समकलीन हिंदी आलोचना में आलोचना के नाम पर एक दूसरे की छीछालेदर करने की प्रवृत्ति बढ़ी है.पत्र पत्रिकाओं में जिस तरह से आलोचना के नाम पर ईर्ष्या प्रकट की जा रही है वह वर्तमान हिंदी
की आलोचना के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है.इस समय पता नहीं कैसे उत्तर आधुनिक विमर्श और दलित विमर्श की साठ गांठ हो चुकी है.दुई न होई एक संग भुवाला,हँसब ठठाई फुलाउब गाला.लेकिन यह क्या इधर के उत्तर आधुनिक विमर्शकार और दलित विमर्शकार: सिर्फ विमर्शकार ही साहित्यिक आलोचक नहीं; का गठबंधनहो गया है. तो अब साहित्य की दलित राजनीति उत्तर आधुनिक विमर्शकारों की गोद में रोते हुए लोरी सुन रही है.
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