Tuesday, 18 December 2012

राज पाठ

राबर्ट वढेरा इस समय अरबपति हैं। २० ० ५ (दो हजार पांच) में वाढेरा महोदय  के पास महज पचास लाख रूपये की पूंजी थी। इस समय अनेक कम्पनियां बनाकर उन्होंने  पांच सौ करोड़ रूपये से अधिक का व्यापारिक साम्राज्य खड़ा कर लिया है। सूत्रों के मुताबिक उन्होंने इतना बड़ा साम्राज्य जमीनी कारोबार से एकत्रित किया है। ठ

Thursday, 14 June 2012

nakasalvaad

यूं ही नहीं पनप रहा है नकसलवाद-
गरीब आदमी को जब दो वक्त की रोटी भी मयस्सर नहीं होती तब वह नक्सलाईट बन जाता है. विद्रोही चेतना पनपने को  नक्सलवादी कहना जायज नहीं है. ऊपर से नीचे तक नौकरशाही भ्रष्टाचार में संलिप्त है. विश्वविद्यालयों में अधिकाँश चमचे शिक्षक के रूप में चयनित हैं. गुरुजनों को सेवा करने वाले चम्मच चाहिए न कि पढ़ाने वाले शिक्षक. रीढ़ विहीन लोगों की प्रोफेसरी तय होती है. वह जमाना गुजर गया जब विभागाध्यक्ष सिर्फ विद्वानों और सूझ बूझ वालों को चयनित करते थे. आज आप देश में यू पी एस सी के अलावा किसी भी संस्था पर यकीन नहीं कर सकते. लगभग सभी बिक चुके हैं. वे भरोसे के कातिल हैं. नौकरी  बिकती है बोलो खरीदोगे, वाली स्थिति है. चारों तरफ अंधेर है. 1 रूपये में 30 पैसा सरकार का है शेष 70 पैसा कारपोरेट सेक्टर का है. सरकार बेबस है. पूंजीपतियों के दलाल घूम रहे हैं. नीतियाँ भी उन्हीं के मुताबिक़ लाभ के लिए बनती हैं. आप गरीब किसानों और मजदूरों का पैसा उन तक पहुंचा दो , अपने आप नकसलवाद समाप्त हो जाएगा. गरीबों को भी समाज की मुख्यधारा में जोड़ने की कोशिश निश्चय ही होनी चाहिए.   

Friday, 20 April 2012

aarakshan ki rajaniti

आरक्षण एक सियासी रोटी का टुकड़ा है-
जो योग्यतम हो उसे अवसर मिले. पढाई लिखाई में सरकारी सहयोग हो लेकिन नौकरियों में आरक्षण! पत्रकारिता में आरक्षण! अध्यापन पेशे में आरक्षण! न्यायपालिका में आरक्षण! सियासत में आरक्षण!.....फिर संविधान अवसर की समानता का छद्म क्यों  रचता है?  सेना में आरक्षण क्यों नहीं है? जब एक भारतीय नागरिक को वोट देने का अधिकार है तो उसे सिर्फ सवर्ण जाति के आधार पर  राजनीति में प्रवेश से क्यों वंचित किया जाता है? आरक्षण जब सिर्फ वंचितों और दलितों लिए था तो अब अल्पसंख्यक आरक्षण के पत्ते क्यों तराशे जा रहे हैं? जबकि भारत में इस्लाम के शासन का मजबूत इतिहास 1192  ईस्वी से लेकर 1857 तक का रहा है. जरा सोचिए तो मित्रों!   

Tuesday, 17 April 2012

mata pita saty hain-

कुछ तो है-
वप से बना है 'बाप' अर्थात बीजवपन करने वाला मतलब पिता. दुनिया में बाप अथवा पिता का  होना अथवा न होना जितना सच है उतना ही सच ईश्वर का होना या न होना भी है. दुनिया में बहुत सी चीजें हम सिर्फ महसूस ही कर सकते है. हम ईश्वर को नहीं देख पाते लेकिन प्रत्येक अच्छाई और बुराई को खुद के साथ घटित होता हुआ महसूस करते हैं. हमारे भीतर देवत्व की कल्पना मन के सुन्दरतम पुरुष छवि की होती है और देवी की कल्पना को माँ के रूप में मूर्त पाते है. तो यह मान लिया जाना चाहिए कि हम अपने विश्वास और आस्थाओं को सुन्दरतम प्रतिरूप में गढ़ते ही हैं.   

man ka sundaratam pratiroop hai-

कुछ तो है-
बपु से बना है 'बाप' अर्थात बीजवपन करने वाला मतलब पिता. दुनिया में बाप अथवा पिता का  होना अथवा न होना जितना सच है उतना ही सच ईश्वर का होना या न होना भी है. दुनिया में बहुत सी चीजें हम सिर्फ महसूस ही कर सकते है. हम ईश्वर को नहीं देख पाते लेकिन प्रत्येक अच्छाई और बुराई को खुद के साथ घटित होता हुआ महसूस करते हैं. हमारे भीतर देवत्व की कल्पना मन के सुन्दरतम पुरुष छवि की होती है और देवी की कल्पना को माँ के रूप में मूर्त पाते है. तो यह मान लिया जाना चाहिए कि हम अपने विश्वास और आस्थाओं को सुन्दरतम प्रतिरूप में गढ़ते ही हैं.   

Monday, 16 April 2012

vamapanth ke samaksh chunauti

भारत में वामपंथ-
हम समझते हैं कि जन जन में व्याप्त ईश्वरीय आस्था और विश्वास को चुनौती देकर हम भारत में वामपंथ को मजबूत कर सकते हैं.ऐसा कदापि संभव नहीं है. आप को उत्तर भारत के उन किसानों और मजदूरों के  बीच काम करना है जिनकी जुबाँ पर राम और कृष्ण की कहानियाँ सर्वथा रहती हैं. जिनके माता-पिता ने अपने माता, पिता  और गुरु का पैर छूया है. भारतीय परिवेश में मार्क्सवादियों को चाहिए कि वे धार्मिक मुदद्दों पर बोलने की बजाय सामाजार्थिक वर्गीय निर्धारण पर बोलें. बात ज्यादा बनती नजर आएगी. दरअसल भारतीय वाम पंथ के साथ समस्या यही है कि वह पहले भगवान को गाली गलौज देता है. अब इसने फैशन का स्वरुप ग्रहण कर लिया है. ईश्वरीय सत्ता को फैशन स्वरुप गरियाने वाले कितने वामपंथी, किसानों और मजदूरों की सहायता के लिए गाँव की तरफ मुखातिब होते हैं! आप सोचिए जिस देश की किसानी प्रकृति अर्थात ( गाँव की भाषा में भगवान ) के भरोसे चलती हो. जहां की फसलें बाढ़ और सूखे की भेंट चढ़ जाती हों, वहां भला इस देश का किसान ईश्वरीय चेतना से कैसे विमुक्त हो सकता है? आप को संशोधित स्वरुप में किसानों और मजदूरों के बीच जाना ही होगा!

bharateey vaamapanth

भारत में वामपंथ-
हम समझते हैं कि जन जन में व्याप्त ईश्वरीय आस्था और विश्वास को चुनौती देकर हम भारत में वामपंथ को मजबूत कर सकते हैं.ऐसा कदापि संभव नहीं है. आप को उत्तर भारत के उन किसानों और मजदूरों के  बीच काम करना है जिनके जुबाँ पर राम और कृष्ण की कहानियाँ सर्वथा रहती हैं. जिनके माता-पिता ने अपने माता, पिता  और गुरु का पैर छूया है. भारतीय परिवेश में मार्क्सवादियों को चाहिए कि वे धार्मिक मुदद्दों पर बोलने की बजाय सामाजार्थिक वर्गीय निर्धारण पर बोलें. बात ज्यादा बनती नजर आएगी. दरअसल भारतीय वाम पंथ के साथ समस्या यही है कि वह पहले भगवान को गाली गलौज देता है. अब इसने फैशन का स्वरुप ग्रहण कर लिया है. ईश्वरीय सत्ता को फैशन स्वरुप गरियाने वाले कितने वामपंथी, किसानों और मजदूरों की सहायता के लिए गाँव की तरफ मुखातिब होते हैं! आप सोचिए जिस देश की किसानी प्रकृति अर्थात ( गाँव की भाषा में भगवान ) के भरोसे चलती हो. जहां की फसलें बाढ़ और सूखे की भेंट चढ़ जाती हों, वहां भला इस देश का किसान ईश्वरीय चेतना से कैसे विमुक्त हो सकता है? आप को संशोधित स्वरुप में किसानों और मजदूरों के बीच जाना ही होगा!

Monday, 19 March 2012

tabah hai kisan

किसान की हालत खराब है-
छोटी जोत के किसानों का घर भर पूरे दिन सिर पर बोझा ढोता है. तंगहाल और बदहाल किसान अपनी किस्मत पर एवं पूंजीपतियों की साजिश के कारण खून के आंसू बहाने के लिए बाध्य हैं. साजिशन किसानों द्वारा पैदा किए हुए अनाज को पूंजीपति संगठित होकर कम मूल्य पर खरीदते हैं. बेचारे किसान कम मूल्य पर अनाज बेच देते हैं. अब तो किसानों के खेत में से अनाज सीधे मुनाफाखोरों की गोदामों में डंप हो जाता है. किसानों से 8 से 9 रूपये प्रति किलोग्राम की दर से अनाज खरीदकर आंटे के रूप में 15 से 16 प्रतिकिलोग्राम की दर से ये पूंजीपति राशन बेचते हैं. जय हो बीमार;.........भारत की जय हो!   

Friday, 16 March 2012

sachin ka shatak aur.....

भारतीय बजट-
बीते हुए कल की तारीख़ में जब बजट पेश करते हुए आम आदमी की जेब पर डाका डालने की तैयारी की जा रही थी तब सचिन तेंदुलकर शतकों के शतक की तरफ बढ़ रहे थे. दोनों घटनाएँ कारपोरेट जगत की उत्पाद थीं. यह शतक बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा प्रायोजित भी हो सकता है. गलाकाट बजट की तरफ से ध्यान भंग करने के लिए यह दुर्घटना घटी. अब और मनोयोगपूर्वक बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पादों को विज्ञापित कर सकेंगे सचिन. सचिन के शतकों के शतक लगाने से किसानों की खाद-सिंचाई और आम आदमी के घरों में  चूल्हा जलने की समस्या हल तो हो नहीं जाएगी! यूरिया और
पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत को बढ़ाने की तैयारी है प्रधानमंत्री जी की. कारपोरेटघरानों की उँगलियों पर नाचते हुए बजट के निहितार्थ गरीब, मजदूर और छोटी जोत के किसानों  की हत्याका सरकारी प्रयास है.  

Wednesday, 14 March 2012

ise jarur padhiye

एक अभिव्यति आपके नाम-
हौसलों से कहिए
बिखरने न दो
मुस्कान से कहिए
खिलती रहो
हुनर से कहिए
सीखते रहो
नदियों से कहिए
इतराना छोड़ दें
अरे ए दोस्त
समंदर भी कभी
बूढ़ा होता है क्या!
जज़बात भी कभी 
मुरझाते हैं क्या! 
l l  विनय कांत l l 

Monday, 12 March 2012

rajaniti ka naya daur

राजनीति का नया ट्रेंड-
कांग्रेस की हार का कारण पार्टी में एक भी जमीनी नेता का न होना रहा. जिस तरह से बेनी प्रसाद वर्मा और पी एल पुनिया बच्चों की  तरह आपस में ही लड़ते रहे उससे जनता में कांग्रेस की छवि धूमिल हुई. सलमान खुर्शीद, बेनी प्रसाद और अन्य कांग्रेसी नेताओं ने जिस तरह से साम्विधानिक संस्था भारतीय निर्वाचन आयोग के निर्देशों की अवहेलना की, उससे जनता कांग्रेसी उम्मीदवारों से नाराज हो गई. दिग्विजय सिंह भी कांग्रेस की दुर्गति के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं.कांग्रेस को यह बात समझनी चाहिए कि अब भारतीय राजनीति में हवाई यात्राओं का महत्व नहीं रहा. भारतीय जनता के चूल्हों में लगी आग को शांत करना ही होगा. दूसरे उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की जीत के निहितार्थों का सीधा सा अभिप्राय है कि देश में  वाम राजनीति का परिष्कृत ढंग से उद्भव हो रहा है.भूख अब सियासी मुद्दा है. जाहिर सी बात है कि मंदिर और मस्जिद की राजनीति करने वाले दल रोजी और रोजगार की बात तो कत्तई नहीं करेंगे.

