Friday, 19 June 2015

 साहित्य में जुगाड़-
हिन्दी आलोचना का दायरा महज विश्वविद्यालयों तक ही है। एक विश्वविद्यालय का शिक्षक कवि तो दूसरे का आलोचक,दूसरे  का कहानीकार तो तीसरे का आलोचक। उपन्यास के क्षेत्र में सेवानिवृत्त डाक्टर साहब की पौ बारह।  संस्मरण में अस्सी पार महारथी।  मतलब वह भी बूढ़ा हो चुका।  असल में हिन्दी की दुर्गति यही है।  एकाध बाहरी हैं तो वह भी आलोचक शिक्षक को पटाये हैं। 

No comments:

Post a Comment