Friday, 16 October 2015

भावनाओं और आस्था की सियासत बंद हो-
पिछले बीस वर्षों में सूबे का किसान तबाही के दौर में है।  गन्ना किसानों की स्थिति नाजुक है। चीनी मिलें बंद हैं. गोरखपुर का खाद कारखाना आज तक बंद है।  विकास के नाम पर कमीशनखोरी वाली सड़कें बनी हैं।  क्या विकास हुआ है ?  ज़रा सोचकर बताएं आप! असल में सरकारें जब विकास नहीं कर पातीं तब वे कभी गोवध और कभी आरक्षण  जैसे मुद्दों पर राग अलाप कर जनता का ध्यान भंग कर वोट बैंक की सियासत करती हैं।  दाल 180 रूपये किलो! खाद्य पदार्थों की कीमत इतनी कि दिहाड़ी मजदूर के लिए स्वप्न नुमा। बसपा के लिए दलित, सपा के लिए यादव और मुसलमान और बी जे पी के लिए हिन्दू। हिन्दू वाली राजनीति अब गाय माता पर आ टिकी है।  गो माता  में  हमारी आस्था है। आस्था का सियासी करण और भावनाओं की राजनीति द्वारा जनहित का अंत सियासी दलों की साजिश है।  

Thursday, 15 October 2015

विनय कांत मिश्र। साथियों! आरक्षण पर सियासत समाप्त की जानी चाहिए।  आरक्षण पर बात करने का मतलब सियासत के चकमे में आ जाना है. जिस प्रदेश में सरकारों ने पिछले बीस वर्षों में आम जनहित का कोई कार्य नहीं किया गया. जातिवाद, धर्मवाद और साम्प्रदायिकता एवं उन्माद के द्वारा वोटों के ध्रुवीकरण की राजनीति की गयी।  उत्तर प्रदेश का युवा बेरोजगार है।  प्रौढ़ सरकारी सहायता के लिए दफ्तरों की चकरघिन्नी घिसने को अभिशप्त है।  प्रदेश के समस्त चयन बोर्डों के अध्यक्षों को उच्च न्यायालय ने अयोग्य घोषित कर दिया है।  अयोग्य व्यक्तियों द्वारा योग्य व्यक्तियों का चयन कैसे हो सकता है ? सवाल इन चयन बोर्डों के कार्यकाल में नियुक्त अभ्यर्थियों को  हटाने का भी है।  क्या गारंटी है कि रिश्वत लेकर चयन नहीं किया गया होगा! सवाल अनिल यादव के कार्यकाल के दौरान इनके द्वारा अर्जित की गई धनराशि को सार्वजनिक किये जाने का भी है। एक ऐसे व्यक्ति के हवाले प्रदेश के प्रतियोगी अभ्यर्थियों को कर  देना, क्या किसी अपराध से कम है! चयन का ही सियासीकरण और जातिकरण पहली बार देखने को मिला! सवाल इन वास्तविक मुद्दों की तरफ देखने का है ! आरक्षण पर बात करना महज सियासी चोंचले बाजी है।  

Friday, 17 July 2015

शिक्षण संस्थानों में हुकूमत की चलती है। किसी मंत्री जी का दामाद और किसी रसूखदार का अपना ही शिक्षण संस्थानों की शोभा बढ़ा रहा है। इसी वजह से शिक्षण संस्थान रसातल में धंस रहे हैं। 