Friday, 9 March 2012

u.p.ke yuva mukhymantri akhilesh

अखिलेश परिवारवाद की उपज नहीं हैं -
विनय कांत मिश्र। भारतीय राजनीति का रास्ता उत्तर प्रदेश की सियासी गलियाँ तय करती हैं। कभी भारतीय राजनीति में पढ़े लिखे लोगों की जमात होती थी। भारत की आज़ादी की लड़ाई जिन राजनीतिज्ञों ने लड़ी, उनमें से अधिकांश पढ़े लिखे तबके से आते थे। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, मोतीलाल नेहरू,जवाहर लाल नेहरू, सरदार बल्लभ भाई पटेल,सुभाष चन्द्र बोस, सरदार भगत सिंह और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद सहित न जाने कितने ऐसे नेता थे जो शैक्षणिक रूप से काफी सशक्त थे। पढ़ाई और लिखाई से उनका गहरा वास्ता था। तभी वे भारतीय राजनीति को नई दिशा दे सके। आज़ादी के बाद भारतीय राजनीति में उन लोगों का वर्चस्व हो चला जिनका पढ़ाई और लिखाई से कोई नाता ही नहीं रहा। पहले देश का भविष्य तय करते हुए राजनेताओं की समाजवादी, मार्क्सवादी और अन्यान्य विचारधारात्मक प्रतिबद्धता होती थी। कालांतर में इस तरह की विचारधारात्मक प्रतिबद्धतामूलक राजनीति का ह्रास हुआ। राजनीति में पूंजी और दबंगई का दबदबा हो चला। माफियाओं ने गुंडई और जोर जबर्दस्ती के बल पर जाति आधारित, पूंजी आधारित और अतार्किक राजनीति को ही प्रश्रय दिया। तर्काधारित राजनीति के विलोप ने उत्तर प्रदेश के विकास को बहुत पीछे धकेल दिया।
          इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में देश का राजनैतिक भविष्य तय करने वाले उत्तर प्रदेश की जनता ने अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी को स्पष्ट जनादेश दिया है। बेशक नेता जी मुलायम सिंह यादव सूबाई राजनीति के कर्णधार रहे हों, लेकिन अपने दम पर बहुमत तो समाजवादी पार्टी के योग्यतम उत्तराधिकारी अखिलेश यादव ने ही दिलाई है। वे मुलायम सिंह के बेटे के रूप में सूबाई जनता से मुख़ातिब नहीं हुए बल्कि वे एक समाजवादी कार्यकर्ता के रूप में लाल टोपी धारी होकर प्रदेश की जनता के बीच रहे। उन्होंने युवा ताकत को सपा के वोटर के रूप में तब्दील किया। परिपक्वता दिखलाते हुए विवादास्पद बयानों से दूरी बनाई। जब सूबाई दौरे पर समाजवादी पार्टी के एक एक कार्यकर्ताओं को अखिलेश यादव संगठित कर रहे थे तब न तो शिवपाल यादव ही नजर आ रहे थे और न कोई दूसरा ही। जब मुलायम सिंह और अखिलेश दोनों नेता परिपक्वता और युवा जज्बे को मंचों से जनता के बीच रख रहे थे तब परिवार का कोई दूसरा आदमी नेता रूप में नहीं दिखलाई पद रहा था। कहने का अभिप्राय यह है की अखिलेश ने भारतीय राजनीति में मुलायम सिंह यादव के परिवार के सदस्य के रूप में पदार्पण नहीं किया है, बल्कि वे उसी रूप में भारतीय राजनीति में नेता जी से राजनीति का ककहरा सीख कर आए हैं जैसे अन्यान्य नेताओं ने मुलायम सिंह यादव से राजनीति का ए बी सी सीखा है। बहुजन समाज पार्टी के साथ 1993 के सपा के चुनावी गठबंधन को याद कीजिए । मायावती को परिपक्व बनाने में भी नेता जी का कम योगदान नहीं रहा लेकिन बाद में  वे सत्ता मद में जनता से दूर होती चली गईं। आप याद कीजिए सपा के ही टिकट पर रीता बहुगुणा जोशी पहली बार चुनाव जीत सकीं थीं। यहीं एक बात और; पिछले विधानसभा इलेक्शन 2007 में यदि सपा की दुर्गति हुई थी, तो इसके पीछे शिवपाल और अमर सिंह ही मुख्यमंत्री के पैरलल काम करते हुए अधिक जिम्मेदार थे। सूबे के एक ईमानदार, वरिष्ठ आई पी एस अफसर ने नाम न छापने  की शर्त पर बतलाया कि पिछले कार्यकाल में नेता जी मुलायम सिंह यादव मुझे जिलों की कमान सौंपते हुए निर्देशित करते थे कि जाकर अपने तरीके  ईमानदारी पूर्वक काम करना; उधर पता चलता था कि चंद दिनों के बाद नेता जी के भाई शिवपाल जी ट्रांसफर करवा देते थे।  वरिष्ठ आई पी एस अधिकारी कहते हैं कि यदि अखिलेश जी प्रदेश के मुख्यमंत्री बनते हैं तो यह उत्तर प्रदेश का सौभाग्य होगा। एक बेहद पढ़े लिखे, समझदार, समुचित निर्णयात्मक क्षमता वाले  और अब परिपक्व हो चले  नए चेहरे से सूबे का तेजी से विकास संभव है। ऐसी आशा हम कर सकते हैं। वैसे उक्त दोनों लोगों में कोई भी मुख्य मंत्री बने, हमें तो बेहतर पुलिसिंग के लिए काम करना है।
         तब यह मान लिया जाना चाहिए कि यह योग्यतम उत्तराधिकारी को सत्ता हस्तांतरण का सही वक्त है। जिस तरह से समाजवादी पार्टी की जीत के बाद अखिलेश यादव कानून व्यवस्था को दुरुस्त रखने की लगातार बात कह रहे हैं और मीडिया से मुख़ातिब हैं उससे प्रतीत होता है कि 12 तारीख को उत्तर प्रदेश के अगले मुख्यमंत्री अखिलेश यादव हो सकते हैं। फिलहाल युवाओं द्वारा निर्वाचित युवा विधायकों की भी यही मंशा है। अंतिम निर्णय जमीनी सियासत में दिलचस्पी रखने वाले समाजवादी नेता मुलायम सिंह को लेना है।

Friday, 2 March 2012

ai dost thago mat

किसानों की दुर्दशा शुरू-
उत्तर प्रदेश सहित देश के 5 राज्यों में विधान सभा चुनाव समाप्त होते ही देश की कांग्रेस सरकार ने खाद पर से सब्सिडी हटाना शुरू कर दिया है.मतलब है कि अब पूंजीपतियों को एक बार फिर मुनाफा मिलने जा रहा है.जिस हिसाब से खाद और बीज की कीमत बढ़ती है,उस अनुपात में अनाजों का समर्थन मूल्य अथवा सरकारी कीमतें तय नहीं हो पातीं. तब छोटे  किसानों को अपने मेहनत द्वारा
उत्पादित अनाजों को संगठित पूंजीपतियों के रूप में समीप के दूकानदारों को बेचना पड़ता है.जनकल्याणकारी राज्य की अवधारणा को क्षतिग्रस्त करती सरकारों के खिलाफ सड़कों पर हल्लाबोल की जरुरत है. 

raushani

तुम्हारी हंसी गायब है
रौशनी
हाँफ रही  है
गर्म तवे की
रोटियां,
अब खुरदुरी हैं
खुरदुरे पेड़ों सी
हंसी भी
मुरझाई है!l l  विनय कांत l l

Saturday, 25 February 2012

ummeed

उम्मीद-
उम्मीद ने दांतों की तरह मुस्कुराते हुए कहा l  
बिखरते हुए भी जीने का सलीका मत भूलना l l विनय कांत l l

Friday, 24 February 2012

jinhone tarasha

आदरणीय गुरुवर के लिए-
हे गुरुवर! 
हे आलोचक! 
हे कविवर!
हे कर्मपुंज!
हे ज्ञानप्रवर! 
हे नव्य गुणाकर, ज्ञान-प्रखरl  
नव चेतनता का
भरे सिन्धु 
मन में उठतीं
लहरें गत्वरl 
l l साभार-विनय कांत l l
 
 

Friday, 17 February 2012

vote dalen

मतदान अवश्य करें-
विधानसभा चुनाव- 2012 के तहत हो रहे चौथे चरण के चुनाव में उत्तर प्रदेश के हृदयस्थल सहित विधानसभा की 56 सीटों का चुनाव कल 19 तारीख को है.आप सभी मित्रगण अपने निकट के मतदान बूथ पर वोट डालने जरुर जाईए. यदि आप का नाम मतदाता सूची में नहीं है और आप के पास वोटर आई. डी कार्ड है तो उसके लिए जिम्मेदारों से मिल कर वोट डालने की कोशिश करें. सभी तयशुदा कार्यक्रमों में मतदान पहली प्राथमिकता पर रखें.लोकतंत्र की जय हो और मतदाताओं की विजय हो.विवेक का इस्तेमाल करते हुए वोट डालें. याद रखिए कि  आपकी भावनात्मक वोटिंग से प्रदेश सहित देश का बड़ा नुकसान हो सकता है. अमीर-गरीब सभी लोकतंत्र की मजबूत कड़ी हैं.   

Thursday, 16 February 2012

kisaan tabaah hai

किसान तबाह हो रहा है-
आज देखने में यह आ रहा है कि शहरों का सोनार और अन्य व्यापारी अथवा पूंजीपति वर्ग याकि भूमाफिया समूह  गांवों में किसानों की जमीनों को खरीदकर वहां प्लाटिंग करा कर भारी मुनाफे में  बेच दे रहा है. इस पर सरकारों की दृष्टि साफ़ नहीं है. किसान मजदूरों के रूप में तब्दील होता जा रहा है. उसकी जमीनें हड़पी जा रही हैं. किसान करे भी क्या! जब वह खाद की दूकानों पर खरीददारी के लिए जाता है तब सरकारों की पुलिस लाठी उस पर लाठी बरसाती है. सरकारी योजनाओं के लिए अधिग्रहीत भूमि का मुआवजा वर्षों लंबित रहता है. धर्म रुपी अफीम की तरह मनरेगा रुपी योजनाओं ने किसानों को पंगु ही बनाया है.भयंकर लूट है.यदि 10 वर्ष बिना काम किए खाने को मिल जाए तो 11 वें वर्ष बेड़ा गर्क समझिए.मनरेगा जैसी योजनाओं को संचालित किए जाने का अभिप्राय यह है कि सरकार मान रही है कि गांवों का किसान मजदूरों के रूप में तेजी से तब्दील हो  रहा है. वर्त्तमान में देश के किसानों को संरक्षण दिए जाने की जरुरत है ताकि खेती बची रह सके. काश! छोटी जोत के वोट से निर्वाचित सरकारें ऐसा कर पातीं.  

rona aaya

सियासत-
किसानों गरीबों मजदूरों की हालात पे रोना आया l  
अब उन पे सियासी तस्वीरों की दूकान भी सजी है l l विनय कांत l l   
सियासत-
किसानों गरीबों मजदूरों की हालात पे रोना आया l  
अब उन पे सियासी तस्वीरों की दूकान भी सजी है l l विनय कांत l l   

Monday, 13 February 2012

shahayar chale gaye

शहरयार साहब नहीं रहे: विनम्र श्रंद्धाजलि-
मशहूर शहरयार साहब हमारे बीच नहीं रहे l  एक बार अलीगढ़ विश्वविद्यालय में उन्हें सुना था l  वही पाकीज़ा का लिखा एक गाना  उन्हीं के मुख से-दिल चीज क्या है/ आप मेरी जान लीजिए. बेहद संजीदा थे वे l  बाद में वे उर्दू शायरी के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजे गए l  "नींद की ओस से पलकों को भिगाएं कैसे/ जागना जिसका मुकद्दर हो वो सोये कैसे l l " और "सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ है? इस शहर में हर शख्स परेशान क्यूँ है?" यह उनके अलफ़ाज़ थे. अब वे हमारे बीच नहीं हैं तो उन्हीं के अंदाज़ में इतना ही कह सकते हैं-"वो कौन था वो कहाँ का था क्या हुआ था उसे/  सुना है आज कोई शख्स मर गया यारों l l " क्या सचमुच कवि, शायर, लेखक,
साहित्यकार अथवा कलाकार मर सकता है! नहीं, अपने लिखे से वह वर्षों हमारे बीच जिंदा रहता है; युगों युगों तक मशहूर शायर  शहरयार साहब भी हमें बहुत याद आएंगे l  जब पाकीज़ा के बोल-"जुस्तजू जिसकी थी कि उसको तो न पाया हमने/ इस बहाने देख ली मगर दुनिया मैंने" गुनगुनायेंगे तब भी शहरयार साहब बहुत याद आएंगे. उन्हें हम सभी की तरफ से विनम्र श्रंद्धाजलि अर्पित है और आज के 'वेलेंटाइन डे' के  सारे कार्यक्रम रद्द l

