सत्ता का खेल पीस पार्टी का मेल
विधानसभा चुनाव २०१२ में उत्तर प्रदेश की सियासत गिरगिट की तरह रंग बदलती दिखलाई पड़ रही है. कल तक जो अपने थे वे दामन छुड़ाकर दूसरे दलों की तरफ जा रहे हैं. बहुजन समाज पार्टी, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के असंतुष्टों को पीस पार्टी विधानसभा चुनावों में अपना दलीय उमीदवार बना रही है. नेपाल से सटे उत्तर प्रदेश के सीमाई इलाकों में पीस पार्टी, समाजवादी पार्टी के सत्ता तक पहुँचने का खेल बिगाड़ सकती है. गोरखपुर, देवीपाटन, वाराणसी और बस्ती मंडल की लगभग ५० सीटों पर पीस पार्टी सपा को प्रभावित कर रही है. निचले तबके के अधिकांश मुस्लिम मतदाताओं का कहना है कि जब दलित एकजुट होकर बसपा की सरकार बनवा सकते हैं तब मुसलमान पीस पार्टी को सत्ता की सीढ़ियों पर तो चढ़वा ही सकते हैं. कांग्रेस भी पढ़ेलिखे उच्चवर्गीय मुस्लिम मतदाताओं का वोट पा सकती है. मुस्लिम मतदाताओं का सर्वाधिक नुकसान समाजवादी पार्टी को है जबकि बसपा उन्हीं सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं का वोट पाएगी जहाँ बसपा के मुस्लिम उम्मीदवार होंगे. पीस पार्टी ने पूंजीपतियों, बाहुबलियों को खूब टिकट दिया है. जाति बिरादरी का ध्यान रखते हुए ब्राह्मन, ठाकुर बिरादरी के उम्मीदवारों की अच्छी खासी संख्या भी पीस पार्टी में है.फिलहाल चुनाव बाद बनाने वाली सरकार में पीस पार्टी की अहम् भूमिका होगी. एक संभावना यह भी है कि यदि पीस पार्टी बराबरी पर चुनावी कदम ताल करती रही तो बसपा और भारतीय जनता पार्टी कि सीटें बढ़ सकती हैं. वैश्य और अन्य बिरादरी के प्रतिबद्ध वोटर अभी भी बी जे पी के साथ ही चुनावी समर में रहेंगे. आगे आगे देखिए होता है क्या!