Saturday, 31 December 2011

naye varsh par vishesh

जाने वाले वर्ष २०११ तुझे अल्ला हाफ़िज़- आने वाले वर्ष २०१२ को सादर प्रणाम-
नएपन का अहसास भुला देता है न जाने  कितने जख्म
हर इतिहास का पन्ना खून के धब्बों से नहीं लिखा होता l l विनय कांत l l  
 

Friday, 30 December 2011

sathi hamasafar

साथी हमसफ़र अब नाज़ है तुम पर l
बीते ज़माने की सीता कौन चाहता है! l
वो खेत की जोत वो हल की खरोच l  
ताउम्र परीक्षा ही अब कौन देता है! l
साथी हमसफ़र............................l l विनय कांत l l
 

aao ganv chalen

किसान का बेटा पूछ रहा था बाबू  शहर इधर ही है l
वह मजबूरी में मजदूर का बुझता चिराग़ ही तो था l l  विनय कांत l l  

Thursday, 29 December 2011

मित्रों! एक कविता नए वर्ष के अवसर पर आप सभी को समर्पित-
नया साल
नया एहसास
सुर्ख आँखों में
है तैर जाती
वृहत्तर कल्पना
सोचकर ही
प्रत्येक
नएपन के एहसास को
स्फूर्त होता मन
तब वासांसि जीर्णानि यथा विहाय.....
उठता है कौंध
बुद्ध का क्षणवाद
दर्शन का चिंतन
हर नएपन की
करता है परख.....
सचमुच
नयापन
असमंजस भरा
और कभी सुखद
नया हर पल
होता ही है आह्लादकारी!
ओ रे धक् धक्
धड़कता ह्रदय
समय को
खींचती
तानती
घड़ियाँ
और
हैं उनकी सूइयां
नश्तर सी चुभती
स्मृतियों की धुंधली रेखा बीच
है खो जाती
पहले प्यार की प्रतीक्षा!
अब नयापन
बाज़ारों की फूटपाथों
पर रोजमर्रा की
जरुरत का सामान जुटाती
तलाशती
तरेरती
हैं सुर्ख आँखें!

Wednesday, 28 December 2011

chunavi shankhanad

सत्ता का खेल पीस पार्टी का मेल
विधानसभा चुनाव २०१२ में उत्तर प्रदेश की सियासत गिरगिट की तरह रंग बदलती दिखलाई पड़ रही है. कल तक जो अपने थे वे दामन छुड़ाकर दूसरे दलों की तरफ जा रहे हैं. बहुजन समाज पार्टी, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के असंतुष्टों को पीस पार्टी विधानसभा चुनावों में अपना दलीय उमीदवार बना रही है. नेपाल से सटे उत्तर प्रदेश के सीमाई इलाकों में पीस पार्टी, समाजवादी पार्टी के सत्ता तक पहुँचने का खेल बिगाड़ सकती है. गोरखपुर, देवीपाटन, वाराणसी और बस्ती मंडल की लगभग ५० सीटों पर पीस पार्टी सपा को प्रभावित कर रही है. निचले तबके के अधिकांश मुस्लिम मतदाताओं का कहना है कि जब दलित एकजुट होकर बसपा की सरकार बनवा सकते हैं तब मुसलमान पीस पार्टी को सत्ता की सीढ़ियों पर तो चढ़वा ही सकते हैं. कांग्रेस भी पढ़ेलिखे उच्चवर्गीय मुस्लिम मतदाताओं का वोट पा सकती है. मुस्लिम मतदाताओं का सर्वाधिक नुकसान समाजवादी पार्टी को है जबकि बसपा उन्हीं सीटों पर  मुस्लिम मतदाताओं का वोट पाएगी जहाँ बसपा के मुस्लिम उम्मीदवार होंगे. पीस पार्टी ने पूंजीपतियों, बाहुबलियों को खूब टिकट दिया है. जाति बिरादरी का ध्यान रखते हुए ब्राह्मन, ठाकुर बिरादरी के उम्मीदवारों की अच्छी खासी  संख्या भी पीस पार्टी में है.फिलहाल चुनाव बाद बनाने वाली सरकार में पीस पार्टी की अहम् भूमिका होगी. एक संभावना यह भी है कि यदि पीस पार्टी बराबरी पर चुनावी कदम ताल करती रही तो बसपा और भारतीय जनता पार्टी कि सीटें बढ़ सकती हैं. वैश्य और अन्य बिरादरी के प्रतिबद्ध वोटर अभी भी  बी जे पी के साथ ही चुनावी समर में रहेंगे. आगे आगे देखिए होता है क्या!   

