़ जमा कर बैठी हैं, उनसे  असहमति जरुरी है. नचिकेता को आदर्श बनाईये और सवाल पूछिए. विचारधारा को अवसरवाद के चलते मत बदलिए.आप जो नया करें उनके पीछे कारकों की पड़ताल करें.उसके लिए तर्क, आधार और सन्दर्भ की भी तलाश करें .तभी उर्जा का सकारात्मक विस्फोट होगा.गोष्ठी की अध्यक्षता प्रो राजमणि शर्मा ने किया  जबकि विशेष वक्ता के रूप में प्रो पृथ्वीश नाग मौजूद रहे. गोष्ठी में देश भर से आये लोगों के अलावा बड़ी संख्या में विभिन्न अनुशासनों के छात्र मौजूद रहे.        

Thursday, 17 November 2011

maya ki nagariya

जब माया की नगरिया लुट जाती है तब आनुभविक जगत आप को सत्य प्रतीत होता है.कौनो नगरिया लूटल हो....जिसे आप प्रत्यक्ष समझते हैं असल  में वह भ्रम है. मनुष्य के शरीर के अवयव क्षिति, जल, पावक, गगन और समीर सत्य हैं किन्तु 
शरीर असत्य.जो नष्ट हो जाए वह सत्य हो ही नहीं सकता. प्रकृति सत्य है लेकिन उसकी भौतिकता असत्य है.जितने भी मनु 
हुए हैं वे सभी  असत्य हैं क्योंकि विभेदपूर्ण सामाजिक संरचना तो आप के मनुओं ने ही दी है.प्रकृति ने तो मनुष्य बनाया है. 
गर्भ में मनुष्य समान है. उसकी पीड़ा समान है.जन्मोपरांत तो विभेद शुरू हो जाता है.इसके बाद तो अनुभूतियाँ ही सत्य होती हैं.
बहुत से बातें आप जानते हैं लेकिन आप उसके बारे में कह नहीं पाते.तो आप जो कह नहीं पाते वही सत्य है.शेष असत्य.  
     

amma ki yaad

आज अम्मा की पुण्य तिथि है. अब उनकी यादें ही बची हैं.उनके तीन पत्र भी मेरे पास सुरक्षित हैं. वे अंग्रेजी पढ़ने पर जोर देती थीं. कहती थीं कि किसी भाषा की बेहतर इस्तेमाल के लिए उसका व्याकरण जानना जरुरी है. हिंदी विषय में एम ए थीं. तुलसी की कविताएँ उन्हें जबानी याद थीं.जायसी पर एम ए में लघु शोध प्रबंध लिखा था.हम लोगों से एक भी शब्द गलत हो जाता तो डांट पड़ती थी. बेहद सख्त थीं वे.  बनारसी बोलती थीं. यदि आप उनसे खड़ी बोलते तो उसका जवाब बनारसी भोजपुरी में ही पाते.घर में कितना ओहदेदार कोई आ जाता उस समय भी वे भोजपुरी में ही बतियातीं. मेहमान के चले जाने के बाद हम भाई बहन उनसे पूछते कि अम्मा किसी के आने पर आप  क्यों खड़ी में नहीं बोलतीं? वे जवाब देतीं बनारसी हमार भाषा हौ. अईसन नाही हौ कि हम खड़ी में नाहीं बोल सकत हई लेकिन आदमी के आपन बोली और भाषा क हमेशा ख़याल रखे के चाही.समझला. वे पढ़ने का बेहद शौक रखती थीं. प्रेमचंद उनके पसंदीदा उपन्यासकार थे.जानते हैं जब वे कैंसर से जूझ रही थीं तब वे दिल का खिलौना हाये टूट गया, कोई लुटेरा आ के लूट गया.....गाना  गुनगुना रही थीं.हम सभी लोग उनके पास ही खड़े थे; उनके सामने तो रो भी नहीं सकते थे.बस यही कहते कि अम्मा ठीक हो जईबू. अम्मा ठीक नहीं हुईं. वे बड़ी धार्मिक थीं.लेकिन मरीं तो चीख चीख कर छटपटाते हुए. शायद ही कोई सप्ताह बचता रहा हो जिसमें वे व्रत न रखती हों.खैर, अब तो उनकी स्मृतियाँ ही शेष हैं.मरना तो सभी को है लेकिन यह भी कोई मरना है क्या मित्रों!     

