Thursday, 15 October 2015

विनय कांत मिश्र। साथियों! आरक्षण पर सियासत समाप्त की जानी चाहिए।  आरक्षण पर बात करने का मतलब सियासत के चकमे में आ जाना है. जिस प्रदेश में सरकारों ने पिछले बीस वर्षों में आम जनहित का कोई कार्य नहीं किया गया. जातिवाद, धर्मवाद और साम्प्रदायिकता एवं उन्माद के द्वारा वोटों के ध्रुवीकरण की राजनीति की गयी।  उत्तर प्रदेश का युवा बेरोजगार है।  प्रौढ़ सरकारी सहायता के लिए दफ्तरों की चकरघिन्नी घिसने को अभिशप्त है।  प्रदेश के समस्त चयन बोर्डों के अध्यक्षों को उच्च न्यायालय ने अयोग्य घोषित कर दिया है।  अयोग्य व्यक्तियों द्वारा योग्य व्यक्तियों का चयन कैसे हो सकता है ? सवाल इन चयन बोर्डों के कार्यकाल में नियुक्त अभ्यर्थियों को  हटाने का भी है।  क्या गारंटी है कि रिश्वत लेकर चयन नहीं किया गया होगा! सवाल अनिल यादव के कार्यकाल के दौरान इनके द्वारा अर्जित की गई धनराशि को सार्वजनिक किये जाने का भी है। एक ऐसे व्यक्ति के हवाले प्रदेश के प्रतियोगी अभ्यर्थियों को कर  देना, क्या किसी अपराध से कम है! चयन का ही सियासीकरण और जातिकरण पहली बार देखने को मिला! सवाल इन वास्तविक मुद्दों की तरफ देखने का है ! आरक्षण पर बात करना महज सियासी चोंचले बाजी है।  

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