Monday, 6 July 2015

यह किताबें तकदीर नहीं बदलती -
किताबें बोझ नहीं होतीं।  संयोग से विश्वविद्यालयों के शिक्षक किताबों को बोझ बनाने पर तुले हुए हैं।  थोक के भाव चिंतनहीन किताबें लिखकर विद्यार्थियों का बेड़ा गर्क कर रहे हैं। असल में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर  से एसोसिएट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफ़ेसर से प्रोफ़ेसर बनने के लिये कुछ किताब - विताब छप जानी चाहिए, उसी  प्रक्रिया के तहत दे किताबें, दे किताबें। किताब नहीं कितबिया लिख रहे हैं। जय हो लेखक देवता की , जय हो। 

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