mera dharm mahan

जो प्रत्यक्ष है उसे माया कहते  हैं.जागतिक चीजें ही विनष्ट होती हैं.जो अप्रत्यक्ष है वह अनुभूति का विषय है और अनुभूतियाँ कभी नष्ट नहीं होतीं! दूसरे यही बात तो इस्लाम धर्म के धार्मिक मतावलंबी कहते हैं कि आदम और हौव्वा की पूरी दुनिया संतान है.हिन्दू कहते हैं कि श्रद्धा और मनु के संतान हैं हम सब! अब देखिए! इसका मतलब  साफ है कि शुरूआती दिनों में अन्तर्जातीय विवाह भी हुए होंगे क्योंकि सगे भाई बहन का आपस में विवाह संभव नहीं था. इसलिए बंधु! इस तरह कि उच्चता की बात करना एक विशेष जातीय और प्रजातीय दृष्टि है.कहीं न कहीं धार्मिक कहानियां गढ़ने वाले लोगों ने गड़बड़ी की है.   

bharat me islam

मोहम्मद साहब ने इस्लाम धर्म का प्रवर्तन किया.मक्का और मदीना पहले इस्लामिक केंद्र थे.यहीं पहली बार मस्जिद बनी और नमाज भी अदा हुई. वह सातवी सदी थी. राम विलास जी आर्यों को भारत का ही मूल निवासी मानते हैं.ढेर सारे तर्क भी गढ़ते हैं किन्तु ऐतिहासिक  तथ्य कभी झूठ नहीं बोलते.फिर शासक के रूप में इस्लाम १० वीं शताब्दी में ही वर्त्तमान भारत में प्रविष्ट हुआ.इस्लाम आक्रान्ता के रूप में भारत में जरूर आया लेकिन जल्द ही उसने भारतीयों के साथ सामंजस्य बैठा लिया.उस समय  खूब हिंसक संघर्ष भी हुए थे.तब धर्म आधारित समाज में विखंडन उत्पन्न हो गया था.परिणाम स्वरुप  धर्म गुरुओं ने हिन्दू मुस्लिम एकता के लिए व्यापक स्तर पर प्रयास किया था. असल में जनता में धर्म गुरुओं की हनक अधिक थी और जनता उनके द्वारा सुझाये हुए मार्ग पर चलना ज्यादा मुनासिब समझती थी.  

Friday, 14 October 2011

karava chauth

आज करवा चौथ है.स्त्री पति की दीर्घायु और सौभाग्य के लिए व्रत रखती है.स्त्री विमर्श के झंडाबरदारों की आत्मा को ठेस लगती होगी कि क्यों पत्नियाँ ही पतियों के लिए व्रत रखती हैं?तो रहिये न पत्नियों के लिए व्रत!क्रान्तिकारियों परंपरा को बदल डालिए.मौका अच्छा है आप की भी  जय होगी! पत्नियों अर्थात स्त्रियों के उत्थान के लिए नोबल पुरस्कार भी मिल सकता है! प्लीज़ इसे नारी मुक्ति के लिए दकियानूसी विचार  मत कहिएगा.आखिर आस्था भी तो कोई चीज है!आपसी विश्वास और रिश्तों को मजबूत करता है करवाचौथ और तीज. कोई तो नहीं कहता कि तुम व्रत रहो. लेकिन समर्पण कि पराकाष्ठा और बेहद के प्रेम के प्रकटीकरण का माध्यम हैं व्रत. जजबातों को बयां करते हुए सोलहों श्रिंगार में सजधज कर स्त्रियाँ इसी बहाने करक ऋषि को याद कर लेती हैं.पति भी स्त्रियों के समर्पण पर मुग्ध होता है.वहां स्त्री विमर्श के बहाने  कामुक दुनियां नहीं होती बल्कि  वहां तो कबीर रेख सिन्दूर की.......कीसाज सज्जा होती है.तुलसी का नेहछू-मंगलगान होता है.हिंदी बिरादरी से पूछिएतो  उदाहरण बहुत  मिल जाएंगे.तो आईए पत्नी भक्त  बनें.कम से से कम समर्पण की पराकाष्ठा पर ईनाम तो मिलना ही चाहिए.
    