Tuesday, 27 December 2011

jativadi hai u.p. ki siyasat

"जातिवादी है यू पी की सियासत(जातीय समीकरण और यू पी चुनाव)"-
इस बार के यू पी विधानसभा चुनाव में कुछ भी कहना मुश्किल है. मुस्लिम मतों को दलीय मत के रूप में बदलने के लिए सपा, बसपा और कांग्रेस में जबरदस्त रस्साकशी जारी है. आरक्षण का जिन्न बोतल से बाहर निकल चुका है. कांग्रेस के आरक्षण कार्ड से सपा और बसपा सदमे में है. उधर पीस पार्टी की मुस्लिम मतों के निचले तबके में गहरी पैठ है. अब तक के चुनावों में एकमुश्त पड़ने वाला माइनोरिटी वोट विखंडित है. ब्राह्मन मतदाता कन्फ्यूज हैं. ब्राह्मण मतदाताओं का एक मुश्त वोट किसी भी दल को नहीं मिलाने की संभावना है.उनकी बसपा से मोहभंग की स्थिति है.उच्च शिक्षा में पिछले पांच वर्षों में एक भी नौकरी सवर्णों को नहीं मिली है.  सपा के साथ ठाकुर मतदाता हैं. ठाकुर वर्ग के  मतदाताओं का कहना है जो बसपा को हराएगा उसी को वोट देंगे. कुर्मी मतदाता अपना दल के साथ सपा को भी वोट देंगे. जाटों पर  अजित सिंह की मजबूत पकड़ है. यादव जाति का समूह पूरी तरह मुलायम सिंह के साथ है. बेनी प्रसाद वर्मा की वजह से एक छोटे से इलाके का कुर्मी वोट कांग्रेस को मिल सकता है लेकिन ओ बी सी कोटे को काटने की वजह से पिछड़े वर्ग के मतदाता कांग्रेस से काफी नाराज हैं. इस बार के चुनाव में पिछड़े वर्ग के मतदाता समाजवादी पार्टी को एकमुश्त वोट दे सकते हैं. बी जे पी भी साइलेंट वोटिंग में बढ़त बना सकती है. फिलहाल आगे आगे देखिए होता है क्या!    
  

Sunday, 25 December 2011

lokatantr-10

लोकतंत्र   बिक   रहा,  नेता   हैं   खरीदारार l
जातिवाद मदमस्त है,पंथ करे व्यभिचार l l विनय कांत l l

Saturday, 24 December 2011

chunav abhiyan

राजनीति के इस दौर में, चल रहा सियासी दांव l 
जनता जय जयकार करे, नेता करे कांव कांव l l  विनय कांत l l  

katl

साजिशन,  घर  की  दुनिया  तब  लुटीl
जब मौत ने दरवाजे पर दस्तक दी ll
कातिल  कोई   और   दूसरा  न   था l 
अपना   ही  पड़ोसी तो  राजदार  था ll   विनय कांत l l  a

katl

साजिशन,  घर  की  दुनिया  तब  लुटीl
जब मौत ने दरवाजे पर दस्तक दी ll
कातिल  कोई   और   दूसरा  न   था l 
अपना   ही  पड़ोसी तो  राजदार  था ll   विनय कांत l l  

Tuesday, 20 December 2011

satta ka khel

सत्ता तंत्र में खेलना भी बाजीगरी है! सब कुछ प्रायोजित..... पिछले छः महीनों से चल रहे सचिन के महा शतक अभियान ने देश की तमाम समस्याओं महंगाई, बेरोजगारी और बालमजदूरी आदि से ध्यान भंग करने की कोशिश ही की है. क्रिकेट के खेल ने देश के विकास की गति को अवरुद्ध किया है.....सरकार द्वारा इस खेल को बढ़ावा देने के पीछे यह मंशा काम करती है कि देश कि विफलताओं की तरफ देश के नागरिकों का ध्यान न जाए!    

Monday, 19 December 2011

discovery of india

पंडित जवाहर लाल नेहरू की पुस्तक "डिस्कवरी आफ इंडिया" को वी के कृष्णमेनन ने 'रीराईट' किया था. मतलब कई जगह उनकी पैनी नजर ने किताब को परिष्कृत किया था. उनकी अंगरेजी बहुत ही परिष्कृत थी. १९४४ में जवाहर लाल नेहरू ने पूरा कर लिया था लेकिन चेक करके और छप कर आने में दो वर्ष लगे. बाद में वी के कृष्ण मेनन स्वतंत्र भारत में मंत्री भी बने. 

