Thursday, 24 November 2011

pratirodh

"जब महँगाई डाईन  लगती है l
 तब जूते  थप्पड़ फिर  पड़ते हैं l l
 जब जनता तिल तिल मरती है l
 तब क्रांति बिगुल बज उठती है l l "
 मित्रों! लोकतंत्र में प्रतिरोध की संस्कृति वयस्क हो रही हैl जागो सरकार जागो!

Wednesday, 23 November 2011

subah nahi huyee

अब न कोई गिला और न ही कोई शिकवा. उसकी हंसती खेलती दुनिया को किसी की नज़र लग गई थी. मोहब्बत की दुनिया उजड़ चुकी थी.उसकी देह आग में झुलस चुकी थी. बीबी अलविदा कह  चुकी थी.अब वह जिंदा रहकर भी क्या करता? उसने सोचा था कि वह झंझावातों की दुनिया से दूर फुरसत के कुछ छड़ जीने के लिए जा रहा है. लेकिन यह क्या अब तो डाक्टर नीरज के पास सन्नाटा बुनने के सिवाय कुछ नहीं बचा था. बिलखते हुए उसने कहा कि मेरी तो दुनिया ही उजड़ गई.डाक्टर अनुमिता  के लिए वह आख़िरी रात थी. जी हाँ मित्रों! यह किसी कहानी का अंश नहीं, बल्कि बर्निंग ट्रेन बनी दून हावड़ा एक्सप्रेस के भोर का दृश्य है. ए ख़ुदा! ऐसी सुबह किसी की जिन्दगी में न आए. अब तो हम आप घर से निकलते वक्त यही सोचें कि सही सलामत घर अथवा गंतव्य तक पहुँच जाएँ तो धन्यभाग!

peetana mana hai

जरा पियक्कड़ों के दिल का दर्द सुनिए. शाम को मदिरा की दूकान पर बैठे  पियक्कड़ जानते  हैं  कि अन्ना नहीं यह डान है. कितने कसीदे पढ़े गए थे कुछ दिन पहले ही अन्ना की शान में. अभी कुछ दिन ही तो हुए, मालूम पड़ रहा था कि "गांधी-टोप-युग" की वापसी हो गई. सारे पियक्कड़ों की नींद अब जाकर खुली जब कोड़े मारकर सरेआम पिटाई वाली बात सामने आयी. बंधु! गांधी टोपी के नीचे हिटलरी अंदाज है.वाह वाह क्या बात है? अच्छा; चलो मदिरा पीना बुरी बात है लेकिन यह क्या कि पियक्कड़ को पीटा जाये! अन्ना को नहीं मालूम कि आबकारी विभाग जब पैसा देता है तब देश के अधिकांश नौकरी पेशा वालों के घरों में चूल्हे जलते है. चलिए बोलिए तो मित्रों! सभी पियक्कड़ों की जै. हिटलर शाही  नहीं चलेगी, नहीं चलेगी.......... 

Tuesday, 22 November 2011

bharat akhand hai

अमेरिका ने भारत की आपत्ति के बाद भारतीय मानचित्र को सुधार दिया है. बाकायदा भारत से माफी भी मांग ली है.लेकिन एक राग तो अलाप ही दिया है.अब देखिए! नवसाम्राज्यवादी ताकतें कौन सी शैतानी चाल चलती हैं.जो भारत को खंडित करना चाहते हैं उन्हें यह जानना और समझना चाहिए कि भारत के विषय में बहुत पहले ही वायु पुराण में लिखा है- 
      "उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणं.l
      वर्षं तद्भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः l l " इसी के साथ ही विष्णु पुराण में भी लिखा है-
     " गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे l 
       स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात l l"यहाँ देवगणों का अभिप्राय सज्जनों से है.महान लोगों से है.  

