Friday, 24 February 2012

jinhone tarasha

आदरणीय गुरुवर के लिए-
हे गुरुवर! 
हे आलोचक! 
हे कविवर!
हे कर्मपुंज!
हे ज्ञानप्रवर! 
हे नव्य गुणाकर, ज्ञान-प्रखरl  
नव चेतनता का
भरे सिन्धु 
मन में उठतीं
लहरें गत्वरl 
l l साभार-विनय कांत l l
 
 

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