Sunday, 18 December 2011

khanakati avaj ka jadu

वो खनकती आवाज का जादू, मेरे मौला लौटा दे l
अब दर्द दवा बनकर, दिल को राहत पहुंचाती है l l
मेरे दीदी को समर्पित जो अब गाने को गाना छोड़ चुकी हैं. सचमुच वे बहुत अच्छा गाती थीं. काश! अभी भी उनके गाने सुनने को मिलते!  

loktantr-9

स्टेशन पर चमक रही, मेरे लाल की दो आँखें l
इक  सपने की हसरत में,शहरों को गाड़ी जाती है l l  विनय  कांत l l  
 

lokatantr-8

चाँद धुंधला दिख रहा, आसमान सर्द चादर है l
लोकतंत्र के संसद में, अब बिकने का आफर है l l विनय कांत l l    

Friday, 16 December 2011

ab pachhataye hot kya!

गलतफहमी रिश्तों में दरार पैदा करती है. आखिर इन्सान गलतफहमी को मन में पनपने ही क्यों देता है! रिश्ते लाचारगी और बेचारगी की हद तक पहुँच जाते हैं. जब पलटकर इन्सान देखता है तब बहुत देर हो चुकी होती है. आख़िरकार उसे मालूम पड़ता है कि उसने भावनाओं में बहकर स्वयं के जीवन को विनाश के पथ पर ही ढकेला था. ओह रे! अविनाशी आत्मा; चित्त क्यों न हुआ स्थिर! 

tulaseedas

संभु प्रसाद सुमति हिय हुलसी l
राम चरित मानस कवि तुलसी l l  तुलसीदास l l
तुलसीदास भक्तिकाल के सचेत कवि हैं सिर्फ भक्त नहीं lउन्होंने  कविता को भक्ति की चासनी में और अधिक स्वादिष्ट बनाया l  

lokatantr-7

दिन दिन ठंडी बढ़ रही, छाया आसमान में धुंध l
लोग घरों में सिमट चले, नहीं प्रकाश का पुंज l l
  

Thursday, 15 December 2011

loktantr-6

विधायक निवास छूट गया, पलेट भी सब खाली है l
राम राज्य का नारा भी, पब्लिक पे अब भारी है l l विनय कांत l l

annagiree

यार! यह कोई बात थोड़े ही होती है कि जब चाहा कहीं भी धरना दे दिया. अब अन्ना हैं कि इस बार सोनिया गांधी के घर पर धरना देने का ऐलान कर चुके हैं. अब सरकार ठहरी कमजोर! यदि टीम अन्ना में दम है तो मायावती जी के घर के सामने अनशन करके दिखाएँ....... प्रेशर ग्रुप का मतलब जबर्दस्ती थोड़े ही होती है. एक बात और जो गौरतलब रही; वह यह कि अन्ना ने एक दिन का सांकेतिक धरना दिल्ली में महाराष्ट्र भवन से ही क्यों शुरू किया? क्या यह स्वतंत्र भारत में मराठा राज्य की सर्वोच्चता का संकेत नहीं था. इतिहास गवाह रहा है कि मराठों ने देश के लिए कितना खून बहाया...........झूठ नहीं बोलूंगा! कानून बनाने में वक्त तो लगता ही है जैसे प्यार का पहला ख़त लिखने में वक्त लगता है. अन्ना और उनकी टीम तो देश की जनता को ऐसा सन्देश दे रही है कि मानो कांग्रेस ने अब तक देश के विकास के लिए कुछ किया ही नहीं. ऐसा नहीं है कि देश ने तरक्की नहीं की है. लोगों का जीवन स्तर उठा है.  पूर्व के "ब्यूरोक्रेट्स" को लेकर चले हैं भारत-भाग्यविधाता बनने! अन्ना खुद जबर्दस्त "ब्यूरोक्रेसी" और महत्वाकांक्षियों  की चपेट में हैं!   

doha-4

फेसबुक पर टैग करें, मित्र अब नंगी  तस्वीर l  
फ्रेंड होते अन्फ्रेंड सब , मन में बढ़ती  पीर l l

lokatantr ka doha-4

लोकतंत्र में खौल रहा, राजनीति का खेल l
जनता पग पग ढूँढती, आपस का चहुंमेल l l

Wednesday, 14 December 2011

lokatantr ka doha-3

लोकतंत्र में सभी जगह, हुई घूस की छूट l
काम करने के बदले, अफसर  लेते  लूट l l
 

lokatantr-2

लोकतंत्र में सब जगह, नेताओं का जोर l  
जनता ठगी सी घूमती, पांच साल पुरजोर  l l - विनय कांत l l  