bhikshukh ki naee vyakhya


निराला की एक कविता है भिक्षुक. संवेदनात्मक दृष्टि से बहुत मार्मिक कविता है.लेकिन भिक्षुक कविता भारतीयों का उपहास उड़ाती है. कविता इस तरह है-वह आता/दो टूक कालेजे के करता/पछताता पथ पर आता/पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक/चल रहा लकुटिया टेक/मुट्ठी भर दाने को/भूख मिटाने को/मुख फटी पुरानी झोली फैलाता/.........साथ दो उसके बच्चे.......l इस कविता का अब तक कुपाठ हुआ है.लकुटिया टेकने वाला और कोई नहीं बल्कि निराला... की दृष्टि में गांधी जी हैं.हाड़ मांस का वह पुतला गाँधी ही हो सकते हैं.लकुटिया भी वही टेकते थे. वह भिक्षा भी आज़ादी की ही थी. दो बच्चे नेहरू और जिन्ना थे.आप पूरी कविता को ध्यान से पढ़ें तो यह गांधीवाद का उपहास उड़ाती है.सभी जानते हैं कि गांधी जी की पेट और पीठ में अंतर नहीं था. दोनों एक से प्रतीत होते थे. गांधी जी आज़ादी के मार्ग पर चल रहे थे.वे नरमपंथी थे.शान्तिपरक बातचीत को ही वे बेहतर मानते थे. दरअसल क्रांतिकारी चेतना से लैस कवि निराला का नेहरू से अंतर्विरोध था और गांधी का नेहरू प्रेम जगजाहिर है.अब जरा भिक्षुक कविता का पुनर्पाठ कीजिए तो मित्रों

Monday, 21 November 2011

kitanee seeta

".....उनसे मिलने की  कोई न तमन्ना थी.वह घर बार की जिम्मेदारी छोड़कर  सुरा और सुन्दरी के मोहपाश में उन्मत्त थे. रिश्ता  कई वर्षों से उसे बोझ सा लगने लगा था. आए दिन की खटपट और तनाव भरी जिन्दगी ने सीता को न जाने कितने जन्मों तक अग्निपरीक्षा दिलवाई थी.वह सोच रही थी-पापा जानते थे कि सीता ने राम के कारण वनवास झेला था फिर भी नाम सीता ही रख दिया था. आखिर नाम का फर्क पड़ना ही था. अपने दो बच्चों के साथ वह कहाँ जाती? पति पुराने राजा महाराजाओं कि तरह आई ए एस के ओहदे पर फैजाबाद में डी एम के पद पर तैनात था. बेचारी सीता गाँव में दो बच्चों को पालती पोसती हुई जीवन गुजार रही थी."मित्रों यह लिखी जा रही कहानी  "कितनी सीता" का अंश है.     