Monday, 6 July 2015

जे एन यू   में क्षरण का दौर -
जे एन यू के भारतीय भाषा केंद्र को एक बार फिर प्रोफ़ेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल जी की जरुरत है।  वे छात्रों को गढ़ते हैं।  इसके साथ ही डॉ आशुतोष कुमार को भी जे एन यू में ही होना चाहिए। बहुत अच्छे शिक्षक के साथ वे एक अच्छे इंसान भी हैं। एक बात यह कि जो जे एन यू अपने शिक्षकों और छात्रों की वजह से जाना जाता था, आज इसके कई शिक्षक जे एन यू  के ब्रांड लेबिल की वजह से जाने जाते हैं।   मिली जानकारी के मुताबिक़ सी आई एल के हिन्दी विभाग की सेहत  अब दुरुस्त  नहीं है।  अब न तो नामवर जी हैं , प्रो मैनेजर पाण्डेय हैं, न पुरुषोत्तम अग्रवाल जी हैं और न ही प्रो वीर भारत तलवार जी ही हैं।  केदार जी अब क्लास नहीं लेते। गौरतलब है कि उक्त शिक्षकों के मेहनत की  वजह से सी आई एल ने पूरे देश  में अपनी धाक जमाई।  तब  डॉ राम विलास शर्मा जी को एक लेख के जवाब में पूरी किताब लिखना पड़ता था और आज ! तब  यहां के प्रतिभाशाली शिक्षकों और छात्रों से देश के अन्य विश्वविद्यालयों के शिक्षक भी ईर्ष्या करते थे। अब! .......... 
यह किताबें तकदीर नहीं बदलती -
किताबें बोझ नहीं होतीं।  संयोग से विश्वविद्यालयों के शिक्षक किताबों को बोझ बनाने पर तुले हुए हैं।  थोक के भाव चिंतनहीन किताबें लिखकर विद्यार्थियों का बेड़ा गर्क कर रहे हैं। असल में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर  से एसोसिएट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफ़ेसर से प्रोफ़ेसर बनने के लिये कुछ किताब - विताब छप जानी चाहिए, उसी  प्रक्रिया के तहत दे किताबें, दे किताबें। किताब नहीं कितबिया लिख रहे हैं। जय हो लेखक देवता की , जय हो। 

Wednesday, 1 July 2015

फेसबुक ने अवसर दिया। पुराने मित्रों से मुलाकात हुई।  कुछ नए सम्बन्ध बने।  आपाधापी में भूल गया था कि किस दिन जन्म दिन  आता है।  ले देकर पत्नी और बच्चे जन्म दिवस की शुभ कामना देते रहे हैं । कल 1जुलाई को  नईम भैया और सिद्धार्थ भाई का फोन भी आया।  आज संबंधों के निभाने का सवाल महत्वपूर्ण है। अपनापन जीवन को  रचनात्मक बनाता है। जन्मदिन की बधाई देने वाले सभी बड़ों को प्रणाम निवेदित है। समवयस्कों का अभिवादन और छोटों को स्नेह , जिनकी वजह से प्रतिरोध की ताकत मिलती रही है। 

Saturday, 20 June 2015

 
काश साहब साहित्यकार होते-
हिन्दी के साहित्यकार अब गाँवों से विमुख हो चुके हैं. दिल्ली में रहने वाले प्रोफ़ेसर एक लक्खा से ऊपर हैं.दिल्लीनुमा अध्यापक साहित्यकारों वाला पुराना गाँव पचास साल पहले वाला है। सवाल यह है कि देखि दुपहरी जेठ की छाहौं चाहत छाँह, लिखने वाले कितने साहित्यकार अब हैं. दिल्ली का ए सी छोड़ कर कौन गाँवों में जहमत उठाने जाए बाबू।  इसीलिये कहता हूँ कि अब रचनाकारों में ईमानदारी की कमी और अनुभव सम्मत ज्ञान का अभाव है।  गाँव कितनी तेजी से बदल रहे हैं।  कस्बे का क्या हाल है।  गाँवों के किसान मजदूर कितने  तबाह है। अरहर की दाल उसके लिए सपना है।  न पेड़ हैं और खेत।  सब विलुप्त।  पास के कस्बे वाला जमीन का दलाल गाँवों के किसानों को उनके जमीन से बेदखल कर रहा है।  बहुत सी बातें दिल्ली के साहब साहित्यकार लोग टेलीविजन पर देख और सुनकर लिखते हैं.

Friday, 19 June 2015

 साहित्य में जुगाड़-
हिन्दी आलोचना का दायरा महज विश्वविद्यालयों तक ही है। एक विश्वविद्यालय का शिक्षक कवि तो दूसरे का आलोचक,दूसरे  का कहानीकार तो तीसरे का आलोचक। उपन्यास के क्षेत्र में सेवानिवृत्त डाक्टर साहब की पौ बारह।  संस्मरण में अस्सी पार महारथी।  मतलब वह भी बूढ़ा हो चुका।  असल में हिन्दी की दुर्गति यही है।  एकाध बाहरी हैं तो वह भी आलोचक शिक्षक को पटाये हैं। 

Sunday, 7 June 2015

राम का था ही नहीं-
वह राम का न था
रावण उसका आदर्श था
सोने की लंका का अधिपति
विभीषण से उसे कभी डर नहीं लगा
राजपाट सब अपना
मुरौव्वत उसमें न थी
वह राजा
जी हाँ राजा सोने की चिड़िया का
जय श्री राम
आपके नाम पर हो गया काम!

