Buddha Uvach
Wednesday, 14 March 2012
ise jarur padhiye
एक अभिव्यति आपके नाम-
हौसलों से कहिए
बिखरने न दो
मुस्कान से कहिए
खिलती रहो
हुनर से कहिए
सीखते रहो
नदियों से कहिए
इतराना छोड़ दें
अरे ए दोस्त
समंदर भी कभी
बूढ़ा होता है क्या!
जज़बात भी कभी
मुरझाते हैं क्या!
l l विनय कांत l l
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