Tuesday, 13 December 2011

hot na aagya bin paisa re

                                                                     होत न आज्ञा बिन पैसा रे
राम दुआरे तुम रखवारे, होत न आज्ञा बिन पैसा रे.. घोर कलयुग है बंधु. लोकतंत्र में बिना पैसा दिए अथवा चढ़ावा चढ़ाए कोई चमत्कार संभव नहीं है. साहब से मिलना है तो तुरंत अर्दली को १०० का नोट थमाइए. बाबू से किसी फ़ाइल को निकलवाना है तब २०० से लेकर ५०० का नोट दिखाइये. साहब से आर्डर करवाना है तब नोटों की २ से ५ गड्डी दीजिए. मंत्री जी तो नोटों के बण्डल मामले में सलाखों के पीछे जाते ही रहते हैं.लोकतंत्र रुपी पहरुआ रक्षक के रूप में खड़ा है. जनता भज रही है- होत न आज्ञा बिन पैसा रे.....जै हो कलयुगी देवताओं की: जै हो!  

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