Friday, 18 November 2011

shodh ki chunautiyan

पिछले दिनों बी एच यू वाराणसी में "बदलते वक्त में शोध की चुनौतियाँ" विषय पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन हुआ.गोष्ठी में मुख्य अतिथि हिंदी अदब के जाने माने विद्वान् प्रो पुरुषोत्तम अग्रवाल रहे. आलोचक प्रो अग्रवाल ने अपने रोचक व्याख्यान में कहा कि ज्ञान के किसी अनुष्ठान का सीधे सीधे सामाजिक उपयोग हो, यह जरुरी नहीं है. असल में फिलासफी हमारे सामने जीवन के बुनियादी सवाल पैदा करती है लेकिन उत्तरों के लिए हम कविता कि शरण में जाते हैं. साहित्य का कोई तत्काल उपयोग भले ही न दिखे, और वह दिखना भी नहीं चाहिए.साहित्य दुनिया को देखने का एक वैकल्पिक दृष्टि देता है, वह एक प्रकार से समग्र दृष्टि देता है. आज चल रहे सुपर स्पेशलिटी के मुद्दे पर प्रो अग्रवाल ने कहा कि वह ज्ञान के आत्म संघर्ष की सूचना देने वाला है.साहित्य की आकांक्षा सुपर स्पेशलाईजेशन  की नहीं है.टेक्नालोजी के मुद्दे उनका कहना था कि इसके प्रति नकार का भाव हमारे देशज होने का प्रमाण है.तकनीकी का परिवर्तन बिना चाहे भी होगा.गोष्ठी में महत्वपूर्ण प्रश्न उठाते हुए उन्होंने कहा कि एक छात्र अपने काम से अध्यापक को क्यों नहीं संतुष्ट कर पाता है? उन्होंने छात्रों से कहा कि यदि नौकरी के लिए आप को शोध करना है तो आप न करें वही बेहतर है. मुद्दा नौकरी का नहीं है. मुद्दा शोधार्थियों  के लिए यह है कि आप नया क्यों कर सकते हैं? यह महत्वपूर्ण है. "रिसर्च" का कुछ लक्ष्य और कुछ उद्देश्य होना चाहिए.लेकिन वह सिर्फ नया ही न हो. "नया क्यों"; ही महत्वपूर्ण है.आज हम किस बदलते वक्त में जी रहे हैं? यह देखना चाहिए. २० वीं सदी उम्मीद और संवेदनाओं की सदी थी. २१ वीं सदी विशुद्ध पहचानों की सदी बन गई है.वह तात्कालिक चिंताओं की सदी बन गई है. अगले ५० सालों में विश्व व्यवस्था बदल जाएगी. अभी कोई नहीं जानता कि बदलाव बेहतर होने वाला है या बदतर! उन्होंने कहा कि आज यह देखना महत्वपूर्ण है कि हम किस वक्त में मौजूद हैं और क्या चुनौतियाँ है? बड़ी संख्या में मौजूद छात्रों से मुखातिब होते हुए प्रो अग्रवाल ने कहा कि विनम्रता और दृढ़ता के साथ आप सवाल पूछना सीखें. सिर्फ पांव न छूते रहें. या सवाल पूछने में न हिचकें. उन्होंने उपस्थित अध्यापकों से कहा कि शोध में चरण छूने  की संस्कृति को डिस्करेज किया जाना चाहिए. नचिकेता का उदहारण  देते हुए उन्होंने कहा कि नचिकेता ने असुविधाजनक सवाल किए थे. पिता के सामने सवाल  करना सच्ची क्रांतिकारिता है. पिता की सत्ता  सबसे बड़ी होती है.नचिकेता ने सत्ता से सवाल किया था. जरुरत इस बात की है कि सही सवाल पूछे जाएँ. विश्वविद्यालयों में नचिकेता संस्कृति का विकास करने  की ज़रूरत है.दरअसल हम सही सवाल ही नहीं पूछते. रिसर्च की सबसे बड़ी चुनौती है की सही सवाल पूछिए. यमराज से नचिकेता ने सही सवाल पूछे थे.अध्यापकों से उन्होंने कहा कि आप को भी छात्रों को सुनने की जरुरत है. छात्र क्या समस्याएं महसूस करते हैं; उन्हें जानने की जरुरत है. शोध के लिए आप की चेतना में जो चीजें जड़ जमा कर बैठी हैं, उनसे  असहमति जरुरी है. नचिकेता को आदर्श बनाईये और सवाल पूछिए. विचारधारा को अवसरवाद के चलते मत बदलिए.आप जो नया करें उनके पीछे कारकों की पड़ताल करें.उसके लिए तर्क, आधार और सन्दर्भ की भी तलाश करें .तभी उर्जा का सकारात्मक विस्फोट होगा.गोष्ठी की अध्यक्षता प्रो राजमणि शर्मा ने किया  जबकि विशेष वक्ता के रूप में प्रो पृथ्वीश नाग मौजूद रहे. गोष्ठी में देश भर से आये लोगों के अलावा बड़ी संख्या में विभिन्न अनुशासनों के छात्र मौजूद रहे.        

Thursday, 17 November 2011

maya ki nagariya

जब माया की नगरिया लुट जाती है तब आनुभविक जगत आप को सत्य प्रतीत होता है.कौनो नगरिया लूटल हो....जिसे आप प्रत्यक्ष समझते हैं असल  में वह भ्रम है. मनुष्य के शरीर के अवयव क्षिति, जल, पावक, गगन और समीर सत्य हैं किन्तु 
शरीर असत्य.जो नष्ट हो जाए वह सत्य हो ही नहीं सकता. प्रकृति सत्य है लेकिन उसकी भौतिकता असत्य है.जितने भी मनु 
हुए हैं वे सभी  असत्य हैं क्योंकि विभेदपूर्ण सामाजिक संरचना तो आप के मनुओं ने ही दी है.प्रकृति ने तो मनुष्य बनाया है. 
गर्भ में मनुष्य समान है. उसकी पीड़ा समान है.जन्मोपरांत तो विभेद शुरू हो जाता है.इसके बाद तो अनुभूतियाँ ही सत्य होती हैं.
बहुत से बातें आप जानते हैं लेकिन आप उसके बारे में कह नहीं पाते.तो आप जो कह नहीं पाते वही सत्य है.शेष असत्य.  
     

