".....उनसे मिलने की कोई न तमन्ना थी.वह घर बार की जिम्मेदारी छोड़कर सुरा और सुन्दरी के मोहपाश में उन्मत्त थे. रिश्ता कई वर्षों से उसे बोझ सा लगने लगा था. आए दिन की खटपट और तनाव भरी जिन्दगी ने सीता को न जाने कितने जन्मों तक अग्निपरीक्षा दिलवाई थी.वह सोच रही थी-पापा जानते थे कि सीता ने राम के कारण वनवास झेला था फिर भी नाम सीता ही रख दिया था. आखिर नाम का फर्क पड़ना ही था. अपने दो बच्चों के साथ वह कहाँ जाती? पति पुराने राजा महाराजाओं कि तरह आई ए एस के ओहदे पर फैजाबाद में डी एम के पद पर तैनात था. बेचारी सीता गाँव में दो बच्चों को पालती पोसती हुई जीवन गुजार रही थी."मित्रों यह लिखी जा रही कहानी "कितनी सीता" का अंश है.
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