lokatantr pratibandhit raha




लोकतंत्र की पाठशालाएं  प्रतिबंधित रहीं
राजनीति की पाठशालाओं का प्रदेश की बहुजन समाज पार्टी की सरकार में दमन हुआ l  उनको प्रतिबंधित किया गया l विश्वविद्यालयोंअथवा प्रदेश के महाविद्यालयों में होने वाले छात्रसंघ चुनावों पर प्रदेश सरकार ने रोक लगा रखी थी l  पूरे 5 वर्ष छात्रसंघ चुनाव नहीं हुए जिसका परिणाम हुआ प्रदेश की सियासत में एक भी नए नेता का जन्म हुआ l आज विभिन्न सियासी दलों प्रदेश में टिकट पाने वाला 
विधायक उम्मीदवार किसी बड़े नेता का पुत्र, पुत्री, रिश्तेदार अथवा मित्र है l युवा नेतृत्व का अभाव हो चला है l  राहुल गाँधी हों, जतिन प्रसाद हों अथवा अखिलेश यादव हों; इन लोगों को राजनीति पितृ वंशीय परंपरा में विरासत के रूप में प्राप्त हुई है l  छात्र संघ चुनाव हुए होते तो राजनीति में नेताओं का टोटा न पड़ता l  
कल्पनाथ राय, हरिकेश बहादुर, युवा अशोक तंवर, युवा कम्युनिस्ट नेता बीजू कृष्णन और युवा कम्युनिस्ट नेत्री  कविता कृष्णन आदि कई नेता देश भर के छात्रसंघों की देन रहे हैं l  विश्वविद्यालयों अथवा महाविद्यालयों में होने वाले छात्रसंघ चुनावों से छात्र अपने आधिकारों के प्रति जागरूक रहते हैं l  विभिन्न छात्रों की समस्याओं को विश्वविद्यालय अथवा महाविद्यालय प्रशासन के सामने रखते हुए नए युवा नेतृत्व का विकास हो जाता है l  आप सोच सकते हैं कि चुनाव न होने कि वजह से महाविद्यालयों अथवा विश्वविद्यालयों में शिक्षकों का टोटा पड़ गया l  छात्रों की जायज मांगों को कोई नहीं सुनने वाला है  ल आज छात्र बिना विषय अध्यापक के डिग्री ले रहा है  l 
कालेजों के प्रोफेसर्स रिटायर्ड हो रहे हैं और उने जगह नई नियुक्ति नहीं हो रही है  l  प्रतिरोध की संस्कृति को दफनाया गया है  l  लिंगदोह समिति की मान्य नियमों के मुताबिक प्रदेश भर में छात्र संघ चुनाव संभव थे  l  लेकिन इनको उत्तर प्रदेश की सरकार द्वारा प्रतिबंधित किया जाना दुर्भाग्यपूर्ण रहा  l  मैं खुद विद्या मंदिरों में होने वाले छात्र संसद के प्रधान मंत्री पद पर छात्रों की वोटिंग द्वारा निर्वाचित हुआ था  l यह 1990 की बात है  l  बाकायदा शपथ ग्रहण समारोह हुआ था   l हम लोगों में एक अजीब सा उत्साह होता था l हम लोगों कि जिम्मेदारी होती थी कि स्कूल के किसी भी सामान को  नुकसान न पहुंचे  l  तो यह सब उन दिनों हम लोगों की मानसिक चेतना में बैठ सा गया था  l  इस तरह छात्रसंघ चुनावों से युवा नेतृत्व में जजबा भरा जाता है  ल छात्र शक्ति के भीतर  प्रतिरोधात्मक चेतना का बीजारोपण होता है  l  काश पहले की तरह छात्र संघ चुनाव फिर पूरे प्रदेश में हो पाते जिससे राजनीति में वंशवाद का खात्मा भी हो पाता l           

Sunday, 12 February 2012

alabela aur akela j.n.u.

