Thursday, 14 June 2012

nakasalvaad

यूं ही नहीं पनप रहा है नकसलवाद-
गरीब आदमी को जब दो वक्त की रोटी भी मयस्सर नहीं होती तब वह नक्सलाईट बन जाता है. विद्रोही चेतना पनपने को  नक्सलवादी कहना जायज नहीं है. ऊपर से नीचे तक नौकरशाही भ्रष्टाचार में संलिप्त है. विश्वविद्यालयों में अधिकाँश चमचे शिक्षक के रूप में चयनित हैं. गुरुजनों को सेवा करने वाले चम्मच चाहिए न कि पढ़ाने वाले शिक्षक. रीढ़ विहीन लोगों की प्रोफेसरी तय होती है. वह जमाना गुजर गया जब विभागाध्यक्ष सिर्फ विद्वानों और सूझ बूझ वालों को चयनित करते थे. आज आप देश में यू पी एस सी के अलावा किसी भी संस्था पर यकीन नहीं कर सकते. लगभग सभी बिक चुके हैं. वे भरोसे के कातिल हैं. नौकरी  बिकती है बोलो खरीदोगे, वाली स्थिति है. चारों तरफ अंधेर है. 1 रूपये में 30 पैसा सरकार का है शेष 70 पैसा कारपोरेट सेक्टर का है. सरकार बेबस है. पूंजीपतियों के दलाल घूम रहे हैं. नीतियाँ भी उन्हीं के मुताबिक़ लाभ के लिए बनती हैं. आप गरीब किसानों और मजदूरों का पैसा उन तक पहुंचा दो , अपने आप नकसलवाद समाप्त हो जाएगा. गरीबों को भी समाज की मुख्यधारा में जोड़ने की कोशिश निश्चय ही होनी चाहिए.   

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