आरक्षण एक सियासी रोटी का टुकड़ा है-
जो योग्यतम हो उसे अवसर मिले. पढाई लिखाई में सरकारी सहयोग हो लेकिन नौकरियों में आरक्षण! पत्रकारिता में आरक्षण! अध्यापन पेशे में आरक्षण! न्यायपालिका में आरक्षण! सियासत में आरक्षण!.....फिर संविधान अवसर की समानता का छद्म क्यों रचता है? सेना में आरक्षण क्यों नहीं है? जब एक भारतीय नागरिक को वोट देने का अधिकार है तो उसे सिर्फ सवर्ण जाति के आधार पर राजनीति में प्रवेश से क्यों वंचित किया जाता है? आरक्षण जब सिर्फ वंचितों और दलितों लिए था तो अब अल्पसंख्यक आरक्षण के पत्ते क्यों तराशे जा रहे हैं? जबकि भारत में इस्लाम के शासन का मजबूत इतिहास 1192 ईस्वी से लेकर 1857 तक का रहा है. जरा सोचिए तो मित्रों!
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