Tuesday, 13 December 2011

hot na aagya bin paisa re

                                                                     होत न आज्ञा बिन पैसा रे
राम दुआरे तुम रखवारे, होत न आज्ञा बिन पैसा रे.. घोर कलयुग है बंधु. लोकतंत्र में बिना पैसा दिए अथवा चढ़ावा चढ़ाए कोई चमत्कार संभव नहीं है. साहब से मिलना है तो तुरंत अर्दली को १०० का नोट थमाइए. बाबू से किसी फ़ाइल को निकलवाना है तब २०० से लेकर ५०० का नोट दिखाइये. साहब से आर्डर करवाना है तब नोटों की २ से ५ गड्डी दीजिए. मंत्री जी तो नोटों के बण्डल मामले में सलाखों के पीछे जाते ही रहते हैं.लोकतंत्र रुपी पहरुआ रक्षक के रूप में खड़ा है. जनता भज रही है- होत न आज्ञा बिन पैसा रे.....जै हो कलयुगी देवताओं की: जै हो!  

loktantr

अब होगा तंत्र का राज, मौज मनाएंगे बेहिसाब.
जनता घुट घुट जीयेगी, रावन करेगा अट्टहास..

aaj ki dilli

आज की दिल्ली पर-
न कपड़ों के मिल मालिक मजे में हैं, न दरजी मजे में हैं.
नई पोशाक चलन में है, अब तो दिल्ली के मच्छर मजे में है.. 

Monday, 12 December 2011

satta sukh

बोले जय श्री राम, राम को किया बदनाम l  
जब सत्ता सुख मिला, बिसर गए हरिनाम l l   

Sunday, 4 December 2011

usaki resham see deha ka jadu

 उसने मुझसे
मोहब्बत के बारे मे पूछा
मैं क्या कहता
मेरी आँखों के आईने में
हसरतों की काँपती ख्वाहिशें
लाल डोरे बनकर तैर रही थीं
उसने पूछा सुर्ख गुलाबों की
खामोशी का राज
गुनगुनी धूप की उजली हंसी का
पिघलते जाना और ढक  लेना
दरख्तों के नरम जिस्म का जंगल
मेरे पास मदहोश खामोशियों का
बदनाम कारवां था
नशा था बेसब्री के आलम में
इश्क की ग़ज़लें गुनगुनाता हुआ
उसकी रेशम सी देह का...
रंजना श्रीवास्तव की यह कविता प्रेम को अलग नज़रिये से देखती है.

Thursday, 1 December 2011

nepali kavi chandr gurung

नेपाली कवि चन्द्र गुरुंग की "अचेल साइरन बजेको छैन" की चंद पंक्तियाँ देखिए! 
" प्रत्येक पहरहरुमा हुकूम बजेको छैन.
 प्रत्येक श्वास-प्रश्वासमा
 शोसणको गंध आउदैन
 टायम -टायममा साइरन बजेको छैना."
 मित्रों! अब मैथिलि कोकिल विद्यापति की हिंदी से मिलान कीजिए. आप नेपाली को पढ़ेंगे तो आसानी  से समझ में आयेगी.
   

poonjivad shuru me hi tha

प्रारम्भिक भारत में सामंतवादी एवं पूंजीवादी दोनों ताकतों का सत्ता में जबर्दस्त हस्तक्षेप था. जहाँ आसानी से खेती सर्वसुलभ नहीं थी वहीँ व्यापारी वर्त्तमान भारत की तरह प्रारंभ में भी सत्ता के सूत्रधार हुआ करते थे. यहाँ तक की राजाओं को व्यापारियों ने अपने सिक्के चलाए जाने के लिए मजबूर किया रहा होगा.  इसके लिए व्यापारियों को अनुमति प्रदान तत्कालीन राजाओं की मजबूरी भी रही होगी.  ऐसा न करने पर राजाओं को व्यापारियों द्वारा सत्ता परिवर्तन का भय सताता रहा होगा. यह ऐतिहासिक तथ्य है कि आदिकालीन भारत में व्यापारियों और स्वर्णकारों की श्रेणियों ने भी अपने कुछ सिक्के चलवाए थे. गुप्त वंश व्यापारिक घराना था, जिसने ३३५ ईस्वी से लेकर ४५५ ईस्वी तक भारत को एकता के सूत्र में आबद्ध किया. मतलब साफ़ है कि अंग्रेजी पूंजीवाद अथवा इस्लामिक पूंजीवाद से बहुत पहले ही पूंजी के बल पर भारत को गुप्त वंश के व्यापारिक शासकों ने एकता के सूत्र में आबद्ध करने की कोशिश की थी. उसका कारण तत्कालीन व्यापार पर उनका पूरी तरह काबिज होना था. चौथी सदी आते आते सामंतवादी ताकतें कमजोर पड़ने लगीं. व्यापारिक ताकतों के अगुआ चन्द्रगुप्त प्रथम  ने ३१९-३२० ने अपने राज्यारोहण की प्रसन्नता में गुप्त संवत भी चलवाया. इतना ही नहीं ज्यों ज्यों व्यापारिक ताकतें सत्ता में हस्तक्षेप करने लगीं त्यों त्यों तमाम सामाजिक बुराइयां भी समाज में व्याप्त हो चलीं थीं.