अखिलेश परिवारवाद की उपज नहीं हैं -
विनय कांत मिश्र। भारतीय राजनीति का रास्ता उत्तर प्रदेश की सियासी गलियाँ तय करती हैं। कभी भारतीय राजनीति में पढ़े लिखे लोगों की जमात होती थी। भारत की आज़ादी की लड़ाई जिन राजनीतिज्ञों ने लड़ी, उनमें से अधिकांश पढ़े लिखे तबके से आते थे। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, मोतीलाल नेहरू,जवाहर लाल नेहरू, सरदार बल्लभ भाई पटेल,सुभाष चन्द्र बोस, सरदार भगत सिंह और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद सहित न जाने कितने ऐसे नेता थे जो शैक्षणिक रूप से काफी सशक्त थे। पढ़ाई और लिखाई से उनका गहरा वास्ता था। तभी वे भारतीय राजनीति को नई दिशा दे सके। आज़ादी के बाद भारतीय राजनीति में उन लोगों का वर्चस्व हो चला जिनका पढ़ाई और लिखाई से कोई नाता ही नहीं रहा। पहले देश का भविष्य तय करते हुए राजनेताओं की समाजवादी, मार्क्सवादी और अन्यान्य विचारधारात्मक प्रतिबद्धता होती थी। कालांतर में इस तरह की विचारधारात्मक प्रतिबद्धतामूलक राजनीति का ह्रास हुआ। राजनीति में पूंजी और दबंगई का दबदबा हो चला। माफियाओं ने गुंडई और जोर जबर्दस्ती के बल पर जाति आधारित, पूंजी आधारित और अतार्किक राजनीति को ही प्रश्रय दिया। तर्काधारित राजनीति के विलोप ने उत्तर प्रदेश के विकास को बहुत पीछे धकेल दिया।
इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में देश का राजनैतिक भविष्य तय करने वाले उत्तर प्रदेश की जनता ने अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी को स्पष्ट जनादेश दिया है। बेशक नेता जी मुलायम सिंह यादव सूबाई राजनीति के कर्णधार रहे हों, लेकिन अपने दम पर बहुमत तो समाजवादी पार्टी के योग्यतम उत्तराधिकारी अखिलेश यादव ने ही दिलाई है। वे मुलायम सिंह के बेटे के रूप में सूबाई जनता से मुख़ातिब नहीं हुए बल्कि वे एक समाजवादी कार्यकर्ता के रूप में लाल टोपी धारी होकर प्रदेश की जनता के बीच रहे। उन्होंने युवा ताकत को सपा के वोटर के रूप में तब्दील किया। परिपक्वता दिखलाते हुए विवादास्पद बयानों से दूरी बनाई। जब सूबाई दौरे पर समाजवादी पार्टी के एक एक कार्यकर्ताओं को अखिलेश यादव संगठित कर रहे थे तब न तो शिवपाल यादव ही नजर आ रहे थे और न कोई दूसरा ही। जब मुलायम सिंह और अखिलेश दोनों नेता परिपक्वता और युवा जज्बे को मंचों से जनता के बीच रख रहे थे तब परिवार का कोई दूसरा आदमी नेता रूप में नहीं दिखलाई पद रहा था। कहने का अभिप्राय यह है की अखिलेश ने भारतीय राजनीति में मुलायम सिंह यादव के परिवार के सदस्य के रूप में पदार्पण नहीं किया है, बल्कि वे उसी रूप में भारतीय राजनीति में नेता जी से राजनीति का ककहरा सीख कर आए हैं जैसे अन्यान्य नेताओं ने मुलायम सिंह यादव से राजनीति का ए बी सी सीखा है। बहुजन समाज पार्टी के साथ 1993 के सपा के चुनावी गठबंधन को याद कीजिए । मायावती को परिपक्व बनाने में भी नेता जी का कम योगदान नहीं रहा लेकिन बाद में वे सत्ता मद में जनता से दूर होती चली गईं। आप याद कीजिए सपा के ही टिकट पर रीता बहुगुणा जोशी पहली बार चुनाव जीत सकीं