Thursday, 21 May 2015

विनय कांत मिश्र। एक दशक पहले तक गोरखपुर सहित पूर्वांचल की सियासत ठाकुरवाद की चपेट में थी लेकिन राजनीति का क्षत्रियवाद अब कमजोर पड़ता नजर आ रहा है। इसका कारण आम जनता का सियासत के ठाकुरवाद को ताड़ लेना है। अभी महाराजगंज में फरेन्दा विधानसभा सीट पर उप चुनाव हुआ। यहां बजरंग बहादुर सिंह को समाजवादी पार्टी के विनोद मणि ने पराजित किया। फरेन्दा बी जे पी की परम्परागत सीट रही है। यहां पर राजनीति का क्षत्रियवाद पराजित ही नहीं हुआ बल्कि वह खिसककर तीसरे पायदान पर पहुँच गया।
गौरतलब है कि एक दशक पहले से लेकर 2012 तक गोरखपुर सहित पूर्वी उत्तर प्रदेश के महाराजगंज, कुशीनगर, देवरिया, बस्ती, संतकबीरनगर और सिद्धार्थनगर में योगी आदित्यनाथ की धाक थी। उक्त जिलों के कुछ विधानसभा सीटों पर योगी अड़ जाते थे लेकिन जिस तरह से 2012 के विधासभा चुनावों में सपा ने अपना झंडा बुलंद किया वह अकारण नहीं था। दरअसल गोरखपुर और बस्ती मंडल ब्राह्मण बाहुल्य क्षेत्र है। ब्राह्मण जिसे वोट करता है चुनाव वही जीतता है। इसका ताजा उदाहरण फरेन्दा विधानसभा के उपचुनावों में विनोद मणि का जीतना है। ब्राह्मणों ने बी जे पी के ठाकुर प्रत्याशी बजरंगी सिंह के खिलाफ मतदान किया।
कुछ ऐसा ही नजारा नगर निकाय के चुनावों में भी था. सिद्धार्थ नगर नगर पालिका में बी जे पी के प्रत्याशी संजय सिंह बने। संजय सिंह के लिए बाबा आदित्यनाथ ने जान लड़ा दिया था। बड़ी मेहनत के बाद भी योगी जी उक्त सीट पर बी जे पी के क्षत्रिय प्रत्याशी को विजयश्री नहीं दिलवा सके। हालांकि यह सीट भी बी जे पी के कब्जे में थी। यहां से घनश्याम जायसवाल चुनाव जीतते रहे थे। यहां भी ब्राह्मण मतदाता निर्णायक रहे थे। गोरखपुर के आस पास के जिलों में योगी जी उन्हीं क्षेत्रों में चुनाव प्रचार पर निकलते हैं जहां का बी जे पी उम्मीदवार क्षत्रिय उपबिरादरी का होता है। पिछले विधानसभा चुनाव योगी जी का ही सियासी प्रभुत्व था जिसकी वजह से राघवेन्द्र सिंह को डुमरियागंज विधानसभा सीट से बी जे पी का उम्मीदवार बनाया गया। योगी जी ने मुस्लिम बहुल क्षेत्र में धुंआधार चुनाव प्रचार किया लेकिन सपा के राम कुमार यादव उर्फ़ चिनकू यादव के पक्ष में हुई जातिवादी लामबंदी को नहीं रोक पाये। यहां क्षत्रिय प्रत्याशी के खिलाफ पिछड़ी बिरादरी मतदाता लामबंद थे। जहां डुमरियागंज में योगी जी ने ताबड़तोड़ जनसभाएं कीं वहीं उत्तर प्रदेश के 2012 के विधासभा चुनावों में योगी जी ने कपिलवस्तु विधानसभा क्षेत्र से भाजपा प्रत्याशी श्री राम चौहान के पक्ष में उतनी जनसभाएं नहीं कीं। 
  1.               इतना ही नहीं महंत आदित्यनाथ ने हिन्दू युवा वाहिनी में ठाकुर उपबिरादरी के लोगों को ही जिलाध्यक्ष पद पर सुशोभित किया है। दो एक अपवाद हैं ।   योगी जी के  क्षत्रिय प्रेम के जगजाहिर हो जाने के बाद अन्य बिरादरियों के मतदाता उनके द्वारा समर्थित ठाकुर उपबिरादरी के उम्मीदवार से कन्नी काटते हैं। 
 हिन्दू युवा वाहिनी 

