Friday, 18 November 2011

shodh ki chunautiyan

पिछले दिनों बी एच यू वाराणसी में "बदलते वक्त में शोध की चुनौतियाँ" विषय पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन हुआ.गोष्ठी में मुख्य अतिथि हिंदी अदब के जाने माने विद्वान् प्रो पुरुषोत्तम अग्रवाल रहे. आलोचक प्रो अग्रवाल ने अपने रोचक व्याख्यान में कहा कि ज्ञान के किसी अनुष्ठान का सीधे सीधे सामाजिक उपयोग हो, यह जरुरी नहीं है. असल में फिलासफी हमारे सामने जीवन के बुनियादी सवाल पैदा करती है लेकिन उत्तरों के लिए हम कविता कि शरण में जाते हैं. साहित्य का कोई तत्काल उपयोग भले ही न दिखे, और वह दिखना भी नहीं चाहिए.साहित्य दुनिया को देखने का एक वैकल्पिक दृष्टि देता है, वह एक प्रकार से समग्र दृष्टि देता है. आज चल रहे सुपर स्पेशलिटी के मुद्दे पर प्रो अग्रवाल ने कहा कि वह ज्ञान के आत्म संघर्ष की सूचना देने वाला है.साहित्य की आकांक्षा सुपर स्पेशलाईजेशन  की नहीं है.टेक्नालोजी के मुद्दे उनका कहना था कि इसके प्रति नकार का भाव हमारे देशज होने का प्रमाण है.तकनीकी का परिवर्तन बिना चाहे भी होगा.गोष्ठी में महत्वपूर्ण प्रश्न उठाते हुए उन्होंने कहा कि एक छात्र अपने काम से अध्यापक को क्यों नहीं संतुष्ट कर पाता है? उन्होंने छात्रों से कहा कि यदि नौकरी के लिए आप को शोध करना है तो आप न करें वही बेहतर है. मुद्दा नौकरी का नहीं है. मुद्दा शोधार्थियों  के लिए यह है कि आप नया क्यों कर सकते हैं? यह महत्वपूर्ण है. "रिसर्च" का कुछ लक्ष्य और कुछ उद्देश्य होना चाहिए.लेकिन वह सिर्फ नया ही न हो. "नया क्यों"; ही महत्वपूर्ण है.आज हम किस बदलते वक्त में जी रहे हैं? यह देखना चाहिए. २० वीं सदी उम्मीद और संवेदनाओं की सदी थी. २१ वीं सदी विशुद्ध पहचानों की सदी बन गई है.वह तात्कालिक चिंताओं की सदी बन गई है. अगले ५० सालों में विश्व व्यवस्था बदल जाएगी. अभी कोई नहीं जानता कि बदलाव बेहतर होने वाला है या बदतर! उन्होंने कहा कि आज यह देखना महत्वपूर्ण है कि हम किस वक्त में मौजूद हैं और क्या चुनौतियाँ है? बड़ी संख्या में मौजूद छात्रों से मुखातिब होते हुए प्रो अग्रवाल ने कहा कि विनम्रता और दृढ़ता के साथ आप सवाल पूछना सीखें. सिर्फ पांव न छूते रहें. या सवाल पूछने में न हिचकें. उन्होंने उपस्थित अध्यापकों से कहा कि शोध में चरण छूने  की संस्कृति को डिस्करेज किया जाना चाहिए. नचिकेता का उदहारण  देते हुए उन्होंने कहा कि नचिकेता ने असुविधाजनक सवाल किए थे. पिता के सामने सवाल  करना सच्ची क्रांतिकारिता है. पिता की सत्ता  सबसे बड़ी होती है.नचिकेता ने सत्ता से सवाल किया था. जरुरत इस बात की है कि सही सवाल पूछे जाएँ. विश्वविद्यालयों में नचिकेता संस्कृति का विकास करने  की ज़रूरत है.दरअसल हम सही सवाल ही नहीं पूछते. रिसर्च की सबसे बड़ी चुनौती है की सही सवाल पूछिए. यमराज से नचिकेता ने सही सवाल पूछे थे.अध्यापकों से उन्होंने कहा कि आप को भी छात्रों को सुनने की जरुरत है. छात्र क्या समस्याएं महसूस करते हैं; उन्हें जानने की जरुरत है. शोध के लिए आप की चेतना में जो चीजें जड़ जमा कर बैठी हैं, उनसे  असहमति जरुरी है. नचिकेता को आदर्श बनाईये और सवाल पूछिए. विचारधारा को अवसरवाद के चलते मत बदलिए.आप जो नया करें उनके पीछे कारकों की पड़ताल करें.उसके लिए तर्क, आधार और सन्दर्भ की भी तलाश करें .तभी उर्जा का सकारात्मक विस्फोट होगा.गोष्ठी की अध्यक्षता प्रो राजमणि शर्मा ने किया  जबकि विशेष वक्ता के रूप में प्रो पृथ्वीश नाग मौजूद रहे. गोष्ठी में देश भर से आये लोगों के अलावा बड़ी संख्या में विभिन्न अनुशासनों के छात्र मौजूद रहे.        

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