प्रारम्भिक भारत में सामंतवादी एवं पूंजीवादी दोनों ताकतों का सत्ता में जबर्दस्त हस्तक्षेप था. जहाँ आसानी से खेती सर्वसुलभ नहीं थी वहीँ व्यापारी वर्त्तमान भारत की तरह प्रारंभ में भी सत्ता के सूत्रधार हुआ करते थे. यहाँ तक की राजाओं को व्यापारियों ने अपने सिक्के चलाए जाने के लिए मजबूर किया रहा होगा. इसके लिए व्यापारियों को अनुमति प्रदान तत्कालीन राजाओं की मजबूरी भी रही होगी. ऐसा न करने पर राजाओं को व्यापारियों द्वारा सत्ता परिवर्तन का भय सताता रहा होगा. यह ऐतिहासिक तथ्य है कि आदिकालीन भारत में व्यापारियों और स्वर्णकारों की श्रेणियों ने भी अपने कुछ सिक्के चलवाए थे. गुप्त वंश व्यापारिक घराना था, जिसने ३३५ ईस्वी से लेकर ४५५ ईस्वी तक भारत को एकता के सूत्र में आबद्ध किया. मतलब साफ़ है कि अंग्रेजी पूंजीवाद अथवा इस्लामिक पूंजीवाद से बहुत पहले ही पूंजी के बल पर भारत को गुप्त वंश के व्यापारिक शासकों ने एकता के सूत्र में आबद्ध करने की कोशिश की थी. उसका कारण तत्कालीन व्यापार पर उनका पूरी तरह काबिज होना था. चौथी सदी आते आते सामंतवादी ताकतें कमजोर पड़ने लगीं. व्यापारिक ताकतों के अगुआ चन्द्रगुप्त प्रथम ने ३१९-३२० ने अपने राज्यारोहण की प्रसन्नता में गुप्त संवत भी चलवाया. इतना ही नहीं ज्यों ज्यों व्यापारिक ताकतें सत्ता में हस्तक्षेप करने लगीं त्यों त्यों तमाम सामाजिक बुराइयां भी समाज में व्याप्त हो चलीं थीं.
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