Wednesday, 20 May 2015

भई ! ज्ञान विज्ञान कौन देखता है. जिसने जितनी चमचई की वह उतना ही काबिल। आयोग वाले या विश्वविद्यालयों के जिम्मेदार और ओहदेदार अब एक्सपर्ट नहीं रीढ़ विहीन प्रोफेसरों को साक्षात्कार के लिए बुलाते हैं. जो टी ए और डी ए भरकर उपकृत हो जाए! जे एन यू भी अब सेटरों का गढ़ बन चुका है. सेंटर आफ इंडियन लैंग्वेज को ही  देखें तो प्रो  नामवर सिंह , प्रो मैनेजर पाण्डेय, प्रो पुरुषोत्तम अग्रवाल और प्रो वीर भारत तलवार जैसे कितने शिक्षक  अब हैं. अब यहां के शिक्षक जे एन यू ब्रांड से जाने जाते हैं. उसी सेटिंग और जुगाड़ ने जे एन यू जैसे अकादमिक संस्थानों का भी बंटाधार किया है। 

Monday, 18 May 2015

19.05.2015.yogi aditynath.latest


यहां हिंदुत्व की सियासी फसल को तराशा जा रहा है- विनय कांत
गोरखनाथ का मंदिर हिन्दुओं की आस्था का केंद्र है. धार्मिक आस्था के कारण पूर्वी उत्त्तर प्रदेश की पहचान मठों और मंदिरों से होती है. ह्त्या, लूटपाट, रंगदारी और ठेकों से निकलकर पूर्वांचल की सियासत मठाधीशों के ठेलों पर जा सिमटी है. यहां धर्म की सियासत सिर चढ़कर बोलती है. गोरखपुर हो या काशी, अयोध्या हो या छोटा मोटा कोई दूसरा शहर या कस्बा, हर जगह धार्मिक सियासत की बम बम है. कभी जुबां की तो कभी हाथों में तलवार की सियासत ने धार्मिक नेताओं की पौ बारह करवाई है.
                    धर्म के धुरंधर मठाधीशों में सियासी हसरत का पनपना नई बात नहीं है. मठों का राजनीति से गहरा रिश्ता रहा है. पूर्वी उत्तर प्रदेश की जनता के लिए धर्म अफीम से भी बढ़कर है. एक दशक पहले काशी, गोरखपुर, अयोध्या और मथुरा सहित उत्तर प्रदेश की सियासत को कट्टरपंथी नेताओं धर्म को अपने चोले में रंग कर अपनी हसरत को गति प्रदान की थी. हालांकि स्वयंभू मठाधीशों ने धार्मिक दावेदारी की है. मसलन हिन्दू कौन है.हम हिन्दू हैं. शिव के संतानों जागो. तुम्हें मुस्लिम जीने नहीं देगा. यदि हिन्दू चेत जाएँ तो भारत की तकदीर बदल जाएगी। नब्बे के दशक में मंडल के कमंडल ने सियासत में धर्म के दुकानदारों की चढ़ी बाजारी हालत की हवा निकाल दी है. सवाल यह है के कौन से भारत की तकदीर और कौन सा हिन्दू। धार्मिक उत्तेजना पैदा कर सियासी वोट बैंक को साधना धार्मिक नेताओं की फितरत है.
                 साक्षी महाराज हों या गोरखपुर के सांसद योगी आदित्य नाथ. ये धार्मिक नेता अक्सर उत्तेजक बयानबाजी करते हैं. हिन्दुत्त्व की सियासी फसल को तराशना उनकी आदत है. दरअसल भारतीय जनता पार्टी ने 2014 के लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में छलाऊ काल्पनिक विकास मॉडल को जनता के समक्ष प्रस्तुत कर अपार सफलता हासिल किया। अब बी जे पी की विकास मूलक राजनीति की पिछले एक वर्ष में हवा निकल चुकी है। अब बी जे पी के पास धर्म के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं रह जाता है। योगी आदित्यनाथ हों अथवा जोई अन्य बी जे पी का सांसद अथवा मंत्री। सभी भड़काऊ बयान देने के लिए मुक्त हैं। असल बात यह है कि सभी योजना बद्ध ढंग से बी जे पी के हिन्दुत्ववादी सियासी वोट बैंक को तराश रहे हैं. गौरतलब है कि बिहार विधानसभा चुनाव करीब है. इसके साथ ही उत्तर प्रदेश में भी चुनावी हलचल जारी है.
