By Ranjana Srivastava ·
उसने मुझसे
मोहब्बत के बारे मे पूछा
मैं क्या कहता
मेरी आँखों के आईने में
हसरतों की काँपती ख्वाहिशें
लाल डोरे बनकर तैर रही थीं
उसने पूछा सुर्ख गुलाबों की
खामोशी का राज
गुनगुनी धूप की उजली हंसी का
पिघलते जाना और ढक लेना
दरख्तों के नरम जिस्म का जंगल
मेरे पास मदहोश खामोशियों का
बदनाम कारवां था
नशा था बेसब्री के आलम में
इश्क की ग़ज़लें गुनगुनाता हुआ
मोहब्बत के बारे मे पूछा
मैं क्या कहता
मेरी आँखों के आईने में
हसरतों की काँपती ख्वाहिशें
लाल डोरे बनकर तैर रही थीं
उसने पूछा सुर्ख गुलाबों की
खामोशी का राज
गुनगुनी धूप की उजली हंसी का
पिघलते जाना और ढक लेना
दरख्तों के नरम जिस्म का जंगल
मेरे पास मदहोश खामोशियों का
बदनाम कारवां था
नशा था बेसब्री के आलम में
इश्क की ग़ज़लें गुनगुनाता हुआ
उसकी रेशम सी देह का...
रंजना श्रीवास्तव की यह कविता प्रेम को अलग नज़रिये से देखती है.
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