// "अलबेला और अकेला जे एन यू" //
' विनय कांत मिश्र '
दुनिया में ऐसे कम संस्थान होंगे जिसने अपने विद्यार्थियों में आत्म सम्मान के साथ जिज्ञासा का भाव भरा हो। देखा है आपने कहीं कि छात्राएं रात के दो बजे तक निडर होकर सड़कों पर घूम सकें। यह भी कम देखा होगा कि विद्यार्थी कक्षा में अध्यापक से तार्किक रूप से बहस करें और अध्यापक उस तर्क वितर्क का कतई बुरा न मानें। कम से कम भारत में तो नहीं ही दिखलाई पड़ेगा। जे. एन. यू. में कुछ अध्यापक अपने विद्यार्थियों से इतना स्नेह करते हैं कि हर व़क्त वह अपने विद्यार्थियों की बेहतरी के बारे में ही सोचते हैं। जे. एन. यू. में नामवर जी ऐसे ही शिक्षक हैं। जे. एन. यू. में शिक्षकों में चिन्तन-मनन और छात्र-छात्राओं के बीच बहस मुबाहिसों के द्वारा यहाँ की संस्कृति एक ऐसे जनतांत्रिक संस्कारों का विकास करती है जिसमें मोहब्बत दो तरफा होती है। एक तरफा मोहब्बत होती तो जे. एन. यू. भी दूसरे विश्वविद्यालयों की तरह ही होता। इस विश्वविद्यालय की लोकतांत्रिक प्रणाली की तफतीश करती है; सुमन केशरी द्वारा सम्पादित पुस्तक, जे एन यू में नामवर सिंह। किसी किताब के संपादन के पीछे संपादक की कुछ वाजिब चिन्ताएं होती हैं। क्या इस किताब को महज नामवर जी के संस्मरण की किताब के रूप में ही पढ़ना और समझना चाहिए? अथवा इस किताब और इसकी संपादक के वास्तविक उद्देशयों की पड़ताल होनी चाहिए। यह किताब पाठकों से विवेक के इस्तेमाल की मांग करती है।
जे. एन. यू. में नामवर सिंह की सम्पादक सुमन केशरी जी खुद जे. एन. यू. की छात्रा रही हैं। जे. एन. यू. में उन्होंने लम्बा वक्त गुजारा है। इसलिए उनके पास इस विश्वविद्यालय के अनुभव भी अधिक हैं। छात्रा के रूप में वे गुजरे जमाने के दिलचस्प अनुभवों को पाठकों के साथ साझा करती हैं। इस किताब के लेखक के अनुभवों का वास्तविक धरातल ही, इसे उपन्यास की सी दिलचस्पी प्रदान करता है और इसे उपन्यास के रूप में पढ़ने के लिए प्रेरित भी करता है। सफल संपादन के रूप में जे. एन. यू. में नामवर सिंह औपन्यासिक शिल्प धारण करती है। यह औपन्यासिकता एक त्रासदी को परिलक्षित करती है। यह त्रासदी मूल्यों के टूटन की है। ग्लोबल परिदृष्य में परिवर्तित होते हुए संस्थानों की है। विश्वविद्यालय में उखड़ते हुए लोकतंत्र की है। जे. एन. यू. के बहाने विश्वविद्यालयों के बहुत ही संजीदा मुद्दों को इस किताब में उठाया गया है। 'जे. एन. यू. में नामवर सिंह' महज एक किताब नहीं है बल्कि यह व्यवस्था में सीधे हस्तक्षेप है। यह किताब सिर्फ नामवर जी के बारे में नहीं है बल्कि जे. एन. यू. के बारे में है। किताब की यात्रा एक विस्तृत अनुभव लोक से गुजरने की है। जे. एन. यू. की जिजीविषा की है।
इस किताब के संपादन के द्वारा सुमन जी जे. एन. यू. जैसे संस्थान के उज्ज्वल पक्ष को तो स्वयं और दूसरे लेखकों के नजरिए से रखती ही हैं, साथ ही जे. एन. यू. के बदले हुए हालात पर उभरी हुई त्रासदी को विस्तार के साथ साझा करती हैं। किताब के शीर्षक पर ठीक से ध्यान दीजिए और तब इस पुस्तक को पढ़िए। आप देखेंगे कि यह किताब अनुभव एवं भोगे हुए यथार्थ की दहलीज़ पर कदम दर कदम बढ़कर संपादित की गई है। यहाँ सच्चे अनुभव को बांटने की खुली छूट है। सुमन जी कहती हैं कि इस किताब को सम्पादित करते समय मैंने जे. एन. यू. के कई लोगों से पूर्वाग्रह को छोड़कर ईमानदारी से लिखने की अपील की थी। कुछ ने लिखकर दिया और कुछ ने वादा खिलाफी की। कुछ लोगों को सम्पादक ने ‘‘जानबूझ कर न्यौता नहीं दिया।’’ उद्धृत पृ. सं. 9।। ऐसा नहीं है कि इस किताब में नामवर जी की बड़ाई ही बड़ाई है। बल्कि कई संस्मरणों में लेखकों की निजी पीड़ा को अभिव्यक्त करती हुई आलोचना भी है।
संपादन कोई आसान काम नहीं है। बहुत जोखिम हैं इसमें। खासकर तब जिस पर किताब लिखी जा रही हो, वह जीवित एवं नामचीन हो। उस पर लिखने वाले लोग कभी उसके करीबी रहें हों तो लिखने वाले के मन में एक झिझक तो रहती ही है। कहीं वह नामचीन आदमी बुरा न मान जाए। लेकिन नामवर जी राग-द्वेष से परे मुनि मार्क्सवादी हैं। भगवान जोश जी नामवर जी के बारे में लिखते हैं, ‘‘भारत के प्राचीन एवं मध्यकालीन साहित्य में मार्क्सवादी विचारों का पुनर्वास करना और उन्हें पुनः आविष्कृत करके एक नए तेवर अर्थात भारतीय तेवर में प्रस्तुत करना। एक दूसरे अर्थ में भी उनकी तरह के मार्क्सवादी को मैं सहज मार्क्सवादी कहता हूँ।’’ उद्धृत पृ. सं. 63।। उनका मार्क्सवादी चीजों को अपने नजरिए से देखता है। अपनी तत्वबोधिनी दृष्टि में चीजों को सहज ही समाविष्ट कर लेता है। नामवर जी के बारे में भगवान जोश जी का यह कथन ध्यातव्य है, ‘‘सारे भारत में केवल नामवर सिंह ही ऐसे मार्क्सवादी चिन्तक हैं जो अनेक भारतीय भाषाओं के साहित्य से भली भांति परिचित हैं।’’ उद्धृत पृ. सं. 63।। नामवर जी की अनेक देशी व विदेशी भाषाओं की समझ में जे. एन. यू. के स्कूल आफ लैंग्वेजे़ज की महत्वपूर्ण भूमिका रही। 
यह पुस्तक तमाम जोखिम उठाकर एक व्यक्ति के बहाने सामाजिक दुनिया की खोज करती है। इस खोज के लिए सुमन केशरी जी ने स्वयं बहुत मेहनत की है। सम्पादकीय में जे. एन. यू. के अकादमिक जगत को सॅजोए रखने को वह आनुष्ठानिक कार्य मानती हैं। वे सम्पादकीय में लिखती हैं, ’’यह किताब आलोचक नामवर सिंह या अध्यापक नामवर सिंह का मूल्यांकन करने के उद्देश्य से तैयार की जा रही पुस्तक नहीं है बल्कि आज जब शैक्षणिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर तरह तरह के हमले हो रहे हैं, यह पुस्तक देश की एक विशिष्ट संस्था, उसके निर्माण में नामवर जी के योगदान और स्वयं नामवर जी के विकास में उस संस्था के महत्व को रेखंकित करने के उद्देश्य से तैयार की गई है। इस तरह से यह एक व्यक्ति का मूल्यांकन नहीं बल्कि चिन्तन के एक खास स्कूल के प्रभावों-परिणामों का भी लेखा-जोखा करने जा रही पुस्तक है।‘‘ उद्धृत पृ. सं. 6।। व्यक्ति बनाम संस्था और संस्था बनाम व्यक्ति के द्वन्द्वात्मक संबंधों से यह लेखा जोखा नवीन प्रभावोत्पादक परिणामों की खोज करता है। कहना मुनासिब है कि नामवर जी से शुरू हुआ भारतीय भाषा केन्द्र का सफर अकादमिक कीर्तिमानों के झण्डे को समूची दुनिया में बुलन्द करता है।
जब किसी अकादमिक संस्थान से जुड़ने वाले अध्यापक, विद्यार्थी एवं अन्यान्य अपने जीवन में सर्वश्रेष्ठ कार्य करते हैं तब वह संस्थान भी गौरवान्वित होता है। दरअसल जे एन यू में नामवर सिंह किताब की संपादक सुमन जी की कोशिश शुरू से आखिर तक यही रही है कि व्यक्ति से समाज और समाज से संस्थान तक के सफर को ईमानदारी के साथ तय किया जाए। सुमन जी ने स्वयं नामवर जी का एक लम्बा साक्षात्कार लिया है। इसके साथ ही उनका एक अविस्मरणीय संस्मरण भी है। सुमन जी ने नामवर जी के साक्षात्कार में अकादमिक जगत की स्वायत्तता के मुद्दे को पुरजोर ढंग से उठाया है। इस किताब की संपादक का दावा है कि इसमें पुरानी यादें भी हैं, कसक भी है और खुशी भी। जे. एन. यू. से किसी न  किसी रूप में जुड़े हुए लोगों के अनुभवों को यह किताब बांटती है। इसके साथ ही व्यक्ति संस्था को किस तरह निर्मित करता है और संस्था किस तरह व्यक्ति के रचनात्मक निर्माण में अविस्मरणीय योगदान प्रस्तुत करती है; इसके बारे में भी यह किताब बोलती है। जीवित व्यक्ति ही तो बोलता है और जब किताब बोलने लगे तब! तब वह उत्कृष्ट रचना कालजयी हो जाती है। अच्छी किताबों की बोली और भाषा नवीन रचनात्मक एवं कलात्मक सन्दर्भों की सृष्टि करती है। समस्याओं को नए ढंग से उठाती है। उन समस्याओं के निदान के लिए बहस करती है।
किताब के बारे में खास बात यह कि इसमें नाटकों की सी रोचकता भी है। इस किताब की संपादक सुमन केशरी किताब के प्रारंभ में ही लिखती हैं कि नामवर जी के एक वक्तव्य, इंटरव्यू तथा चौंतीस लेखों से तैयार, यह पुस्तक छह खंडों में विभाजित है। यथा-1. बज़ुबान ख़ुद, 2. जे.एन.यू.तब से अब तक, 3. बाहर निकल कर, 4. कमी खली, 5. एक पक्ष यह भी और 6. हम भी साथ हैं। अब इसमें आप सुमन जी की प्रारंभिक उद्घोषणा को इस नाटकीय शिल्प की पुस्तक के कथानक की सृष्टि के रूप में ले सकते हैं। इस किताब के छह खंडों को इसके छः अंकों के रूप में पढ़ सकते हैं। जे. एन. यू. की इस रंगमंचीय पटल पर नामवर सिंह प्रमुख पात्र के रूप में आते हैं। राजकमल के अशोक महेश्वरी, संपादक सुमन केशरी, प्रो. पुरूषोत्तम अग्रवाल, प्रो. भगवान जोश, प्रो. सदीकुर्रहमान किदवई, प्रो. केदारनाथ सिंह, डा. गोबिन्द प्रसाद, प्रो. गोविन्द पुरूषोत्तम देश पांडे, डा. असलम परवेज, प्रो. पुष्पेश पन्त, प्रो. आनन्द कुमार, प्रो. तुलसीराम, प्रो. सुवीरा जायसवाल, प्रो. शबरी मित्र, प्रो. चमन लाल, प्रो. रामबक्ष, डा. रामचन्द्र, प्रो. मुज़फ़्फर आलम, समीर वरण नन्दी, डा. राजकुमार, डा. ज्योतिष जोशी, डा. सुरेश शर्मा, डा. राजेन्द्र शर्मा, डा. राजेन्द्र प्रसाद पांडेय, डा. जितेन्द्र श्रीवास्तव, सुमन केशरी, आनन्द पांडेय, डा. धीरेन्द्र बहादुर सिंह, सूरज, सुधा निकेतन रंजनी, लक्ष्मीनारायण मलिक, के. एम. शर्मा, अनस अहमद, रामदुलारे, मदन लाल राव और पूरणचन्द सह पात्रों के रूप में पाठकों या यह कहिए कि दर्शकों से रू-ब-रू होते हैं। सबकी अपनी अपनी अलग अलग दुनिया है और सबके अपने अपने अनुभव। जे. एन. यू. में नामवर सिंह के रंगमंच पर उक्त सभी पात्र एक एक कर आते हैं। सबके अपने अपने पार्ट हैं। सभी अपना रोल अलग अलग अदा करने के साथ पात्रानुकूल निभाते चलते हैं।
जे. एन. यू. में नामवर सिंह अकादमिक संस्थानों में उभरती हुई त्रासदी का लेखा जोखा प्रस्तुत करती है। बाज़ारवादी संस्कृति एवं उपभोक्तावादी संस्कृति के वर्चस्व में प्रतिरोध के स्वर को दर्ज़ करती है। यह किताब हिन्दी के विद्यार्थियों को रोजगार के अवसर सृजन की मांग को पुरजोर ढंग से उठाती है। जे. एन. यू. के भारतीय भाषा केन्द्र के हिन्दी और उर्दू पाठ्यक्रम को एकेडमिक और जनवादी एप्रोच के अनुसार बनाना नामवर जी की खासियत रही है। इसके साथ ही इस साझी विरासत में साहित्य को अन्य अनुशासनों के साथ जोड़ना उन्हें बखूबी आता है। प्रो. सदीकुर्रहमान किदवई यहाँ के विभाग के बारे में लिखते हैं, ‘‘यहाँ जे. एन. यू. में और विश्वविद्यालयों की तरह उर्दू और हिन्दी के विभाग अलग-अलग नहीं थे। सेन्टर आफ़ इंडियन लैंग्वेजे़ज में दोनों की पढ़ाई साथ-साथ होती थी। कोर्स, रिसर्च और पढ़ाने की रणनीति इस तरह बनाई गई कि जहां तक सम्भव हो ज्वाइंट रिसर्च कराया जाए, पढ़ाई में उर्दू-हिन्दी की फै़कल्टी साथ-साथ शामिल हो। फंक्शंस साथ हों-इसीलिए ईद मिलन और होली मिलन मनाया जाता था।’’ उद्धृत पृ. सं. 65, 66।। छात्र-छात्राओं को  त्यौहारों को साथ-साथ मनाना सिखलाया जाता था। पाठ्यक्रम के द्वारा छात्र-छात्राओं में लोकतांत्रिक समझ विकसित की जाती थी। तब उस दौर में साहित्य के विद्यार्थियों के लिए अधिक अवसर नहीं थे। लेकिन बदले हुए हालात में जब अनुवाद, मीडिया और विज्ञापन की दुनिया में अवसर की अधिकता है तब हिन्दी ही नहीं वरन भारतीय भाषाओं के साहित्यिक विषयों में इन पाठ्यक्रमों को भी शामिल किया जाना चाहिए। सिर्फ पाठ्यक्रम के रूप में ही नहीं, वरन कलावन्त साधक के रूप में विद्यार्थियों को तैयार किया जाना चाहिए। अभिव्यक्ति के खतरे उठाते हुए सामाजिक विषमताओं के खिलाफ संघर्षशील नागरिकों के निर्माण में भी जे. एन. यू. का पाठ्यक्रम सर्वोत्कृष्ट रहा है। यह जनवादी एप्रोच का है। विद्यार्थियों के निर्माण में बदलते हुए समय के अनुसार नवीनतम पाठ्यक्रमों का रचनात्मक उपयोग होना भी जरूरी है।