               काबिले गौर है कि देश के गृहमंत्री जब अयोध्या में राम मंदिर क़ानून नहीं बना सकने की मजबूरी बतला रहे थे उसी दिन गाजियाबाद में गोरक्षनाथ पीठ के महंत एवं सांसद योगी आदित्यनाथ हिन्दू महासंघ सम्मलेन में हिन्दुओं को माला एवं भाला साथ लेकर चलने की वकालत कर रहे थे। 21 वीं शताब्दी को हिन्दू शताब्दी बतलाते हुए योगी आदित्यनाथ  ने हिन्दुओं को एकजुट होने का आह्वान किया। उन्होंने ललकारवादी मुद्रा में कहा कि वह दिन दूर नहीं जब भारत और प्रत्येक हिन्दू के आगे दुनिया सिर झुकाएगी। आज हिन्दू धर्म और गो रक्षा के जरूरी है कि हर हिन्दू हाथ में माला और भाला लेकर साथ चले। जब भी किसी समुदाय ने हिन्दुओं को मिटाने की कोशिश की है तो उन्हें मुह की खानी पड़ी है। गौरतलब है कि एक तरफ हिंदुत्व के लिए पार्टी के एक नेता राजयसभा में बहुमत न होने की मजबूरी बतला रहे थे वहीं योगी अपने तीखे बोल से हिंदुत्व की सियासी फसल को अभिसिंचित कर रहे थे।
             सांसद योगी आदित्यनाथ इस तरह के बयान इसलिए देते हैं कि पिछले अपने संसदीय क्षेत्र का आशातीत विकास  नहीं कर सके हैं. अब तो हिन्दू युवा वाहिनी के कार्यकर्ताओं द्वारा बाकायदा यह नारा गढ़ दिया गया है कि पूर्वांचल में रहना होगा तो योगी योगी कहना होगा। गोरखपुर सहित पूर्वांचल की व्यथा यह है कि विगत तीन दशकों से यहां की सियासत मठों, महंतों और माफियाओं के रास्ते होकर गुजरती है. गोरखपुर का खाद कारखाना अभी भी वादों की गिरफ्त में है. पूर्वाचल का चीनी उद्योग पूरी तरह चौपट हो चुका है. क्योंकि यहां मिलें समय पर गन्ना किसानों के रुपये का भुगता नहीं करती है. सड़कें भी राम भरोसे हैं.  
           पूर्वांचल की त्रासदी तह है वीर बहादुर सिंह के बाद यहां कोई विकासमूलक नेता नहीं पैदा हुआ।
गोरखपुर परिक्षेत्र में धर्म की सियासत को इस तरह समझा जा सकता है। योगी आदित्यनाथ ने
हिन्दू युवा वाहिनी बनाई है। हिन्दू युवा वाहिनी के अधिकाँश जिलाध्यक्ष ठाकुर उपबिरादरी से हैं. प्रदेश प्रभारी राघवेन्द्र सिंह हैं। कहा जाता है कि बनिया उपबिरादरी के युवा वाहिनी लोग फाइनेंस करते हैं. विधानसभा का चुनाव हो या नगर निकायों का चुनाव हर जगह ठाकुर उप बिरादरी के लिए महाराज जी जान लड़ा देते हैं. 2012 के विधानसभा चुनावों में डुमरियागंज विधानसभा क्षेत्र से प्रेम प्रकाश तिवारी उर्फ़ जिप्पी तिवारी बी जे पी से टिकट के दावेदार थे. जिप्पी जिप्पी का क्षेत्र बदलकर उन्हें माता प्रसाद पाण्डेय के खिलाब इटवा विधानसभा क्षेत्र से भारतीय जनता पार्टी का  उम्मीदवार बना दिया गया. इसके साथ ही  डुमरियागंज में हिन्दू युवा वाहिनी के प्रदेश प्रभारी राघवेंद्र सिंह को उम्मीदवार बनवाया गया। सूत्र बताते हैं की पूर्वांचल के टिकट वितरण में महराज जी की खूब चलती है. वैसे तो आम तौर पर लोग महराज जी पर प्रतिक्रिया बचते हैं लेकिन रतन सेन डिग्री कालेज की पूर्व एसोशिएट प्रोफ़ेसर डॉ ज्योतिमा राय कहती हैं कि योगी जी को मंदिर में पूजा अर्चना पर ध्यान देना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति धार्मिक नेता है तो उसे राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। धर्म का स्थान बहुत ऊंचा है।