थीं। यहीं एक बात और; पिछले विधानसभा इलेक्शन 2007 में यदि सपा की दुर्गति हुई थी, तो इसके पीछे शिवपाल और अमर सिंह ही मुख्यमंत्री के पैरलल काम करते हुए अधिक जिम्मेदार थे। सूबे के एक ईमानदार, वरिष्ठ आई पी एस अफसर ने नाम न छापने की शर्त पर बतलाया कि पिछले कार्यकाल में नेता जी मुलायम सिंह यादव मुझे जिलों की कमान सौंपते हुए निर्देशित करते थे कि जाकर अपने तरीके ईमानदारी पूर्वक काम करना; उधर पता चलता था कि चंद दिनों के बाद नेता जी के भाई शिवपाल जी ट्रांसफर करवा देते थे। वरिष्ठ आई पी एस अधिकारी कहते हैं कि यदि अखिलेश जी प्रदेश के मुख्यमंत्री बनते हैं तो यह उत्तर प्रदेश का सौभाग्य होगा। एक बेहद पढ़े लिखे, समझदार, समुचित निर्णयात्मक क्षमता वाले और अब परिपक्व हो चले नए चेहरे से सूबे का तेजी से विकास संभव है। ऐसी आशा हम कर सकते हैं। वैसे उक्त दोनों लोगों में कोई भी मुख्य मंत्री बने, हमें तो बेहतर पुलिसिंग के लिए काम करना है।
तब यह मान लिया जाना चाहिए कि यह योग्यतम उत्तराधिकारी को सत्ता हस्तांतरण का सही वक्त है। जिस तरह से समाजवादी पार्टी की जीत के बाद अखिलेश यादव कानून व्यवस्था को दुरुस्त रखने की लगातार बात कह रहे हैं और मीडिया से मुख़ातिब हैं उससे प्रतीत होता है कि 12 तारीख को उत्तर प्रदेश के अगले मुख्यमंत्री अखिलेश यादव हो सकते हैं। फिलहाल युवाओं द्वारा निर्वाचित युवा विधायकों की भी यही मंशा है। अंतिम निर्णय जमीनी सियासत में दिलचस्पी रखने वाले समाजवादी नेता मुलायम सिंह को लेना है।
विनय कांत मिश्र। भारतीय राजनीति का रास्ता उत्तर प्रदेश की सियासी गलियाँ तय करती हैं। कभी भारतीय राजनीति में पढ़े लिखे लोगों की जमात होती थी। भारत की आज़ादी की लड़ाई जिन राजनीतिज्ञों ने लड़ी, उनमें से अधिकांश पढ़े लिखे तबके से आते थे। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, मोतीलाल नेहरू,जवाहर लाल नेहरू, सरदार बल्लभ भाई पटेल,सुभाष चन्द्र बोस, सरदार भगत सिंह और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद सहित न जाने कितने ऐसे नेता थे जो शैक्षणिक रूप से काफी सशक्त थे। पढ़ाई और लिखाई से उनका गहरा वास्ता था। तभी वे भारतीय राजनीति को नई दिशा दे सके। आज़ादी के बाद भारतीय राजनीति में उन लोगों का वर्चस्व हो चला जिनका पढ़ाई और लिखाई से कोई नाता ही नहीं रहा। पहले देश का भविष्य तय करते हुए राजनेताओं की समाजवादी, मार्क्सवादी और अन्यान्य विचारधारात्मक प्रतिबद्धता होती थी। कालांतर में इस तरह की विचारधारात्मक प्रतिबद्धतामूलक राजनीति का ह्रास हुआ। राजनीति में पूंजी और दबंगई का दबदबा हो चला। माफियाओं ने गुंडई और जोर जबर्दस्ती के बल पर जाति आधारित, पूंजी आधारित और अतार्किक राजनीति को ही प्रश्रय दिया। तर्काधारित राजनीति के विलोप ने उत्तर प्रदेश के विकास को बहुत पीछे धकेल दिया।
इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में देश का राजनैतिक भविष्य तय करने वाले उत्तर प्रदेश की जनता ने अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी को स्पष्ट जनादेश दिया है। बेशक नेता जी मुलायम सिंह यादव सूबाई राजनीति के कर्णधार रहे हों, लेकिन अपने दम पर बहुमत तो समाजवादी पार्टी के योग्यतम उत्तराधिकारी अखिलेश यादव ने ही दिलाई है। वे मुलायम सिंह के बेटे के रूप में सूबाई जनता से मुख़ातिब नहीं हुए बल्कि वे एक समाजवादी कार्यकर्ता के रूप में लाल टोपी धारी होकर प्रदेश की जनता के बीच रहे। उन्होंने युवा ताकत को सपा के वोटर के रूप में तब्दील किया। परिपक्वता दिखलाते हुए विवादास्पद बयानों से दूरी बनाई। जब सूबाई दौरे पर समाजवादी पार्टी के एक एक कार्यकर्ताओं को अखिलेश यादव संगठित कर रहे थे तब न तो शिवपाल यादव ही नजर आ रहे थे और न कोई दूसरा ही। जब मुलायम सिंह और अखिलेश दोनों नेता परिपक्वता और युवा जज्बे को मंचों से जनता के बीच रख रहे थे तब परिवार का कोई दूसरा आदमी नेता रूप में नहीं दिखलाई पद रहा था। कहने का अभिप्राय यह है की अखिलेश ने भारतीय राजनीति में मुलायम सिंह यादव के परिवार के सदस्य के रूप में पदार्पण नहीं किया है, बल्कि वे उसी रूप में भारतीय राजनीति में नेता जी से राजनीति का ककहरा सीख कर आए हैं जैसे अन्यान्य नेताओं ने मुलायम सिंह यादव से राजनीति का ए बी सी सीखा है। बहुजन समाज पार्टी के साथ 1993 के सपा के चुनावी गठबंधन को याद कीजिए । मायावती को परिपक्व बनाने में भी नेता जी का कम योगदान नहीं रहा लेकिन बाद में वे सत्ता मद में जनता से दूर होती चली गईं। आप याद कीजिए सपा के ही टिकट पर रीता बहुगुणा जोशी पहली बार चुनाव जीत सकीं थीं। यहीं एक बात और; पिछले विधानसभा इलेक्शन 2007 में यदि सपा की दुर्गति हुई थी, तो इसके पीछे शिवपाल और अमर सिंह ही मुख्यमंत्री के पैरलल काम करते हुए अधिक जिम्मेदार थे। सूबे के एक ईमानदार, वरिष्ठ आई पी एस अफसर ने नाम न छापने की शर्त पर बतलाया कि पिछले कार्यकाल में नेता जी मुलायम सिंह यादव मुझे जिलों की कमान सौंपते हुए निर्देशित करते थे कि जाकर अपने तरीके ईमानदारी पूर्वक काम करना; उधर पता चलता था कि चंद दिनों के बाद नेता जी के भाई शिवपाल जी ट्रांसफर करवा देते थे। वरिष्ठ आई पी एस अधिकारी कहते हैं कि यदि अखिलेश जी प्रदेश के मुख्यमंत्री बनते हैं तो यह उत्तर प्रदेश का सौभाग्य होगा। एक बेहद पढ़े लिखे, समझदार, समुचित निर्णयात्मक क्षमता वाले और अब परिपक्व हो चले नए चेहरे से सूबे का तेजी से विकास संभव है। ऐसी आशा हम कर सकते हैं। वैसे उक्त दोनों लोगों में कोई भी मुख्य मंत्री बने, हमें तो बेहतर पुलिसिंग के लिए काम करना है।
तब यह मान लिया जाना चाहिए कि यह योग्यतम उत्तराधिकारी को सत्ता हस्तांतरण का सही वक्त है। जिस तरह से समाजवादी पार्टी की जीत के बाद अखिलेश यादव कानून व्यवस्था को दुरुस्त रखने की लगातार बात कह रहे हैं और मीडिया से मुख़ातिब हैं उससे प्रतीत होता है कि 12 तारीख को उत्तर प्रदेश के अगले मुख्यमंत्री अखिलेश यादव हो सकते हैं। फिलहाल युवाओं द्वारा निर्वाचित युवा विधायकों की भी यही मंशा है। अंतिम निर्णय जमीनी सियासत में दिलचस्पी रखने वाले समाजवादी नेता मुलायम सिंह को लेना है।
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