satta sangharsh ka naya ghamasan

सत्ता संघर्ष के लिए नया घमासान जारी है.बी जे पी की रथ यात्रा जारी है. रथ यात्रा ने बी जे पी को सत्ता के शीर्ष तक पहुँचाया था. अब रथ के घोड़े बूढ़े हो चुके हैं. वे थके थके से नज़र आ रहे हैं.उमा भारती भी अब बहुत विश्वसनीय नहीं रह गई हैं.कल्याण सिंह भी भी बेवफाई पर अमादा हैं. आडवाणी भी तुष्टीकरण की राजनीति को खंगाल चुके हैं.मुलायम सिंह ka  नया विकल्प डॉ अयूब मुसलमानों को मिल चुका है.मायावती भी बुतपरस्त हैं.सामाजिक न्याय ka  ताना बना गड़बड़ा गया है.कांग्रेस यू पी में सत्ता हासिल करने के लिए बेताब है.सत्ता संघर्ष में पौ बारह किसी की नहीं होगी. जय हो!  

Thursday, 13 October 2011

sahity banam vimarsh

साहित्य किसानों,मजदूरों और गरीब गुर्बों के हितों से निकलकर मध्यवर्ग की अभिरुचियों के अनुसार परिवर्तित हो  रहा है. साहित्य में अब प्रेम के नाम पर सेक्स बिक रहा है. यह भी ठीक  है कि साहित्य का एक उद्देश्य मॉल कल्चर में प्रवेश करते हुए;  साहित्य के भी बिग बाज़ार की तलाश करना है.दरअसल बाज़ार की जरूरतों केमुताबिक साहित्य  उत्पादित किया जा रहा है ताकि विमर्शकार विमर्श और बयां जारी  करें.

Wednesday, 12 October 2011

buddh ke prayog

बुद्ध जानते हैं: भ्रष्टाचार सामाजिक बीमारी के रूप में पनप चुका है. इससे मुक्ति के लिए किसी अन्ना की जरुरत नहीं है बल्कि मुल्क के लोगों को खुद सचेत होना होगा.वे यह भी जानते हैं कि गाँधी जी का भरापूरा परिवार था . उन्हें घर काखर्चा चलाना पड़ता था.वे कभी हार मानने वालों में से न थे.अपनेसाथ चलने वालों वालों के बल पर उन्होंने जनांदोलन  खड़ा किया था.वे अथक थे.उनका प्रतिरोध अंग्रेजी साम्राज्यवादी ताकतों के खिलाफ़ था.उस समय का जनसंघर्ष स्वतः उद्भूत था .एक पवित्रता की सियासत मुल्क में हिलकोरें ले रही थी.बन्दूकबल पर अहिंसात्मक चुनौती भारी पड़ गई थी.सत्ता बनाम सियासत में सत्य और अहिसा कि सियासत भरी पड़ गई थी.बुद्ध यह भी जानते हैं कि करुणा का भाव बाद में चलकर हिन्दुओं ने बौद्धों से ही लिया.पूरी दुनिया में धार्मिक वितंडावाद और राजतंत्र के खिलाफ़ न तो बुद्ध जैसा सशक्त स्वर मुखरित होता है और न ही गाँधी जी जैसा सशक्त अभियान  इतिहास  के पृष्ठों में  दर्ज़  है.करुणा, दया ,सत्य एवंअहिंसात्मक रास्ते को शत शत नमन! बुद्ध की कामना है कि इतिहास के पृष्ठों में उपनिवेशवाद,नव उपनिवेशवाद,साम्राज्यवाद और नवसाम्राज्यवाद के खिलाफ़ सशक्त प्रतिरोध अहिंसात्मक ढंग से पनपे. बुद्ध यह भी जानते हैं कि सत्ता बंदूकों और जिद के दबाव से नहीं  बल्कि  अहिंसात्मक  जनांदोलनों के बल पर हासिल कि जाती है.जय हो आदिकालीन एवं पारंपरिक लोकतंत्र की जय हो!  