         हिन्दू युवा वाहिनी के जनपद सिद्धार्थनगर के जिलाध्यक्ष रमेश गुप्ता बताते हैं कि इन दिनों हम लोग गो रक्षा अभियान चला रहे हैं.सवाल गो रक्षा का नहीं है. गाय के बहाने सियासत चमकाने का है. दरअसल गोरखपुर परिक्षेत्र में गोकशी की छिटपुट घटनाएँ होती रहती हैं जिसकी वजह से हिंदूवादी संगठनों को लामबंदी का अवसर मिलता है.यहां भावनाओं की राजनीति सिर चढ़कर बोलती है.समूचे परिक्षेत्र में हिंदूवादी राजनीति का परचम है. हिन्दू वाद के खिलाफ इस्लामिक लामबंदी भी चुनावों का समीकरण तय करती है । हिन्दूवादी सियासत पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए सवर्ण समाज पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अवधेश कुमार मिश्र सवालिया लहजे में कहते हैं कि हिन्दू!  कौन हिन्दू । आज धार्मिक राजनीति ने हिन्दू समाज को  तीन टुकड़ों सामान्य, पिछड़े और दलित वर्ग में विभाजित कर दिया है। अवधेश पूछते हैं कि योगी जी आरक्षण के मुद्दे पर क्यों नहीं बात करते। कौन सा हिन्दू, जो सामान्य वर्ग का विद्यार्थी जो 80 प्रतिशत अंक पाकर भी दर दर ठोकरें खाने को अभिशप्त है।आज  सवाल बहुत से हैं. वे कहते हैं कि सवर्णों को धोखा देने वाले सबसे बड़े मुखौटा
योगी आदित्यनाथ जी हैं. उनके सहित बी जे पी के सांसद हिन्दुओं के दो हिस्से पिछड़े और दलित की बात करते हैं लेकिन सवर्ण जाति के हिन्दुओं के हित की बात छोड़ देते हैं. इतना ही नहीं श्री मिश्र कहते हैं कि हिन्दू वादी संगठनों ने ही हिन्दुओं को बांटा है. किस बात के हिन्दू, एक आदमी 30 अंक पाकर नौकरी पा जाता है जबकि दूसरा 80 अंक पाकर दर दर की ठोकरें खाता है. आप देख लीजिए हिन्दू युवा वाहिनी के अधिकाँश जिलाध्यक्ष ठाकुर है. असल में अनके लिए हिंदुत्व एक मुखौटा है. सवाल हिंदुत्व के बहाने सियासत चमकाने का है.
         हिंदुत्व पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए भारतीय राष्ट्रीय बहुजन समाज विकास पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ राजमणि चतुर्वेदी कहते हैं कि राजनीति में उत्तेजक बयानों का कोई मतलब नहीं होता। महज वोट बैंक को साधने के लिए इस तरह के उग्र बयान दिए जाते हैं. सामजिक वैमनस्यता पनपाने के लिए राजनीति में उग्र बयान दिए जाते हैं। हम हैं हिन्दू साथ करोड़ ताला देंगे तोड़ मरोड़, का नारा देकर बी जे पी प्रारम्भ से ही साम्प्रदायिक राजीति करती आयी है, हिंदुत्व लामबंदी के लिए न जाने कितने चरम पंथी नारे गढ़े गए। योगी आदित्यनाथ के नारे भी इसी सियासत की एक कड़ी हैं. इस देश की जनता अब विकास मूलक राजनीति की पोषक है उसे झगड़े झंझट से कोई मतलब नहीं है. न कोई हिन्दू है न कोई मुस्लिम। इस देश की जनता केवल मनुष्य है. बेहतर होता कि पुजारी और मुल्ला दोनों इंसानियत का पाठ पढ़ाते।


