निराला की एक कविता है भिक्षुक. संवेदनात्मक दृष्टि से बहुत मार्मिक कविता है.लेकिन भिक्षुक कविता भारतीयों का उपहास उड़ाती है. कविता इस तरह है-वह आता/दो टूक कालेजे के करता/पछताता पथ पर आता/पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक/चल रहा लकुटिया टेक/मुट्ठी भर दाने को/भूख मिटाने को/मुख फटी पुरानी झोली फैलाता/.........साथ दो उसके बच्चे.......l इस कविता का अब तक कुपाठ हुआ है.लकुटिया टेकने वाला और कोई नहीं बल्कि निराला... की दृष्टि में गांधी जी हैं.हाड़ मांस का वह पुतला गाँधी ही हो सकते हैं.लकुटिया भी वही टेकते थे. वह भिक्षा भी आज़ादी की ही थी. दो बच्चे नेहरू और जिन्ना थे.आप पूरी कविता को ध्यान से पढ़ें तो यह गांधीवाद का उपहास उड़ाती है.सभी जानते हैं कि गांधी जी की पेट और पीठ में अंतर नहीं था. दोनों एक से प्रतीत होते थे. गांधी जी आज़ादी के मार्ग पर चल रहे थे.वे नरमपंथी थे.शान्तिपरक बातचीत को ही वे बेहतर मानते थे. दरअसल क्रांतिकारी चेतना से लैस कवि निराला का नेहरू से अंतर्विरोध था और गांधी का नेहरू प्रेम जगजाहिर है.अब जरा भिक्षुक कविता का पुनर्पाठ कीजिए तो मित्रों
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