amma ki yaad

आज अम्मा की पुण्य तिथि है. अब उनकी यादें ही बची हैं.उनके तीन पत्र भी मेरे पास सुरक्षित हैं. वे अंग्रेजी पढ़ने पर जोर देती थीं. कहती थीं कि किसी भाषा की बेहतर इस्तेमाल के लिए उसका व्याकरण जानना जरुरी है. हिंदी विषय में एम ए थीं. तुलसी की कविताएँ उन्हें जबानी याद थीं.जायसी पर एम ए में लघु शोध प्रबंध लिखा था.हम लोगों से एक भी शब्द गलत हो जाता तो डांट पड़ती थी. बेहद सख्त थीं वे.  बनारसी बोलती थीं. यदि आप उनसे खड़ी बोलते तो उसका जवाब बनारसी भोजपुरी में ही पाते.घर में कितना ओहदेदार कोई आ जाता उस समय भी वे भोजपुरी में ही बतियातीं. मेहमान के चले जाने के बाद हम भाई बहन उनसे पूछते कि अम्मा किसी के आने पर आप  क्यों खड़ी में नहीं बोलतीं? वे जवाब देतीं बनारसी हमार भाषा हौ. अईसन नाही हौ कि हम खड़ी में नाहीं बोल सकत हई लेकिन आदमी के आपन बोली और भाषा क हमेशा ख़याल रखे के चाही.समझला. वे पढ़ने का बेहद शौक रखती थीं. प्रेमचंद उनके पसंदीदा उपन्यासकार थे.जानते हैं जब वे कैंसर से जूझ रही थीं तब वे दिल का खिलौना हाये टूट गया, कोई लुटेरा आ के लूट गया.....गाना  गुनगुना रही थीं.हम सभी लोग उनके पास ही खड़े थे; उनके सामने तो रो भी नहीं सकते थे.बस यही कहते कि अम्मा ठीक हो जईबू. अम्मा ठीक नहीं हुईं. वे बड़ी धार्मिक थीं.लेकिन मरीं तो चीख चीख कर छटपटाते हुए. शायद ही कोई सप्ताह बचता रहा हो जिसमें वे व्रत न रखती हों.खैर, अब तो उनकी स्मृतियाँ ही शेष हैं.मरना तो सभी को है लेकिन यह भी कोई मरना है क्या मित्रों!     

mera dharm mahan

जो प्रत्यक्ष है उसे माया कहते  हैं.जागतिक चीजें ही विनष्ट होती हैं.जो अप्रत्यक्ष है वह अनुभूति का विषय है और अनुभूतियाँ कभी नष्ट नहीं होतीं! दूसरे यही बात तो इस्लाम धर्म के धार्मिक मतावलंबी कहते हैं कि आदम और हौव्वा की पूरी दुनिया संतान है.हिन्दू कहते हैं कि श्रद्धा और मनु के संतान हैं हम सब! अब देखिए! इसका मतलब  साफ है कि शुरूआती दिनों में अन्तर्जातीय विवाह भी हुए होंगे क्योंकि सगे भाई बहन का आपस में विवाह संभव नहीं था. इसलिए बंधु! इस तरह कि उच्चता की बात करना एक विशेष जातीय और प्रजातीय दृष्टि है.कहीं न कहीं धार्मिक कहानियां गढ़ने वाले लोगों ने गड़बड़ी की है.   

bharat me islam

मोहम्मद साहब ने इस्लाम धर्म का प्रवर्तन किया.मक्का और मदीना पहले इस्लामिक केंद्र थे.यहीं पहली बार मस्जिद बनी और नमाज भी अदा हुई. वह सातवी सदी थी. राम विलास जी आर्यों को भारत का ही मूल निवासी मानते हैं.ढेर सारे तर्क भी गढ़ते हैं किन्तु ऐतिहासिक  तथ्य कभी झूठ नहीं बोलते.फिर शासक के रूप में इस्लाम १० वीं शताब्दी में ही वर्त्तमान भारत में प्रविष्ट हुआ.इस्लाम आक्रान्ता के रूप में भारत में जरूर आया लेकिन जल्द ही उसने भारतीयों के साथ सामंजस्य बैठा लिया.उस समय  खूब हिंसक संघर्ष भी हुए थे.तब धर्म आधारित समाज में विखंडन उत्पन्न हो गया था.परिणाम स्वरुप  धर्म गुरुओं ने हिन्दू मुस्लिम एकता के लिए व्यापक स्तर पर प्रयास किया था. असल में जनता में धर्म गुरुओं की हनक अधिक थी और जनता उनके द्वारा सुझाये हुए मार्ग पर चलना ज्यादा मुनासिब समझती थी.