जब माया की नगरिया लुट जाती है तब आनुभविक जगत आप को सत्य प्रतीत होता है.कौनो नगरिया लूटल हो....जिसे आप प्रत्यक्ष समझते हैं असल में वह भ्रम है. मनुष्य के शरीर के अवयव क्षिति, जल, पावक, गगन और समीर सत्य हैं किन्तु
शरीर असत्य.जो नष्ट हो जाए वह सत्य हो ही नहीं सकता. प्रकृति सत्य है लेकिन उसकी भौतिकता असत्य है.जितने भी मनु
हुए हैं वे सभी असत्य हैं क्योंकि विभेदपूर्ण सामाजिक संरचना तो आप के मनुओं ने ही दी है.प्रकृति ने तो मनुष्य बनाया है.
गर्भ में मनुष्य समान है. उसकी पीड़ा समान है.जन्मोपरांत तो विभेद शुरू हो जाता है.इसके बाद तो अनुभूतियाँ ही सत्य होती हैं.
बहुत से बातें आप जानते हैं लेकिन आप उसके बारे में कह नहीं पाते.तो आप जो कह नहीं पाते वही सत्य है.शेष असत्य.
No comments:
Post a Comment