Saturday, 16 May 2015

yogi aditynath

पूर्वांचल में दरक रही योगी की दीवार-
विनय कांत। पूरे देश में पूर्वी उत्त्तर प्रदेश की पहचान मठों और मंदिरों से होती है. ह्त्या, लूटपाट, रंगदारी और ठेकों से निकलकर पूर्वांचल की सियासत मठाधीशों के ठेलों पर जा सिमटी है. यहां धर्म की सियासत सिर चढ़कर बोलती है. गोरखपुर हो या काशी, अयोध्या हो या छोटा मोटा कोई दूसरा शहर या कस्बा, हर जगह धार्मिक सियासत की बम बम है. कभी जुबां की तो कभी हाथों में तलवार की सियासत ने ठाकुर नेताओं की पौ बारह करवाई है.
                       धर्म के धुरंधर मठाधीशों में सियासी हसरत का पनपना नई बात नहीं है. मठों का राजनीति से गहरा रिश्ता रहा है. पूर्वी उत्तर प्रदेश की जनता  के लिए धर्म अफीम से भी बढ़कर है. एक दशक पहले तक काशी, गोरखपुर, अयोध्या और मथुरा सहित उत्तर प्रदेश की सियासत को धर्म ने गति प्रदान की थी. इधर नब्बे के दशक में जातिवादी राजनीति ने धर्म के दुकानदारों की बाजारी हालत की हवा निकाल दी है. हालांकि स्वयंभू मठाधीशों ने धार्मिक दावेदारी की है. मसलन हिन्दू कौन है.हम हिन्दू हैं. शिव के संतानों जागो. तुम्हें मुस्लिम जीने नहीं देगा. यदि हिन्दू चेत जाए तो भारत की तकदीर  बदल जाएगी। सवाल यह है के कौन से भारत की तकदीर और कौन सा हिन्दू। धार्मिक उत्तेजना पैदा कर सियासी वोट बैंक को साधना धार्मिक नेताओं की मजबूरी है.
                    गोरखपुर के सांसद योगी आदित्य नाथ अक्सर उत्तेजक बयानबाजी करते हैं. हिन्दुत्त्व की सियासी फसल को तराशना उनकी मजबूरी है. दरअसल भारतीय जनता पार्टी ने 2014 के लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में काल्पनिक विकास मॉडल को जनता के समक्ष प्रस्तुत कर अपार सफलता हासिल किया। बी जे पी की विकास मूलक राजनीति की पिछले एक वर्ष में हवा निकल चुकी है। अब बी जे पी के पास धर्म के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं रह जाता। योगी आदित्यनाथ हों अथवा जोई अन्य बी जे पी का सांसद अथवा मंत्री। सभी भीतर से भड़काऊ बयान देने के लिए मुक्त हैं। असल बात यह है कि सभी योजना बद्ध ढंग से बी जे पी लिए काम कर रहे हैं। बी जे पी के लिए बिहार और उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव महत्वपूर्ण है. विदेशी हो चुके भारतीय प्रधानमंत्री की देशी फ़ौज
के सियासी सूरमाओं की जुबान ही है जो सियासी रथ  को कुर्सी तक पहुंचा सकती है।                                                                                                                                                                                                                देश के गृहमंत्री जब अयोध्या में राम मंदिर  क़ानून नहीं बना सकने की मजबूरी बतला रहे थे उसी दिन गाजियाबाद  में गोरक्षनाथ पीठ के महंत एवं सांसद योगी आदित्यनाथ हिन्दू महासंघ सम्मलेन में हिन्दुओं को माला एवं भाला साथ लेकर चलने की वकालत कर रहे थे।  21 वीं शताब्दी को हिन्दू शताब्दी बतलाते हुए महंत ने हिन्दुओं को एकजुट होने का आह्वान किया।  