नाटक के इस रंगमंच पर इस किताब के नायक नामवर सिंह, बज़ुबान खुद के प्रथम अंक में अब तक क्या किया... के द्वारा पाठकों से मुख़ातिब होते हैं। वे कहते हैं, ‘‘सच पूछें तो ख्याल थे कुछ, कुछ कुछ आइडियाज़ थे और उस नाटककार या उस एक्टर की तरह से मुझे थियेटर की तलाश थी, जहाँ मैं कम से कम वो थियेटर आफ आइडियाज़ कह लीजिए, व्यूज कह लीजिए जहाँ मैं उस रंगमंच को भरे-पूरे रूप में प्राप्त करके कुछ दिखाऊँ ज़ाहिर है, उसके लिए सहयोगियों की जरूरत थी। और ऐसे कुछ सहयोगी मिले भी।।’’ उद्धृत पृ. सं. 18।। तो इस किताब में जे. एन. यू. रंगमंच है और बाकी सभी इसके पात्र। इस रंगमंच के सभी पात्र कमोवेश जे. एन. यू. के रंगमंचीय क्षितिज को बचाने की कोशिश करते हैं। इस रंगमंच और इसके विभिन्न पात्रों के द्वारा अनेकानेक मुद्दों को उठाने में संपादक सुमन जी सफल रही हैं। जे. एन. यू. के बहाने समाज में चाहे वह स्त्री मुक्ति का प्रश्न रहा हो अथवा भाषाई सामंजस्य याकि सिस्टम में जनतांत्रिक निर्माण एवं विकास पद्धति का; सभी को अंतरंगता पूर्वक यह किताब खॅंगालती है। खॅंगालती ही नहीं बल्कि कहिए कि व्यवस्था में हो रहे नकारात्मक परिवर्तनों पर जायज चिन्ता भी व्यक्त करती है। यह सच है कि अतीत की स्मृतियाँ सुखद होती हैं। जब इस किताब के लेखक अपने व्यतीत की दुनिया में गोते लगाते हैं तो सुखद एवं दुखद दोनों एहसास पाठकों के समक्ष आते रहते हैं। फ्लैश बैक पर चलती हुई पूरी किताब व्यतीत के बहाने वर्तमान को बचाए जाने के आग्रह के लिए जिरह करती है। लेखकों के द्वारा पक्ष और प्रतिपक्ष को रखकर यह किताब अदालती कार्यवाही को पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करती है। जे. एन. यू. की दुनिया में यह किताब एक जनतांत्रिक कार्यवाही की तरह सकारात्मक हस्तक्षेप है। गिरा अरथ जल बीचि सम, कहियत भिन्न न भिन्न सदृश दो तरफा जनतांत्रिक कार्यवाही है। इस जनतांत्रिक कार्यवाही को आगे बढ़ाने में गुरू-शिष्य का दो तरफा संवाद सहायक सिद्ध होता है। लोकतांत्रिक परंपरा तो यही कहती है कि संस्था के निर्माण में उसके भौतिक संसाधनों से अधिक उसके मानवीय संसाधन काम आते हैं। वह भी विशेषकर उसके छात्र, छात्रा, अध्यापक, कर्मचारी एवं विश्वविद्यालयीय परिसर में पड़ने वाले बाज़ार में कामगार तबके के लोग, जोकि लोकतांत्रिक वातावरण का सृजन करते हैं। उस मिट्टी का अभिन्न हिस्सा होते हैं। उसकी महक को दूर तक बिखेरते हैं।
जे. एन. यू. का भारतीय भाषा केन्द्र भारत के किसी भी धार्मिक केन्द्र की तरह हमारी साझी विरासत है। उतना ही पवित्र। रघुवंश महाकाव्यम् के प्रारम्भ में ही कवि कालिदास ने लिखा है-‘‘वागर्थाविव सम्पृक्तौ, वागर्थ प्रतिपत्तये। जगतः पितरौ वन्दे, पार्वती परमेश्वरौ।।’’ इस विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केन्द्र की वाक् में नामवर जी अर्थ भरते हैं। जिस तरह शब्द में ही अर्थ की सत्ता विद्यमान होती है ठीक उसी तरह जे. एन. यू. और नामवर सिंह जी हंै। कम से कम हिन्दी की अकादमिक दुनिया के लिए तो हैं ही। जे. एन. यू. शब्द है। नामवर जी उसके अर्थ गौरव हैं। संस्कृत साहित्य में भारवि को उनके अर्थ गौरव के कारण ही तो याद किया जाता है। प्रत्येक शब्द का अर्थ है और नामवर जी उसके सही अर्थ हैं। जिस तरह किसी शब्द का पर्यायवाची नहीं होता तो जे. एन. यू. एक विश्वविद्यालय है। इस विश्वविद्यालय  का कोई दूसरा समानार्थी पर्यायवाची नहीं है। हाॅं, विश्वविद्यालय तो तमाम हैं लेकिन जे. एन. यू. की तरह नहीं। किसी भी शब्द का ठीक अर्थ तो कई हो सकते हैं लेकिन सटीक अर्थ तो एक ही होता है। नामवर जी उस विश्वविद्यालय के सटीक अर्थ हैं-सटीक। वे जब लिखते हैं, ‘‘यह कुंवारी धरती थी, हर तरह से कुंवारी थी।’’ उद्धृत पृ. सं. 18।। नामवर जी ने उस कुंवारी धरती का श्रृंगार किया।
समीर वरण नन्दी जी लिखते हैं, ‘‘नामवर जी की छवि प्रेम सम्बन्धों के विपरीत थी। वहीं हममें प्रेम का रचनात्मक स्वरूप विकसित हुआ। कोई न माने पर मैं मानता हूँ कि उन्होंने हमारे ज्ञान और प्रेम दोनों को तराशा। गुरू, गम्भीर-निष्ठुर भाव से जो हथौड़ा मारता है-भीतर, वहीं से मजबूती है।’’ उद्धृत पृ. सं. 145।। नामवर जी ने विद्यार्थियों में ज्ञान तत्व को प्रस्फुटित किया। प्रेमतत्व का बीजारोपण जे. एन. यू का सुरम्य वातावरण कर ही रहा था। जिस तरह आचार्य रामचंद्र शुक्ल के हवाले से भक्ति काव्य ज्ञानतत्व और प्रेमतत्व एवं साकार रूपतत्वों से सजा सॅंवरा हुआ है ठीक उसी तरह जे. एन. यू. का भारतीय भाषा केन्द्र नामवर जी के सगुण साकार रूप तत्वों से युक्त है। वे इस विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा  केन्द्र में आधुनिक युग में ज्ञानतत्व एवं प्रेमतत्व का रासायनिक सम्पुट तैयार करते हैं। उनकी चाहत इस किताब में उनके मुख से ही सुनिए-‘‘जे. एन. यू. के बौद्धिक वातावरण में हमारा लड़का अपने को हीन न महसूस करे। इंग्लिश कितनी जानता है या नहीं जानता, यह महत्वपूर्ण नहीं है। कम-से-कम जहाँ नालेज की बात हो वहां वेस्टर्न लिटरेरी थ्योरी, आइडियोलाजी आदि सब उसको मालूम हो। समाज शास्त्र, इतिहास या अन्य किसी विषय पर चर्चा हो तो हिन्दी का विद्यार्थी केवल हिन्दी का न होकर रह जाए। इंटलेक्चुअली दूसरे लोगों से भी उसके संवाद हों, उसमें वो पीछे न हो। मैं चाहता था कि हमारा विद्यार्थी पुरानी भारतीय परम्परा से भी अपने को अलग न रखे। एक खुलापन हो। वैसा बैकग्राउंड भी हो।’’ उद्धृत पृ. सं. 33।। तो अघ्यापक नामवर सिंह साहित्य के ऐसे पड़ाव हैं जहाँ आधुनिकता और प्राचीनता का समागम होता है। वेश-भूषा और पहनावे से वे परम्परावादी प्रतीत होते हैं जबकि ज्ञान, कर्म एवं बोध से वे निहायत ही आधुनिक हैं। उनकी विचारधारा मार्क्सवादी है।           
जे. एन. यू. में नामवर सिंह पुस्तक एक ऐसी पुस्तक है, जोकि विश्वविद्यालययीन संस्कृति को बयां करती है। एक विश्वविद्यालय की उसके विद्यार्थियों और अध्यापकों के निर्माण में कितनी भूमिका होती है, उसके आब-ओ-हवा का वहां के बौद्धिक वातावरण के सृजन में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका होती है; यह इस किताब को पढ़ते हुए बेहतर ढंग से जाना जा सकता है। गौरतलब है कि जे. एन. यू. में नामवर सिंह अद्वितीय हैं। वे किसी भी विद्यार्थी की रचनात्मक शक्ति के विकास-पुंज है। यह पुस्तक सीधे और कई सवालों से टकराती है। यदि जे. एन. यू. में नामवर जी न होते तो क्या वे वही होते जो इस विश्वविद्यालय में आने के बाद बनते हैं? यह नामवर जी से ही सुनते हैं, ‘‘मैंने मैनेजर पांडेय की विदाई के समय एक बात कही थी कि हम लोग ये तो जिक्र करते हैं कि जे. एन. यू. को हमने बनाया। यह हम भूल जाते हैं कि जे. एन. यू. ने हमको कितना बनाया। जे. एन. यू. का एक वातावरण है, हमारे छात्र-छात्राओं ने हमें बनाया है। उनसे संवाद के दौरान हमने बहुत कुछ सीखा है। उनके सवाल ऐसे होते थे जिनका जवाब देने के लिए तैयारी करके जाते थे ताकि हम इस लायक हों कि उनके सवालों का सन्तोषप्रद जवाब दे सकें।’’ उद्धृत पृ. सं. 35।। नामवर जी के निर्माण में जे. एन. यू. की महत्वपूर्ण भूमिका रही। यहाँ छात्रों की रचना-प्रक्रिया में नामवर जी और उस सुरम्य वातावरण ने सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दोनों ही जनतांत्रिक परंपरा के स्वाभाविक विकास थे।
नई दिल्ली में अरावली की पर्वत श्रेणियों पर बसा हुआ जे. एन. यू. गुरू-शिष्य के संबंधों की डोर को मजबूत करता है। विश्वविद्यालय की जो चीज उसे अन्य विश्वविद्यालयों से अलग करती है वह है  परस्पर संवाद। जबर्दस्त अंतर्कि्रयात्मक सम्बन्धों से वाद-विवाद और संवाद की जो छटा यहाँ दृष्टिगत होती है, वह अन्य विश्वविद्यालयों में दुर्लभ है। यहाँ के लोगों में अपनापा का भाव बहुत अधिक है। यहाँ का कोई छात्र कई वर्ष बाद भी आपस में मिलता है तो अपनत्व का भाव, रचनात्मक तृप्तता को स्वादिष्ट ही बनाता है। इन्हीं सब भावों और भावबोध को यह किताब दिखलाती ही नहीं अपितु परिष्कृत भी करती है। इन्हें बचाए रखने की वकालत करती है। एक दस्तावेज़ बनती है।
जे. एन. यू. की जानिब से नामवर जी एक पुरोधा के रूप में दुनियावी ताकतों से मुख़ातिब होते हैं। ऐसा इसलिए हो सका क्योंकि जे. एन. यू. की दर-ओ-दीवार ने यहाँ बौद्धिकों की भारी तादाद पैदा की है। जे. एन. यू. ने पूरे देश में ही नहीं बल्कि कि पूरे विश्व में ज्ञान की स्रोतस्विनी प्रवाहित की है। यहाँ के दरख़्तों में बने हुए घरौदों में बसने वाले परिन्दों ने कल्पना की पंख लगाकर छात्र-छात्राओं को उड़ना सिखलाया है। अधिकांश अध्यापकों को छात्र-छात्राओं की जिज्ञासा को शांत करना सिखलाया है। मजाल था कि कोई कमजोर अध्यापक कक्षा में टिक जाता? वह बिना पढ़े कक्षा में चला आए तो बेइज्जत होने का खतरा मॅंडराता रहता उस पर!  हालांकि वहां अब के अध्यापक नामवर जी की तरह जनतांत्रिक नहीं रहे। यही जे. एन. यू. का क्षरण है और उभरने वाली त्रासदी भी। यहीं एक बात का उल्लेख करना चाहूँगा कि जोर जुगाड़ से नियुक्त होने वाला शिक्षक भी विद्यार्थियों की जिज्ञासापरक रचनात्मकता की  तृप्ति न होने पर  कोपभाजन का शिकार बनता। आखिर क्या था उस विश्वविद्यालय की ईंट दर ईंट में! जी नहीं, ऐसा कतई नहीं कि दूसरे विश्वविद्यालय में पढ़ाई नहीं होती अथवा नियुक्तियों में जुगाड़ नहीं चलते? पहले जे. एन. यू. में जब नामवर जी सेंटर के अध्यक्ष थे तब वहां अध्यापक बनने की पात्रता विद्यार्थियों की जिज्ञासात्मक भूख को शांतकरना होती थी। यही कारण है कि जे. एन. यू. ने हिन्दी की अकादमिक दुनिया को प्रो. पुरूषोत्तम अग्रवाल जैसा अध्यापक, आलोचक एवं उत्कृष्ट अनुसंधित्सु दिया। जे एन यू में नामवर सिंह किताब से प्रो. मैनेजर पांडेय और  प्रो. वीर भारत तलवार का स्मृतिलोक गायब है। जबकि इस किताब की सम्पादक का कहना है, ‘‘प्रो. वीर भारत तलवार ने लिखने से साफ इन्कार कर दिया।‘‘ उद्धृत पृ. सं. 11।। प्रो. पांडे के बारे में संपादक मौन हैं, उन्होंने नहीं लिखा, या संपादक ने उनसे नहीं कहा, यह स्पष्ट नहीं होता।
जे एन यू में नामवर सिंह किताब की संपादक सुमन जी की चिन्ता विश्वविद्यालयों में नियुक्त होने वाले योग्य शिक्षकों की है। वे नामवर जी से साक्षात्कार में पूछती हैं, ‘‘हमारे यहाँ लेक्चरर बनने के लिए कुल 15 मिनट या आधा घंटा या हद से हद एक घंटे का इंटरव्यू काफी माना जाता है। भले ही वो उसके बाद पढ़ा पाए या नहीं।’’ उद्धृत पृ. सं. 40।। इस पर नामवर जी कहते हैं, ‘‘इंटरव्यू में बुलाकर 5-10 मिनट में किसी की योग्यता का पता नहीं चलाया जा सकता।’’ उद्धृत पृ. सं. 41।। विश्वविद्यालयों में होने वाली नियुक्तियों में पारदर्शिता को लेकर दोनों की चिन्ता जायज है। दोनों लोग इस बेहद अहम मुद्दे पर ‘‘चेक एंड बैलेंस’’ की नीति पर सहमत होते हैं। उद्धृत पृ. सं. 42।। आखिरकार, विश्वविद्यालयों में होने वाली एक भी गलत नियुक्ति से छात्र-छात्राओं का बड़ा अहित होता है और जीवन भर अयोग्य शिक्षकों के पल्ले पड़ने वाले कोर्स की समझ विद्यार्थियों में अधूरी रह जाती है। किताब में अयोग्य शिक्षकों की तरफ संकेत भी है। उनके द्वारा छात्र-छात्राओं के न पढ़ा पाए जाने पर चिन्ता भी है साथ ही अफसोस भी।
