मित्रों! एक कविता नए वर्ष के अवसर पर आप सभी को समर्पित-
नया साल
नया एहसास
सुर्ख आँखों में
है तैर जाती
वृहत्तर कल्पना
सोचकर ही
प्रत्येक
नएपन के एहसास को
स्फूर्त होता मन
तब वासांसि जीर्णानि यथा विहाय.....
उठता है कौंध
बुद्ध का क्षणवाद
दर्शन का चिंतन
हर नएपन की
करता है परख.....
सचमुच
नयापन
असमंजस भरा
और कभी सुखद
नया हर पल
होता ही है आह्लादकारी!
ओ रे धक् धक्
धड़कता ह्रदय
समय को
खींचती
तानती
घड़ियाँ
और
हैं उनकी सूइयां
नश्तर सी चुभती
स्मृतियों की धुंधली रेखा बीच
है खो जाती
पहले प्यार की प्रतीक्षा!
अब नयापन
बाज़ारों की फूटपाथों
पर रोजमर्रा की
जरुरत का सामान जुटाती
तलाशती
तरेरती
हैं सुर्ख आँखें!
No comments:
Post a Comment