किसान तबाह हो रहा है-
आज देखने में यह आ रहा है कि शहरों का सोनार और अन्य व्यापारी अथवा पूंजीपति वर्ग याकि भूमाफिया समूह गांवों में किसानों की जमीनों को खरीदकर वहां प्लाटिंग करा कर भारी मुनाफे में बेच दे रहा है. इस पर सरकारों की दृष्टि साफ़ नहीं है. किसान मजदूरों के रूप में तब्दील होता जा रहा है. उसकी जमीनें हड़पी जा रही हैं. किसान करे भी क्या! जब वह खाद की दूकानों पर खरीददारी के लिए जाता है तब सरकारों की पुलिस लाठी उस पर लाठी बरसाती है. सरकारी योजनाओं के लिए अधिग्रहीत भूमि का मुआवजा वर्षों लंबित रहता है. धर्म रुपी अफीम की तरह मनरेगा रुपी योजनाओं ने किसानों को पंगु ही बनाया है.भयंकर लूट है.यदि 10 वर्ष बिना काम किए खाने को मिल जाए तो 11 वें वर्ष बेड़ा गर्क समझिए.मनरेगा जैसी योजनाओं को संचालित किए जाने का अभिप्राय यह है कि सरकार मान रही है कि गांवों का किसान मजदूरों के रूप में तेजी से तब्दील हो रहा है. वर्त्तमान में देश के किसानों को संरक्षण दिए जाने की जरुरत है ताकि खेती बची रह सके. काश! छोटी जोत के वोट से निर्वाचित सरकारें ऐसा कर पातीं.
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