Friday, 16 December 2011

ab pachhataye hot kya!

गलतफहमी रिश्तों में दरार पैदा करती है. आखिर इन्सान गलतफहमी को मन में पनपने ही क्यों देता है! रिश्ते लाचारगी और बेचारगी की हद तक पहुँच जाते हैं. जब पलटकर इन्सान देखता है तब बहुत देर हो चुकी होती है. आख़िरकार उसे मालूम पड़ता है कि उसने भावनाओं में बहकर स्वयं के जीवन को विनाश के पथ पर ही ढकेला था. ओह रे! अविनाशी आत्मा; चित्त क्यों न हुआ स्थिर! 

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