उन्होंने ललकारवादी मुद्रा में कहा कि वह दिन दूर नहीं जब भारत और प्रत्येक हिन्दू के आगे दुनिया सिर झुकाएगी। आज हिन्दू धर्म और गो रक्षा के जरूरी है कि हर हिन्दू हाथ में माला और भाला लेकर साथ चले।  जब भी किसी समुदाय ने हिन्दुओं को मिटाने की कोशिश की है तो उन्हें मुह की खानी पड़ी है। गौरतलब है कि एक तरफ हिंदुत्व के लिए पार्टी के एक नेता   राजयसभा में बहुमत न होने की मजबूरी बतला रहे थे वहीं योगी अपने तीखे बोल से हिंदुत्व की सियासी फसल   को अभिसिंचित कर रहे थे।                                                                                                    
                 सांसद योगी आदित्यनाथ इस तरह के बयान इसलिए देते हैं कि पिछले अपने संसदीय क्षेत्र का विकास करने में वे अक्षम साबित हुए हैं. गोरखपुर सहित पूर्वांचल की व्यथा यह है कि विगत तीन दशकों से यहां की सियासत मठों, महंतों और माफियाओं के रास्ते होकर गुजरती है. गोरखपुर का खाद कारखाना अभी भी वादों की गिरफ्त में है. पूर्वाचल का चीनी उद्योग पूरी तरह चौपट हो चुका है. गोरखपुर, बस्ती,देवीपाटन मंडल के गण किसानों के गन्ना  नेपाल के चीनी मीलों में भेज दिया जाता है. क्योंकि यहां मिलें समय पर गन्ना किसानों के रुपये का भुगता नहीं करती है. सड़कें भी राम भरोसे हैं. पूर्वांचल की त्रासदी तह है  वीर बहादुर सिंह के बाद यहां कोई विकासमूलक नेता नहीं पैदा हुआ।
                गोरखपुर परिक्षेत्र में धर्म की सियासत को इस तरह समझा जा सकता है।  योगी आदित्यनाथ ने
हिन्दू युवा वाहिनी बनाई है।  हिन्दू युवा वाहिनी के अधिकाँश जिलाध्यक्ष ठाकुर उपबिरादरी से हैं. प्रदेश प्रभारी राघवेन्द्र सिंह हैं। बनिया उपबिरादरी के लोग फाइनेंस करते हैं. हिन्दू युवा वाहिनी का एक भी जिलाध्यक्ष  पिछड़ी अथवा दलित बिरादरी का नहीं है. विधानसभा का चुनाव हो या नगर निकायों का चुनाव हर जगह ठाकुर उप बिरादरी के लिए महाराज जी जान लड़ा देते हैं. 2012 के विधानसभा चुनावों में डुमरियागंज विधानसभा क्षेत्र से प्रेम प्रकाश तिवारी उर्फ़ जिप्पी तिवारी बी जे पी से टिकट के दावेदार थे. जिप्पी जिप्पी का क्षेत्र बदलकर उन्हें माता प्रसाद पाण्डेय के खिलाब बी जे पी उमेदवार बनवाया गया और डुमरियागंज में हिन्दू युवा वाहिनी के प्रदेश प्रभारी राघवेंद्र सिंह को उम्मीदवार बनवाया गया। सूत्र बताते हैं की पूर्वांचल के टिकट वितरण में महराज जी
की खूब चलती है. वैसे तो आम तौर पर लोग महराज जी पर प्रतिक्रिया  बचते हैं लेकिन रतन सेन डिग्री कालेज की पूर्व एसोशिएट प्रोफ़ेसर डॉ ज्योतिमा राय कहती हैं कि योगी जी को मंदिर में पूजा अर्चना पर ध्यान देना चाहिए। यदि कोई  व्यक्ति धार्मिक नेता है तो उसे राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।  धर्म का स्थान बहुत ऊंचा है।



विगत दो दिनों से अंबरीश सर के साथ रहा. पहले सर ने कहा की लिखना क्यों छोड़ दिया।  मैंने कहा सर, नहीं लिखूंगा। व्यस्तता अधिक थी। उनके साथ  कपिलवस्तु गया। बुद्ध भूमि पर अखिलेश सरकार ने एक धरोहर संजों दिया है. जपिलवस्तु का सिद्धार्थ विश्व विद्यालय जल्द ही समूची दुनिया में ज्ञान की अविरल निर्मल धारा प्रवाहित करेगा।  यू पी विधानसभा के स्पीकर माता प्रसाद पाण्डेय के प्रयासों से एक बड़ी उपलब्धि है।