आज करवा चौथ है.स्त्री पति की दीर्घायु और सौभाग्य के लिए व्रत रखती है.स्त्री विमर्श के झंडाबरदारों की आत्मा को ठेस लगती होगी कि क्यों पत्नियाँ ही पतियों के लिए व्रत रखती हैं?तो रहिये न पत्नियों के लिए व्रत!क्रान्तिकारियों परंपरा को बदल डालिए.मौका अच्छा है आप की भी जय होगी! पत्नियों अर्थात स्त्रियों के उत्थान के लिए नोबल पुरस्कार भी मिल सकता है! प्लीज़ इसे नारी मुक्ति के लिए दकियानूसी विचार मत कहिएगा.आखिर आस्था भी तो कोई चीज है!आपसी विश्वास और रिश्तों को मजबूत करता है करवाचौथ और तीज. कोई तो नहीं कहता कि तुम व्रत रहो. लेकिन समर्पण कि पराकाष्ठा और बेहद के प्रेम के प्रकटीकरण का माध्यम हैं व्रत. जजबातों को बयां करते हुए सोलहों श्रिंगार में सजधज कर स्त्रियाँ इसी बहाने करक ऋषि को याद कर लेती हैं.पति भी स्त्रियों के समर्पण पर मुग्ध होता है.वहां स्त्री विमर्श के बहाने कामुक दुनियां नहीं होती बल्कि वहां तो कबीर रेख सिन्दूर की.......कीसाज सज्जा होती है.तुलसी का नेहछू-मंगलगान होता है.हिंदी बिरादरी से पूछिएतो उदाहरण बहुत मिल जाएंगे.तो आईए पत्नी भक्त बनें.कम से से कम समर्पण की पराकाष्ठा पर ईनाम तो मिलना ही चाहिए.
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