आज अम्मा की पुण्य तिथि है. अब उनकी यादें ही बची हैं.उनके तीन पत्र भी मेरे पास सुरक्षित हैं. वे अंग्रेजी पढ़ने पर जोर देती थीं. कहती थीं कि किसी भाषा की बेहतर इस्तेमाल के लिए उसका व्याकरण जानना जरुरी है. हिंदी विषय में एम ए थीं. तुलसी की कविताएँ उन्हें जबानी याद थीं.जायसी पर एम ए में लघु शोध प्रबंध लिखा था.हम लोगों से एक भी शब्द गलत हो जाता तो डांट पड़ती थी. बेहद सख्त थीं वे. बनारसी बोलती थीं. यदि आप उनसे खड़ी बोलते तो उसका जवाब बनारसी भोजपुरी में ही पाते.घर में कितना ओहदेदार कोई आ जाता उस समय भी वे भोजपुरी में ही बतियातीं. मेहमान के चले जाने के बाद हम भाई बहन उनसे पूछते कि अम्मा किसी के आने पर आप क्यों खड़ी में नहीं बोलतीं? वे जवाब देतीं बनारसी हमार भाषा हौ. अईसन नाही हौ कि हम खड़ी में नाहीं बोल सकत हई लेकिन आदमी के आपन बोली और भाषा क हमेशा ख़याल रखे के चाही.समझला. वे पढ़ने का बेहद शौक रखती थीं. प्रेमचंद उनके पसंदीदा उपन्यासकार थे.जानते हैं जब वे कैंसर से जूझ रही थीं तब वे दिल का खिलौना हाये टूट गया, कोई लुटेरा आ के लूट गया.....गाना गुनगुना रही थीं.हम सभी लोग उनके पास ही खड़े थे; उनके सामने तो रो भी नहीं सकते थे.बस यही कहते कि अम्मा ठीक हो जईबू. अम्मा ठीक नहीं हुईं. वे बड़ी धार्मिक थीं.लेकिन मरीं तो चीख चीख कर छटपटाते हुए. शायद ही कोई सप्ताह बचता रहा हो जिसमें वे व्रत न रखती हों.खैर, अब तो उनकी स्मृतियाँ ही शेष हैं.मरना तो सभी को है लेकिन यह भी कोई मरना है क्या मित्रों!
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