भावनाओं और आस्था की सियासत बंद हो-
पिछले बीस वर्षों में सूबे का किसान तबाही के दौर में है। गन्ना किसानों की स्थिति नाजुक है। चीनी मिलें बंद हैं. गोरखपुर का खाद कारखाना आज तक बंद है। विकास के नाम पर कमीशनखोरी वाली सड़कें बनी हैं। क्या विकास हुआ है ? ज़रा सोचकर बताएं आप! असल में सरकारें जब विकास नहीं कर पातीं तब वे कभी गोवध और कभी आरक्षण जैसे मुद्दों पर राग अलाप कर जनता का ध्यान भंग कर वोट बैंक की सियासत करती हैं। दाल 180 रूपये किलो! खाद्य पदार्थों की कीमत इतनी कि दिहाड़ी मजदूर के लिए स्वप्न नुमा। बसपा के लिए दलित, सपा के लिए यादव और मुसलमान और बी जे पी के लिए हिन्दू। हिन्दू वाली राजनीति अब गाय माता पर आ टिकी है। गो माता में हमारी आस्था है। आस्था का सियासी करण और भावनाओं की राजनीति द्वारा जनहित का अंत सियासी दलों की साजिश है।
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