नामवर जी ने जे. एन. यू. में ताकत भरी थी। जे. एन. यू. ने भी नामवर जी को बहुत ज्यादा दिया था। कम से कम दुनिया भर में नामवर बनने की ताकत उनमें यहीं पैदा हुई थी। नामवर जी को दूसरी परंपरा क्यों खोजनी पड़ी? पहली परंपरा में जब जंग लग जाती है तब दूसरी परंपरा को खोजने की जरूरत पड़ती है। दूसरी परम्परा जे. एन. यू. की थी। नामवर जी की पहली परम्परा में बी. एच. यू. सहित देश के अन्यान्य विश्वविद्यालय थे। वहां गलाकाट प्रतिस्र्पद्धा थी तो कहीं थोड़ा बहुत प्रेम भी था। बनारस के कट्टरपंथी ताकतों ने कबीर को धकियाने की कोशिश की थी। लेकिन कबीर कौन किसी से कम थे जो दबते। वे जीवन भर बनारस की मंडी में लाठी लेकर खड़े रहे। बनारसी पंडितों के समानान्तर दूसरी परम्परा की खोज कर उसमें ताकत भरी थी। उनमें आत्मसजगता का भाव जागृत किया था। तुलसी के बरक्स कबीर के अध्ययन को तरजीह देने वाले आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को भी बनारसी पंडितों ने बाहर का रास्ता नापने को मजबूर किया था। उन्हीं पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी के विद्वान शिष्य डाॅ नामवर सिंह को जब खाटी बनारसी परम्परा ने बाहर का रास्ता लेने को मजबूर किया तब नामवर जी भी दूसरी परम्परा की खोज पर निकल पड़े।
जे. एन. यू. की दूसरी परम्परा ने जितना नामवर जी को बनाया उतना ही नामवर जी ने जे. एन. यू. को बनाया। कम से कम जे. एन. यू. के भारतीय भाषा केन्द्र के बारे में यह बात सोलहो आने सच है। जब जे. एन. यू में नामवर जी आये तब न तो जे. एन. यू. भौतिक संसाधनों से ही लैस था और न ही वहां बौद्धिक संसाधनों की रवादारी थी। नामवर जी के समक्ष दोनों के बनाने और माॅजने की चुनौती थी। वह उन दिनों की बात है जब भारत में लोकतंत्र का गला घोंटा जा रहा था। 1975 ईस्वी में देष में इमरजेंसी लागू थी। समीर वरण जी लिखते हैं, ‘‘हम लोग जे. एन. यू. में आए थे वह इमरजेंसी की यातना और संघर्ष की पृष्ठभूमि वाला समय था। ज्यादातर छात्रों में कुछ-न-कुछ दंष भी था। फलस्वरूप जे. एन. यू. के वातावरण में एक-दूसरे के लिए हेलो और सि. यू. भरा सम्मान भाव रहता था। जीन्स और कुर्ता पहनते। कन्धे पर थैला, पाँव में चप्पल। सम्भ्रान्त होना लोग छुपाते थे और जे. एन. यू. के आह्वान पर किसी भी एम्बेसी या भवन या मोड़ पर आवाज उठाने पहुच जाते थे। इस तरह हम विश्व नागरिकता में प्रवेष कर गए थे।‘‘ उद्धृत पृ. सं. 144।। जे. एन. यू. ही नहीं बल्कि समूचे देष  में इमरजेंसी की यातना ने लोकतंत्र की जड़ें गहरी करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उस समय देष में घोषित आपातकाल का दौर था आज समूचे विष्वविद्यालय ही नहीं अपितु पूरा देष अघोषित आपात काल के दौर से गुजर रहा है। सड़कों पर आंदोलनों को देषश् व प्रदेषश् की सरकारें बेरहमी से कुचल दे रही हैं। लोकतंत्र लहू लुहान है। फिर भी अन्ना जैसे गांधीवादियों की कमी भी नहीं है। जगह जगह प्रतिरोध तो दर्ज़ ही हो रहे हैं।
सन् 1974 ईस्वी में जे. एन. यू. में नामवर जी आए थे। तब जे. एन. यू. था तो शैशवावस्था में ही, लेकिन उस पूत की तरह था जिसके पाँव उसके पालने में ही दिखलाई पड़ने लगते हैं। ज्ञान-विज्ञान और तर्क-वितर्क के बीच जे. एन. यू. में जनतांत्रिक संस्कारों की नींव रखी जा रही थी। वह मिट्टी अकुंठ संस्कारों की थी। इन अकुंठ संस्कारों ने ही जे. एन. यू. को एक नवीन परम्परा की राह पकड़ाई। यहाँ एक विशेष प्रकार की संस्कृति पुष्पित-पल्लवित हो रही थी। प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल लिखते हैं, ‘‘इस संस्कृति ने नामवर जी को बनाया। हम सब को बनाया। और हमने, हमसे पहले और पीछेवालों ने इसे बनाया। कोई बात तो थी कि छात्र संघ के चुनावों में हिंसा तो क्या गाली-गलौज तक अकल्पनीय थी। कोई बात तो थी कि छपे हुए पोस्टर लगाना, ज्यादा पैसे खर्च करना चुनाव में हार जाने का अचूक नुस्खा माना जाता था। कोई बात तो थी कि बिना किसी आरक्षण की धूमधाम के जे. एन. यू. में अद्भुत डाइवर्सिटी थी। जाति, धर्म, भाषा और संस्कृति हर प्रकार की डाइवर्सिटी।’’ उद्धृत पृ. सं. 53।। वह बात खुद जे. एन. यू. के छात्रों ने पैदा की थी। जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा शासन ही लोकतंत्र है। इसी तरह विद्यार्थियों का, विद्यार्थियों के लिए, विद्यार्थियों द्वारा जनतांत्रिक माहौल का निर्माण ही सच्चे विश्वविद्यालयों की लोकतांत्रिक परिकल्पना है। इस परिकल्पना को जे. एन. यू. की अकादमिक दुनिया सच साबित करती है। यहीं एक बात और यदि नामवर जी भारतीय भाषा केन्द्र के अध्यक्ष न हुए होते तो प्रो. पुरूषोत्तम अग्रवाल जैसे अन्यान्य विद्वान षिक्षकों की नियुक्ति नहीं हो पाती। किताब में इस तरफ संकेत भी है। शिक्षकों के चयन के मामले में उनकी दृष्टिनीर-क्षीर विवेकी ही रही। हाँ, कुछ एक को इस किताब में आपत्ति है कि नामवर जी ने उन्हें बहुत बाद में नौकरी दिलाई अथवा नौकरी के लिए घुमाते रहे। ये एक कद्दावर आदमी से होने वाले शिकवे हैं। एक संस्था से उनके छात्रों की शिकायत है। आखिर जे. एन. यू. की भी एक दुनिया है। दुनिया होने के नाते थोड़े शिकवे और कुछ शिकायतें दर्ज़ तो होंगी ही। तो इस किताब में ये सब भी दर्ज़ हैं।
जे. एन. यू. में नामवर जी द्वारा खोजे हुए कबीर की यथार्थपरक दुनिया के रचनात्मक विद्यार्थियों में प्रो. पुरूषोत्तम अग्रवाल का भक्तिकालीन कविता से गहरा नाता बना। विवेकसम्मत ज्ञान, कर्म और रचनात्मक एवं आंतरिक दृष्टि की वजह से वे भक्तिकालीन हिन्दी साहित्य के चैथे स्तम्भ हैं। भारतीय लोकतंत्र के चार स्तम्भ हैं-व्यवस्थापिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और प्रेस। अब देखिए आचार्य रामचंद्र शुक्ल भक्तिकालीन हिन्दी साहित्य की व्यवस्थापिका की तरह हैं जिन्होंने कमोबेश सभी भक्तिकालीन कवियों पर लिखा। हिन्दी साहित्य की जमीन तैयार की। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कार्यपालिका हैं जिन्होंने भक्तिकालीन कवियों की सच्ची परख की। प्रो. नामवर सिंह ने दूसरी परम्परा की खोज लिखकर न्यायपालिका की तरह न्यायोचित कार्यवाही की। लोकतंत्र में व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका से इतर प्रेस अपने ढंग से चीजों को देखता, सुनता व समझता है। वह स्वतंत्र और निष्पक्ष होता है। अकथ कहानी प्रेम की कबीर की कविता और उनका समय लिखकर प्रो. पुरूषोत्तम अग्रवाल ने भक्तिकाल का स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं नवीन जनतांत्रिक मूल्यांकन किया है।
जे. एन. यू. की संस्कृति जनतांत्रिक मूल्यों में रची पगी रही है। इस किताब में डा. राजेन्द्र प्रसाद पांडेय लिखते हैं, ‘‘जे. एन. यू. पहुँचकर मैंने जाना कि परिसर की संस्कृति का महत्व क्या है और इस संस्कृति के निर्माण का श्रेय हिन्दी में प्रो. नामवर सिंह को जाता है।’’ उद्धृत पृ. सं. 184।। वह संस्कृति दूसरी परम्परा के खोज की थी। उसमें कवि कबीर का अक्खड़पन समाविष्ट था। जे. एन. यू. में उस समय नवीन आधुनिक भावबोध के साथ पूरी भक्तिकालीन परम्परा बह रही थी। हालांकि उसमें भी पुरूषोत्तम जी भक्ति को स्वायत्त वैचारिक उपक्रम के रूप में पढ़ने की राह के हिमायती रहे हैं। ऐसा इसलिए हो सका क्योंकि जे. एन. यू. की स्वच्छंद दुनिया ने अग्रवाल जी के भीतर आत्म-सजगता का निष्पक्ष भावबोध बहुत अधिक भरा था। उनका सपना नवीन अकादमिक परिवार के निर्माण का था। उसमें वे सफल भी रहे। उनका अकादमिक परिवार हर तरह की फासिज़्म के खिलाफ लड़ाई लड़ने का हिमायती है। साहित्य को वे फासिज़्म के खिलाफ हथियार के रूप में तराशे जाने के पक्षधर हैं।
अकादमिक परिवार बनाने और फासीवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाली बात पर गौर फरमाएं। मैं खुद ग्रामीण परिवेश का विद्यार्थी था। मेरे जैसा पिछड़े और और ग्रामीण क्षेत्र के परिवेश का विद्यार्थी जे. एन. यू. के ग्लैमर से चैंधिया जाता है। डेप्रिवेशन प्वाइंट्स के बारे में  सुमन जी लिखती हैं, ‘‘उस दौरान ठेठ गावों, कस्बों, छोटे शहरों के विभिन्न वर्गों के विद्यार्थी खास डेप्रिवेशन प्वाइंट्स के बूते यहाॅं एडमीशन पा जाते थे और जे. एन. यू. के आगोश में वे जल्दी ही कैम्पस के सम्मानित नागरिक बन जाते थे।’’ उद्धृत पृ. सं. 195।। आज जब आरक्षण को लेकर तमाम तरह की भ्रांतिया हैं और उस पर सियासी दल राजनैतिक रोटी सेंक रहे हैं तब वे एक तरह का सुझाव प्रस्तुत करती है डेप्रिवेशन प्वाइंट्स की व्यवस्था। सुमन जी अपने लेख में सवाल करती हैं, ‘‘जे. एन. यू. के नीति निर्धारकों, अध्यापकों ने यहाँ की एडमीशन नीति को देशव्यापी बनाने के लिए कोई प्रयास क्यों नहीं किए। 2006 में ओ. बी. सी. रिजर्वेशन लागू किए जाने पर जे. एन. यू. क्यों नहीं अपनी एडमीशन नीति को डिफेंड कर सका। 2006 में ही पुरूषोत्तम अग्रवाल ने जे. एन. यू. एडमीशन प्रक्रिया पर आधारित अपने मल्टीपल इंडेक्स रिलेटेड एफरमेटिव एक्शन-मीरा का प्रस्ताव किया तो यहाॅं के लोगों तक ने उसकी उपेक्षा की-क्या हम सच में देश की मुख्यधारा! से इस कदर जुड़ गए हैं कि अपनी संस्था की विशिष्टताओं को कतई भुला बैठें।’’ उद्धृत पृ. सं. 196।। अपनी विशिष्टताओं को त्यागने के कारण ही इस अकादमिक दुनिया में क्षरण है। अपनी नीतियों, अपने मूल्यों और अपने द्वारा स्थापित प्रतिमानों को डिफेंड करने की यह किताब कोशिश करती है। इतना ही नहीं यह किताब जे. एन. यू. सहित देश के अन्य विश्वविद्यालयों में पुरूषोत्तम जी द्वारा प्रस्तावित एडमीशन नीति मीरा पर नए सिरे से बहस की गुंजाइश तलाशती है।
जे. एन. यू. की अपनी एडमीशन नीति के कारण हम जैसे पिछड़े क्षेत्रों के छात्र वहां पहुँच जाते थे। तो जब मैं जे. एन. यू. पहुंचा तब हम लोगों की कक्षाएं शुरू हो चुकीं थीं। उस समय सेंटर में नामवर जी नहीं थे। सेंटर जाने पर पता चला कि पी. ए. और ओ. पी. पढ़ाएंगे। पी. ए. मतलब पुरूषोत्तम अग्रवाल और ओ. पी. का मतलब ओम प्रकाश है। पहले सेमेस्टर के शेष दो शिक्षकों के नाम दिमाग पर जोर डालने के बाद भी नहीं याद आ रहे हैं। जे. एन. यू. के सी. आई. एल. में  शुरू के दो सेमेस्टरों में हिन्दी के विद्यार्थियों को उर्दू और उर्दू के विद्यार्थियों को हिन्दी में पास होना अनिवार्य होता है। इस किताब में केदार जी लिखते हैं, ‘‘नामवर जी जिस भारतीय भाषा केन्द्र के प्रथम अध्यक्ष थे, उसमें हिन्दी के साथ उर्दू भी थी और दोनों के बीच पाठ्यक्रम और गोष्ठियों के स्तर पर एक सुखद आवाजाही भी थी। इतिहास बताता है कि हिन्दी और उर्दू के बीच का सम्बन्ध तनावों और विवादों से भरा रहा है। जे. एन. यू. ने भारतीय भाषा केन्द्र के ढाँचे के भीतर इस सम्बन्ध को एक नई परिभाषा दी और परस्पर संवाद का ऐसा मंच तैयार किया जो किसी न किसी रूप में आज भी कायम है। देश की नई सेकुलर संस्कृति के निर्माण में जे. एन. यू. और खासतौर से भारतीय भाषा केन्द्र का यह एक ऐसा योगदान है, जिस पर हम गर्व कर सकते हैं। क्या यह कहने की जरूरत है कि केन्द्र की इस संस्कृति के निर्माण में नामवर जी के नेतृत्व की बहुत बड़ी भूमिका थी।’’ उद्धृत पृ. सं. 71।। बेशक! उनकी बहुत बड़ी भूमिका थी।
