अब न कोई गिला और न ही कोई शिकवा. उसकी हंसती खेलती दुनिया को किसी की नज़र लग गई थी. मोहब्बत की दुनिया उजड़ चुकी थी.उसकी देह आग में झुलस चुकी थी. बीबी अलविदा कह चुकी थी.अब वह जिंदा रहकर भी क्या करता? उसने सोचा था कि वह झंझावातों की दुनिया से दूर फुरसत के कुछ छड़ जीने के लिए जा रहा है. लेकिन यह क्या अब तो डाक्टर नीरज के पास सन्नाटा बुनने के सिवाय कुछ नहीं बचा था. बिलखते हुए उसने कहा कि मेरी तो दुनिया ही उजड़ गई.डाक्टर अनुमिता के लिए वह आख़िरी रात थी. जी हाँ मित्रों! यह किसी कहानी का अंश नहीं, बल्कि बर्निंग ट्रेन बनी दून हावड़ा एक्सप्रेस के भोर का दृश्य है. ए ख़ुदा! ऐसी सुबह किसी की जिन्दगी में न आए. अब तो हम आप घर से निकलते वक्त यही सोचें कि सही सलामत घर अथवा गंतव्य तक पहुँच जाएँ तो धन्यभाग!
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