Monday, 13 February 2012

shahayar chale gaye

शहरयार साहब नहीं रहे: विनम्र श्रंद्धाजलि-
मशहूर शहरयार साहब हमारे बीच नहीं रहे l  एक बार अलीगढ़ विश्वविद्यालय में उन्हें सुना था l  वही पाकीज़ा का लिखा एक गाना  उन्हीं के मुख से-दिल चीज क्या है/ आप मेरी जान लीजिए. बेहद संजीदा थे वे l  बाद में वे उर्दू शायरी के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजे गए l  "नींद की ओस से पलकों को भिगाएं कैसे/ जागना जिसका मुकद्दर हो वो सोये कैसे l l " और "सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ है? इस शहर में हर शख्स परेशान क्यूँ है?" यह उनके अलफ़ाज़ थे. अब वे हमारे बीच नहीं हैं तो उन्हीं के अंदाज़ में इतना ही कह सकते हैं-"वो कौन था वो कहाँ का था क्या हुआ था उसे/  सुना है आज कोई शख्स मर गया यारों l l " क्या सचमुच कवि, शायर, लेखक,
साहित्यकार अथवा कलाकार मर सकता है! नहीं, अपने लिखे से वह वर्षों हमारे बीच जिंदा रहता है; युगों युगों तक मशहूर शायर  शहरयार साहब भी हमें बहुत याद आएंगे l  जब पाकीज़ा के बोल-"जुस्तजू जिसकी थी कि उसको तो न पाया हमने/ इस बहाने देख ली मगर दुनिया मैंने" गुनगुनायेंगे तब भी शहरयार साहब बहुत याद आएंगे. उन्हें हम सभी की तरफ से विनम्र श्रंद्धाजलि अर्पित है और आज के 'वेलेंटाइन डे' के  सारे कार्यक्रम रद्द l

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