भाषा के  मुद्दे पर सुमन जी का कहना है, ‘‘1983 के पहले क्या थीं जे. एन. यू. की विशिष्टताए कहते हैं 90 के दशक के पहले जे. एन. यू. का माहौल अंग्रेजियत से भरा हुआ था। हाँ हिन्दी छोड़ बाकी सारी कक्षाए अंग्रेजी माध्यम से ली जाती थीं। सभाओं में आमतौर से बहस मुबाहिसे की भाषा अंग्रेजी थी। पर हिन्दी के प्रयोग की मनाही भी न थी। 80-81 वाले छात्र संघ के सदस्य अपना भाषण हिन्दी में ही देते थे-जैसे दिग्विजय सिंह, पुरूषोत्तम अग्रवाल और ऋतुराज। यही नहीं आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के व्याख्यानों में तिल रखने की जगह न थी। जाहिर है सभी श्रोता हिन्दी के तो नहीं थे। यह भीड़ इतनी ही थी, जितनी कि जान राबिन्सन के व्याख्यान में थी।’’ उद्धृत पृ. सं 195।। तो जे. एन. यू. के विद्यार्थियों में एक दूसरे को सहने की ताकत थी। पहुँच भाषा के नाम पर संघर्ष अकल्पनीय था। केदार जी लिखते हैं, ‘‘जहाँ धर्म और भाषा के सारे भेद किसी रासायनिक प्रक्रिया से छनकर खालिस मानवीय स्वाद में बदल जाते थे। मेरे लिए असलम साहब का वह हॅंसी-ठहाकों के बीच सुस्वादु गरमाहट से भरा छोटा-सा कमरा भारतीय भाषा केन्द्र की सबसे जीवन्त स्मृति है। खड़ी बोली की दूसरी परम्परा को-जिसे उर्दू के नाम से जाना जाता है-निकट से जानने का अवसर मुझे वहीं मिला। मेरे लिए असल में जीता-जागता मदरसा था, जहाँ मैंने शेरियत को समझने का सलीका सीखा।’’ उद्धृत पृ. सं. 71।। कहाँ चली गई वह गंगा जमुनी तहज़ीब और एक दूसरे की साझी विरासत! कहाँ विलुप्त हो गई आज वह एक दूसरे की सहन शक्ति! अब कभी भाषा और कभी जाति के नाम पर विश्वविद्यालयों में होने वाले झगड़े अकादमिक संस्थानों की अस्मिता को गहरी चोट पहुचाते हैं। उन्हें रक्त रंजित करते हैं।
मैं जे. एन. यू. के सी. आई. एल. के पहले सेमेस्टर की बात कर रहा था। सच बयान करू कि प्रो. पुरूषोत्तम अग्रवाल जी की शुरू की तीन कक्षाएं मेरे पल्ले ही नहीं पड़ीं। बाद में कोशिश कर समझ विकसित करने पर वही कक्षाए अधिक समझ में आईं। बड़ी रचनात्मक एवं तर्कपूर्ण कक्षाएं थीं वह। हिन्दी में भक्तिकालीन कविता को वे लाजिक की तरह पढ़ा रहे थे। सचमुच अग्रवाल जी की उन कक्षाओं ने हिन्दी साहित्य को पढ़ने की नई दृष्टि दी। पता नहीं क्यों मुझे उनसे बहुत डर लगता था। इसका एक कारण बतलाता हूँ। कक्षा में कबीर को पढ़ाते हुए उन्होंने एक प्रश्न पूछा कि कबीर के बारे में आप लोग क्या जानते हैं? मैंने रटा रटाया लीकीय जवाब दिया कि कबीर भक्तिकाल के निर्गुण भक्तिधारा के ज्ञानाश्रयी उपशाखा के कवि थे। झट उन्होंने गम्भीर आवाज में कहा कि यह तो आचार्य राम चंद्र शुक्ल का विचार है। तुम अपना बतलाओ कि कवि कबीर के बारे में क्या जानते हो? तब से लेकर अब तक अपने भीतर और बाहर कबीर को खोजता फिरता हूँ। जे. एन. यू. की एम. ए. की कक्षाओं में उन्होंने यह भी कहा था कि आप सभी जे. एन. यू. में आए हैं तो टर्म पेपर और सेमिनार पेपर लिखना ही होगा। एम. ए. में ही छात्र-छात्राओं से परचे लिखवाने की पद्धति वहां की सबसे बड़ी एकेडमिक ताकत है। विद्यार्थियों को तार्किक ढंग से अपनी बात रखने का सलीका सिखाते हैं वे बौद्धिक पर्चे। नामवर जी के परचों के बारे में जरा अग्रवाल जी से ही सुनिए, ‘‘बतौर अध्यापक के उनके मूल्यांकनों की प्रामाणिकता हम लोगों ने तो हमेशा  निर्विवाद रूप से विश्वसनीय पाई। मुझे हमेशा अच्छा ग्रेड देते थे, लेकिन मेरे ही एक परचे पर टिप्पणी की थी कि घास छीलकर रख दी है। परचे लिखने का सलीका सुमन जी से सीखिए। मैंने यह बात गांठ बाँध ली, और अन्य मित्रों को भी बॅंधवाई।’’ उद्धृत पृ. सं. 57।। अच्छे परचे लिखने का सलीका बाद में उन्होंने सी. आई. एल. के विद्यार्थियों को भी सिखलाया। केदार जी लिखते हैं, ‘‘जिज्ञासु छात्र के जिम्मेदारी और अध्यापक धर्म के प्रति निष्ठा-यही वे तत्व हैं, जिन्होंने अध्यापक नामवर सिंह को एक विलक्षण और अद्वितीय अध्यापक बनाया।’’ उद्धृत पृ. सं. 72।। यही बात पुरूषोत्तम जी और केदार जी के बारे में सौ फीसदी सच है। विद्यार्थियों की जिज्ञासात्मक क्षुधा को वे दोनों लोग तृप्त करते थे। हम लोगों ने छायावाद और निराला की लम्बी कविता राम की शक्ति पूजा पर  केदार जी से चार पाच कक्षाएं पढ़ीं तो लेकिन उनका परचा लिखने का सौभाग्य नहीं प्राप्त हुआ। परचा लिखने में बौद्धिक व्यायाम का मौका पहली बार पुरूषोत्तम जी के यहाँ ही मिला।
हमारे लिए पुरूषोत्तम जी का पहला परचा था कबीर के राम। पूरे तीन दिन तक मैं सोचता रहा कि इस विषय पर क्या लिखा जाए। इस विषय पर परचा लिखवाने के पीछे उनकी सोच क्या है। दरअसल अग्रवाल जी उन दिनों साम्प्रदायिकता को देश के सामने बड़े खतरे के रूप में देख रहे थे। 90 का दशक था। कबीर के राम जाहिर तौर पर तुलसी और रामानन्द सागर के राम से भिन्न थे। स्वतंत्र भारत में साम्प्रदायिक ताकतों को लामबंद होने का सर्वाधिक अवसर रामानन्द सागर के राम ने दिया। वाल्मीकि, भवभूति, तुलसी और अन्यान्य के राम का घमंजा तैयार कर रामायण सीरियल बना था। कहते हैं कि उन दिनों रविवार को जब टेलीविजन पर सुबह के 9 बजे रामायण शुरू होता था तब पूरे देश मे कफ्र्यू जैसे हालात पैदा हो जाते थे। सड़कें एकदम बियाबान और खामोश। दूरदर्शन पर आने वाले रामायण सीरियल के राम का ही प्रभाव था कि पूरे देश में राम-लहर चल गई। तब बी. जे. पी. द्वारा बच्चा बच्चा राम का जन्म भूमि के काम का; जो जन्मभूमि के काम न आवे वह बेकार जवानी है जैसे साम्प्रदायिक हिन्दुत्ववादी नारे गढ़े गए। पूरा देश नब्बे के दशक में साम्प्रदायिक शक्तियों की चपेट में आ गया था। 6 दिसम्बर 1992 ई. को बाबरी मस्जिद टूटी। राम के उपासकों एवं समर्थकों ने जश्न मनाया! इसके बाद देश में राम के नाम पर सरकारें भी बनीं। पूरे देश में साम्प्रदायिक आतंकवाद की जड़ें गहरी होती चली गईं। सन् 1992 ई. के आस पास पैदा हुए बच्चे आज युवा हो चले हैं। अब वे चुनावों में मतदान भी कर रहे हैं। आज इस्लाम हिन्दुत्व को कट्टरपंथी कहता है और हिन्दुत्व को इस्लामिक मान्यताओं में आतंवाद की बू आती है। यह अलग मसला है। तो पुरूषोत्तम जी के परचों के विषय भी साम्प्रदायिक ताकतों के खिलाफ एक अभियान के रूप में होते थे। वे साम्प्रदायिक ताकतों की लामबंदी और उससे उत्पन्न होने वाली भयावहता को बखूबी पहचानते थे। वे जानते थे कि धर्म जब सड़कों पर उतरता है तब उसका चरित्र साम्प्रदायिक होता है। मार्क्स भी धर्म को अफीम तभी कहते हैं जब उसका चेहरा साम्प्रदायिक होकर विद्रूप हो जाता है। सच तो यह है कि जे. एन. यू. में अग्रवाल जी विद्यार्थियों में नवीन जनतांत्रिक रचनात्मक दृष्टि के विकसन की परम्परा को संरक्षित एवं परिवर्द्धित कर रहे थे। छात्र-छात्राओं को दिए गए उनके प्रत्येक परचों के टॅपिक एक विस्तृत सोच को ध्वनित करते थे। आज देश के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती इसके लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाने की है। आज वे हम लोगों को शर्तिया यही टापिक देते कबीर का लोकतंत्र। पुरूषोत्तम जी ने ही लीक से हटकर एक विषय को पढ़ने व समझने का नज़रिया हम लोगों में पहली बार विकसित किया।शायद नामवर जी होते तो वह भी यही करते। प्रत्येक भविष्योन्मुखी अध्यापक यही करते हैं।  भले ही हम लोगों के जे. एन. यू. में अध्ययन के दौरान नामवर जी नहीं थे फिर भी पुरूषोत्तम जी ज्ञानात्मक क्षुधा को तृप्त कर रहे थे। उन जैसे शिक्षकों से पढ़ने का आनन्द ही कुछ और था। खैर।
इसी किताब में सुमन जी ने जे. एन. यू. की मेंटॅरिंग की प्रक्रिया की तारीफ करते हुए लिखा है, ‘‘उस जे. एन. यू. में ग़ज़ब की मेंटरिंग प्रक्रिया थी। यहाँ के पुराने विद्यार्थी बिना मैनेजमेंट का भारी भरकम जुमला बोले, नए आने वाले छात्र-छात्राओं तक सहज ही यहाँ की परम्पराएं, बात व काम करने के ढंग आदि सम्प्रेषित कर देते थे।’’ उद्धृत पृ. सं. 195।। अब यहाॅं पहले की तरह नहीं रहा। पुरूषोत्तम जी लिखते हैं, ‘‘सच तो यह है कि 1983 के बाद जे. एन. यू. के इतिहास का जो अध्याय शुरू हुआ, उसमें जे. एन. यू. के धीरे धीरे बदलते जाने की, खुद पर नाज करने वाले द्वीप स्वभाव को छोड़कर धारा के साथ तैरने जाने की ट्रेजी-कामेडी ही लिखी हुई है। पिछले कुछ वर्षों में जे. एन. यू. मुख्य धारा का अंग बनता ही चला गया है। रैगिंग और ईव-टीजिंग की मुख्य धारा सुलभ घटनाए जे. एन. यू. में भी घटने लगी हैं। छात्रों, अध्यापकों और कर्मचारियों के चुनाव जाति जैसे ठोस आधारों पर होने लगे हैं। लाइब्रेरी के एक रीडिंग रूम का अनौपचारिक नाम ही धौलपुर हाउस पड़ गया है।’’ उदृधृत पृ. सं. 54, 55।। यहा अग्रवाल जी की चिन्ता जे. एन. यू. में छात्र और अध्यापक दोनों रहने के नाते, उस खांटी जे. एन. यू. कल्चर को बचाने की है जिसकी वजह से जे. एन. यू. पूरी दुनिया में जाना जाता है। जे. एन. यू. में हो रहे परिवर्तन पर सदीकुर्रहमान किदवई का कहना है, ‘‘कहूँ तो देश भर के माहौल की छाया जे. एन. यू. पर भी पड़ गई है। हम अपने जज़्बे को आगे बढ़ाने में पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाए। सब कुछ बड़ा डिसएपाइंटिंग लगता है।’’ उद्धृत पृ. सं. 67।। यह किताब इस डिसएपाइंटिंग सिचुएशन से निकलने के लिए बहस चलाती है।
सुमन जी जे. एन. यू. की विशिष्टताओं में लड़कियों का बेहद सुरक्षित होना मानती हैं। वे लिखती हैं, ’’उस जे. एन. यू. में लड़कियां बेहद सुरक्षित थीं, मजाल जो कोई फब्ती कस दे-फब्ती कसने का अर्थ था जी. बी. एम. में बेइज्जत होना और बिरादरी बाहर हो जाना-यह भला कौन सोच सकता था।’’ उद्धृत पृ. सं. 195।। छात्राओं को यह आज़ादी आज भी है। वे देर रात किसी भी समय लाइब्रेरी से लौटते हुए ढाबों पर चाय पी सकती हैं। आनन्द पांडेय जी लिखते हैं, ‘‘स्त्री के व्यक्तित्व और उसकी मुक्ति की प्रतिष्ठा की संस्कृति मुझे यहाँ दिखाई देती है। देश का दूसरा ऐसा कोई परिसर मैं नहीं जानता जहाँ लड़किया चैबीसों घंटे और बारहों महीने आजाद रहती और महसूस करती हैं। प्रगतिशील और जनवादी लोगों के लिए जे. एन. यू. का महत्व इसीलिए और बढ़ जाता है किन्तु, इसका असली महत्व सिर्फ लड़कियाॅं जानती हैं। पानी में जैसे मछलिया जीवन्त, ताजी व आजाद होती हैं वैसे ही जे. एन. यू. में लड़किया।’’ उद्धृत पृ. सं. 209।। 2 बजे रात को छात्राएं अकेले घूमते हुए सड़कों पर मिल जाएं तो आप मुल्क के दूसरे विश्वविद्यालयों की कल्पना करके सिहर उठेंगे। गुण्डे, मवाली अथवा बलात्कारी उन्हें कुत्तों की तरह नोच खायेंगे। जे. एन. यू. में आज भी दलित अपने हक के लिए खुलकर बोल सकता है। प्रो. तुलसी राम जी लिखते हैं, ‘‘.....यदि आरक्षित पद सामान्य श्रेणी में बदल गया, तो यह एक अनहोनी घटना होगी तथा दलित अधिकारों का हनन भी होगा।’’ उद्धृत पृ. सं. 107।। यू. पी. के मायाराज में दलित अपने मुद्दे उठाएं तो ब्राह्मणवादी एवं सामंतवादी ताकतों से उनके दो दो हाथ हो ही जाएंगे। कत्लेआम मच जाएगा कत्लेआम। असल में दलित मुक्ति एवं मुक्ति आकांक्षी स्त्री स्वातन्त्र्य को यहाँ नई जमीन मिलती है जो सामंती बिल्कुल नहीं हैं। जे. एन. यू. वादी और प्रतिवादी दोनों को सहता है। मुंसिफ और मुज़रिम में फ़र्क करती है-यहाँ की संस्कृति। हक़ हुक़ूक की लड़ाई जे. एन. यू. की जनतांत्रिक पद्धति का हिस्सा रही है। यह यहाँ की विरासत है। अब वो बहस-मुबाहिसें और विरासत धीरे धीरे विलुप्त हो रही हंै। हाँ, पूँजीवाद समर्थक बाज़ारवादी ताकतों ने इस कैम्पस में भी अपनी चादर फैलाई है। पहनावे के मसले पर एक खास किस्म की आधुनिकता और खांटी जेनुआइट परम्परा के बीच द्वन्द्व की स्थिति से गुजर रहा है जे. एन. यू.। ऐसे में यह किताब उस जनवादी संस्कृति को, जो जे. एन. यू. की पहचान है, उसे बचाने की अवधारणा पर गहरा विश्लेषण प्रस्तुत करती है।