Tuesday, 11 October 2011

aadikavi valmiki

वाल्मीकि किसी ब्राह्मन कुल में उत्पन्न हुए मनुष्य नहीं थे बल्कि वे सामाजिक स्तरीकरण के सबसे निचले पायदान से आते थेl जंगल में घूमते घूमते किसी ने क्रौच का वध किया हो; संभव है कि घुमंतू जाति के वाल्मीकि ने उक्त दृश्य को देखा हो और उनका परिवर्तित ह्रदय कविता की पराकाष्ठा पर पहुंचकर महामानव, आदिकवि और अद्वितीय कवि के रूप में प्रतिष्ठित हुआ हो l    
     

Monday, 10 October 2011

vimarsh ka ghat

समकलीन हिंदी आलोचना में आलोचना के नाम पर एक दूसरे की छीछालेदर करने की प्रवृत्ति बढ़ी है.पत्र पत्रिकाओं में जिस तरह से आलोचना के नाम पर ईर्ष्या  प्रकट की जा रही है वह वर्तमान हिंदी
की  आलोचना के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है.इस समय पता नहीं कैसे उत्तर आधुनिक विमर्श और दलित विमर्श की  साठ गांठ हो चुकी है.दुई न होई एक संग भुवाला,हँसब ठठाई फुलाउब गाला.लेकिन यह क्या इधर के उत्तर आधुनिक विमर्शकार और दलित विमर्शकार: सिर्फ विमर्शकार ही साहित्यिक आलोचक नहीं; का गठबंधनहो गया है. तो अब साहित्य की दलित राजनीति उत्तर आधुनिक विमर्शकारों की गोद में  रोते हुए लोरी सुन रही है.       

jane chale jate hain kahan

लौटता मैं जब पाठशाला से घर, अपने हाथों से खाना खिलाती थी माँ.....आज न तो अम्मा हैं और न ही इसे गाकर अक्सर रुलाने वाले ग़ज़ल सम्राट जगजीत बाबू.निदिया उन्हें भी सुला गई.अब तो अम्मा के साथ उनकी भी यादें ही स्मृति शेष रह गई हैं.जाने चले जाते हैं कहाँ दुनिया में आने वाले, जाने चले जाते हैं कहाँ.....l     

Sunday, 9 October 2011

raj me lokniti ka abhav

आज के राज में निति का अभाव है. राज की कोई निति नहीं है. प्रतिदिन  दलबदल प्रभावी है. सत्ता संघर्ष के लिए इतना घमासान पहले कभी नहीं दिखलाई पड़ा. पहले राज का धर्म होता था.अब धर्म सत्ता प्राप्ति का माध्यम बन चुका है.राम के नाम पर सरकारें बनाने वाले लोगों का पर्दाफाश हो चुका है. धीरे धीरे जातिविहीन लोकनीति का बोलबाला होगा. विकास की नीति प्रभावी होगी.

buddh ke vachan

आज मुल्क में  जाति और सम्प्रदाय आधारित सच्चाई ही दिखलाई पड़ती है. ऐसे में बुद्ध के सारगर्भित
वचन ही समाज को नई दिशा दे सकते हैं.