विश्वविद्यालयों में डेमोक्रटिक मूल्यों की अस्मिता का सवाल किताब की सम्पादक सुमन जी के लिए बेहद अहम है। डेमोक्रेटिक के निर्माण में यहाँ के वातावरण ने प्रमुख भूमिका निभाई है। सुधा निकेतन रंजनी जी लिखती है, ‘‘सांस्कृतिक प्रोग्राम चल रहा था। अचानक प्रोग्राम के बीच में वी. सी. साहब पधारे। यह देखकर कि भीड़ बहुत ज्यादा है, दरी के पिछले कोने पर चुपचाप बैठ गए और प्रोग्राम देखने लगे।’’ उद्धृत पृ. सं. 224।। किसी और विश्वविद्यालय में यह अकल्पनीय है। ऐसे दृष्य ही सच्चे लोकतंत्र का निर्माण करते हैं। जबकि सुमन जी पुराने दिनों को याद करते हुए लिखती हैं, ’’वह जे. एन. यू. ऐसा था जहाँ जाति, धर्म, भाषा, लिंग आदि के आधार पर कोई गुटबन्दी न थी-एक विश्वास का माहौल था। ऐसा नहीं कि वहां अन्तर्विरोध या पारस्परिक वैमनस्य न थे, पर उस वैमनस्य के मूल में ज्यादातर राजनैतिक गुटबन्दी थी-दूसरे दलों के, गुटों के विद्यार्थियों के एडमीशन व फ़ेलोशिप, टीचरों के अप्वाइंटमेंट को लेकर बड़े गहरे खेल होते थे-वे गोटिया ही अलग थीं। इस खेल के दंशों को वे ही जानते थे, जो इसके शिकार होते थे। ऊपर से तो पानी थिर ही दिखता था......’’। उद्धृत पृ. सं. 196।। देखा आपने विश्वविद्यालयों में व्याप्त गुणा-गणित एवं जोड़-तोड़ पर कितना करारा प्रहार है। जाके पैर न फटी बेवाई ऊ का जानै पीर पराई वाली बात है। इस भोगे हुए यथार्थ को डा. सुरेश शर्मा से अधिक कोई नहीं जानता और थोड़ा बहुत रामबक्ष जी भी जानते हैं। किताब के लेख में उनकी प्रमुख समस्या विश्वविद्यालयों में नियुक्तियों की है। वे लिखते हैं, ‘‘अब भी मुझे जवाहर लाल नेहरू भारत का सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय नहीं लगता। वह अच्छा है, बहुत अच्छा भी कह सकता हूँ, परन्तु सर्वश्रेष्ठ मैं नहीं कह सकता।’’ उद्धृत पृ. सं. 127।। दरअसल इस कथ्य के पीछे कारण है।
अध्यापक के रूप में जे. ए.. यू. में रामबक्ष जी सन 2007 के बाद आए। तब तक जे. एन. यू. एक नए किस्म के अजूबेपन की तरफ मुख़ातिब था। 1975 के आसपास जे. एन. यू. में रामबक्ष जी जब पढ़ने आए तब भी वे काफी पोढ़ाए हुए थे। उन्हें वहां सीधे पी-एच. डी. में दाखिला मिला था। असल में जे. एन. यू. में एम. ए. में अध्ययन के दौरान जो उत्सवधर्मिता है वह बाद के अध्ययन में कम मिलती है। यहाँ एम. फिल. अथवा पी-एच. डी. में सीधे दाखिला पाने वाले छात्र बनिस्बत अपने आप को अधिक विद्वान प्रदर्शित करते हैं। आखिर! वे सीधे एवरेस्ट की चोटी पर फ़तह पाने वाले लोग जो होते हैं। वैसे भी पक्के पर पानी कम चढ़ता है। इन विद्वानों की बात ही निराली है। मार्क्सवाद भले ही देवमूर्तिया न गढ़ने की बात कहे। किन्तु विद्यार्थियों के मन-मस्तिष्क में सच्चे गुरू की देवस्मृतिया तो बन ही जाती हैं। आखिर सच्चा गुरू, गोबिन्द तक पहुँचने का रास्ता तो बता ही देता है। रामबक्ष जी लिखते हैं, ‘‘कभी कभी अपने अध्यापकीय जीवन पर विचार करता हूँ तो इस विडम्बनापूर्ण निष्कर्ष पर पहुंचता हूँ कि शिक्षक तो पक्षपात करता ही है। वह अपने छात्रों के प्रेम में पड़ ही जाता है। न्याय जिस निर्लिप्तता की मांग करता है, शिक्षक उतना तटस्थ, उदासीन और निर्लिप्त नहीं हो पाता। जो भी है, नामवर जी अपने छात्रों से प्रेम करते हैं और इसी कारण परोसने का पक्षपात भी करते हैं।’’ उद्धृत पृ. सं. 129।। जिस तरह से पिता अपने सभी पुत्रों को गुण-धर्म के कारण एक समान प्रेम नहीं कर पाता ठीक उसी तरह अघ्यापक भी अपने सभी विद्यार्थियों को एक समान प्रेम नहीं कर पाता है।
जे एन यू में नामवर सिंह किताब में चमन लाल जी लिखते हैं, ‘‘छात्रों के बीच असुरक्षा बोध व नौकरी पाने की ख्वाहिश से वे केन्द्र के प्रोफेसर के साथ शोध छात्र के रूप में जुड़ना चाहते हैं, क्योंकि विश्वविद्यालयों में विषेषज्ञ के रूप में केवल प्रोफेसर ही जाते हैं और वे न भी जाए तो प्रभाव उन्हीं का अधिक होता है।’’ उद्धृत पृ. सं. 121।। ऐसी बात नहीं है। एक रचनात्मक और प्रबुद्ध छात्र विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर की तलाश नहीं करता बल्कि उसे जिज्ञासा शांत करने वाले शिक्षक की तलाश होती है। रही नौकरी के लिए प्रोफेसरों की तलाश वाली बात तो नौकरी छात्र-छात्राओं की प्रतिभा पर मिलती है न कि कोई दिलवाता है। हाँ कोई थोड़ा बहुत मदद तो कर सकता है लेकिन सोचिए कि कोई अतार्किक एवं मतिमंद व्यक्ति हो तो प्रोफेसर क्या साक्षात् भगवान भी उसकी मदद नहीं कर सकते। आखिर विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर कोई डाइरेक्ट पद तो हैं नहीं। हर प्रोफेसर, असिस्टेंट और एसोसिएट प्रोफेसर के दौर से होकर ही गुजरता है। एक प्रकार से यह किताब छात्र-छात्राओं के लिए  गाइड चयन के मसले को उजागिर करती हुई उसे सुलझाती भी है। असल में चमन लाल जी के लेख में नामवर जी पर व्यक्तिगत हमले किए गए हैं। उदाहरण के रूप में उनकी बेटी के अन्तर्जातीय विवाह पर चमनलाल जी की टिप्पणी प्रकरण ध्यातव्य है। ऐसा लगता है कि चमन लाल जी को नामवर जी द्वारा शोध छात्र के रूप में न लेने की पीड़ा उन्हे जीवन भर सालती रही। स्कूल मास्टरी से लेकर प्रोफेसरी तक के उतार चढ़ाव देखने के कारण लेखक में एक गैप भर गया है।        कई और समस्याओं को यह किताब उठाती है। देश के संस्थानों में भाषाई हीनता की वजह से होने वाले अपमान और तिरस्कार के मुद्दे को भी यह किताब स्वर प्रदान करती है। पुरूषोत्तम जी लिखते हैं, ‘‘यह सही है कि अंग्रेजी के खिलाफ जिहाद को ही लोकतांत्रिक होने का पर्याप्त प्रमाण भी नहीं माना जाता था। लोकतांत्रिक मिजाज इसमें झलकता था कि जो अंग्रेजी नहीं जानते, उनके नाम जे. एन. यू. में नोटिस बोर्ड पर नहीं लगा दिए जाते थे, जैसे कि टाटा इंस्टीट्यूट आफ और सोशल साइंसेज में आजकल लगा दिए जाते हैं।’’ उद्धृत पृ. सं. 47, 48।। आज देश में कालेजों अथवा विश्वविद्यालयों के कैम्पस एक विशेष किस्म की अंग्रेजियत की चपेट में हैं। आज  देश के अधिकांश कान्वेंट और बोर्डिंग स्कूलों में हिन्दी बोलना प्रतिबन्धित है। देश के सर्वोत्कृष्ट संस्थान एक विशेष प्रकार की अन्तः भाषाई औपनिवेशिकता से जूझ रहे हैं। संस्थानों पर यह दबाव देश में चलने वाली ग्लोब्लाइज़्ड कम्पनियों के दबाव की वजह से है। आज जब देश के शिक्षण संस्थान विद्यार्थियों को अंग्रेजी बोलती हुई मशीन के रूप में तब्दील करते चले जा रहे हैं तब यह किताब विश्वविद्यालयों में छात्र-छात्राओं के भीतर उनकी संवेदनाओं के अनवरत मरते चले जाने की मुख़ालफत करती है। शिक्षण संस्थानों में विद्यार्थियों के भीतर मनुष्य होने की संवेदनाओं को यह पुस्तक बचाती है। मनुष्यता को बचाने के लिए प्रतिरोध की संस्कृति को वयस्क और पुष्ट करती है। पुरूषोत्तम जी के हवाले से प्रतिरोध के लिए पहले चाहिए बोध। उद्धृत पृ. स. 46।।
पुरूषोत्तम जी ने यूनिवर्सिटी आफ वेस्टर्न आस्ट्रेलिया के विन्थ्राप हाल में घूमने की चर्चा की है। वे लिखते हैं, ‘‘बहुत खूबसूरत गाथिक इमारत, वेनेशियन ग्लास की खिड़किया-और उन पर ओल्ड टेस्टामेंट में वर्णित, परमात्मा द्वारा मनुष्य को कृपा स्वरूप दी गई सुमतियों की छविया-सूझ, बूझ, साहस, बुद्धि, संवेदनशीलता और ज्ञान। लेकिन ओल्ड टेस्टामेंट में बताई गई सुमतियों की संख्या तो सात थी। बाकी दो कहाँ गईं?...........वाल्टर ने लिखा कि दो सुमतिया मैंने जानबूझकर छोड़ी हैं, क्योंकि मेरी समझ से किसी यूनिवर्सिटी की परिकल्पना से उनका कोई लेना है ही नहीं, धार्मिक और यौनपरक पवित्रता-पाइटी और भगवान का भय-फीयर आफ गाड’’ उद्धृत पृ. सं. 61।। दोनों सुमतियों को तलाशते हुए विश्वविद्यालयों को स्वनिर्मिति का बोध होना चाहिए। जाहिर सी बात है कि इस बोध को विश्वविद्यालय में अध्यापक और वहां  के विद्यार्थी जागृत करते हैं, पवित्र मंत्र एवं आयतों की तरह । पुरूषोत्तम जी आगे लिखते हैं, ’’वास्तुकार का यह सीधा, सार्थक उत्तर, बौद्धिक साहस एवं संवेदनशीलता का यह घोषणापत्र पढ़कर सचमुच आखें भीग गई थीं। अपने जे. एन. यू. ने ऐसी कोई औपचारिक घोषणा तो कभी नहीं की। लेकिन अपने होने भर से यह बता जरूर दिया कि यूनिवर्सिटी का स्वधर्म निर्भीकता और प्रश्न व्याकुलता है, संवेदनशीलता है, ज्ञान की साधना है, परमात्मा का डर दिखाकर खोखली पवित्रता का आरोपण करना नहीं।’’ उद्धृत पृ. सं. 61।। इसके बाद भी यूनिवर्सिटी के स्वधर्म के बारे में कहने को कुछ शेष बचा क्या?
21 वीं सदी का पहला दशक समाप्त हो चुका है। दूसरे दशक की शुरूआत हो चुकी है। दुनिया भर में लोकतंत्र का अस्तित्व खतरे में है। जाहिर है विश्वविद्यालय इससे अछूते नहीं होंगे। अपना जे. एन. यू. तो और भी अधिक। इसकी स्थापना 1969 ई. में हुई थी। स्थापना का उद्देश्य मानविकी के क्षेत्र में अच्छे संस्थानों की कमी को पाटना था। 21 वीं सदी के पहले दशक में मशीनीकृत अर्थव्यवस्था ने मनुष्यों के भीतर संवेदनात्मक ह्रास किया है। विनिवेषकृत हो चली अर्थव्यवस्था ने विश्वविद्यालयों की निजता पर हमले किए हैं। विश्वविद्यालयों में सम्बन्धों को एक दायरे में नए ढंग से परिभाषित किया जाने लगा है। मुक्त अर्थव्यस्था ने देश में धन की कमी नहीं होने दी है। धन की अधिकता ने नए किस्म के कदाचार और भ्रष्टाचार का बीजारोपण किया है। अब जे. एन. यू. में भी बहुत अधिक फर्क़ दिखता है। ऐसे में जे एन यू में नामवर सिंह किताब एक खास किस्म के प्रगतिशील विश्वविद्यालय के बहाने उच्च शिक्षा के तमाम अनछुए और अनसुलझे पहलू को उद्घाटित करती है। विश्वविद्यालयीन संस्कृति पर सार्थक बहस चलाते हुए यह किताब सांस्कृतिक दस्तावेज़ बनती है। किताब की इस सामाजिक और सांस्कृतिक दुनिया में फूल भी हैं और शूल भी, कांटे भी हैं और ताज़ भी, अपनत्व भी है और बेगानापन भी। कुल मिलाकर इस किताब की सांस्कृतिक दुनिया में अनुभव की विराटता है। सम्बन्धों का निजीपन है। यहाँ सम्बन्धों से उपजे हुए तनाव भी हैं। छात्र-छात्राओं द्वारा निर्मित एक सशक्त लोकतंत्र का उद्घाटन है। इस किताब में लेखकों के स्मृतिलोक से अतीत के चलचित्रों की आवाजाही, एक बेहतर दुनिया की ओर पाठकों को मुख़ातिब करती है। यह किताब किसी भी संस्था को उसके सम्भावित भविष्य के खतरे से आगाह करती है। देश के अकादमिक संस्थानों के लिए यह किताब पवित्र धर्मग्रंथ की तरह है। विश्वविद्यालयीन संस्कृति का मेनीफेस्टो है यह किताब। इसलिए इस किताब को पढ़ना प्रत्येक पाठकों के लिए पाथेय साबित होगा।