Friday, 14 October 2011

karava chauth

आज करवा चौथ है.स्त्री पति की दीर्घायु और सौभाग्य के लिए व्रत रखती है.स्त्री विमर्श के झंडाबरदारों की आत्मा को ठेस लगती होगी कि क्यों पत्नियाँ ही पतियों के लिए व्रत रखती हैं?तो रहिये न पत्नियों के लिए व्रत!क्रान्तिकारियों परंपरा को बदल डालिए.मौका अच्छा है आप की भी  जय होगी! पत्नियों अर्थात स्त्रियों के उत्थान के लिए नोबल पुरस्कार भी मिल सकता है! प्लीज़ इसे नारी मुक्ति के लिए दकियानूसी विचार  मत कहिएगा.आखिर आस्था भी तो कोई चीज है!आपसी विश्वास और रिश्तों को मजबूत करता है करवाचौथ और तीज. कोई तो नहीं कहता कि तुम व्रत रहो. लेकिन समर्पण कि पराकाष्ठा और बेहद के प्रेम के प्रकटीकरण का माध्यम हैं व्रत. जजबातों को बयां करते हुए सोलहों श्रिंगार में सजधज कर स्त्रियाँ इसी बहाने करक ऋषि को याद कर लेती हैं.पति भी स्त्रियों के समर्पण पर मुग्ध होता है.वहां स्त्री विमर्श के बहाने  कामुक दुनियां नहीं होती बल्कि  वहां तो कबीर रेख सिन्दूर की.......कीसाज सज्जा होती है.तुलसी का नेहछू-मंगलगान होता है.हिंदी बिरादरी से पूछिएतो  उदाहरण बहुत  मिल जाएंगे.तो आईए पत्नी भक्त  बनें.कम से से कम समर्पण की पराकाष्ठा पर ईनाम तो मिलना ही चाहिए.
    

satta sangharsh ka naya ghamasan

सत्ता संघर्ष के लिए नया घमासान जारी है.बी जे पी की रथ यात्रा जारी है. रथ यात्रा ने बी जे पी को सत्ता के शीर्ष तक पहुँचाया था. अब रथ के घोड़े बूढ़े हो चुके हैं. वे थके थके से नज़र आ रहे हैं.उमा भारती भी अब बहुत विश्वसनीय नहीं रह गई हैं.कल्याण सिंह भी भी बेवफाई पर अमादा हैं. आडवाणी भी तुष्टीकरण की राजनीति को खंगाल चुके हैं.मुलायम सिंह ka  नया विकल्प डॉ अयूब मुसलमानों को मिल चुका है.मायावती भी बुतपरस्त हैं.सामाजिक न्याय ka  ताना बना गड़बड़ा गया है.कांग्रेस यू पी में सत्ता हासिल करने के लिए बेताब है.सत्ता संघर्ष में पौ बारह किसी की नहीं होगी. जय हो!  

Thursday, 13 October 2011

sahity banam vimarsh

साहित्य किसानों,मजदूरों और गरीब गुर्बों के हितों से निकलकर मध्यवर्ग की अभिरुचियों के अनुसार परिवर्तित हो  रहा है. साहित्य में अब प्रेम के नाम पर सेक्स बिक रहा है. यह भी ठीक  है कि साहित्य का एक उद्देश्य मॉल कल्चर में प्रवेश करते हुए;  साहित्य के भी बिग बाज़ार की तलाश करना है.दरअसल बाज़ार की जरूरतों केमुताबिक साहित्य  उत्पादित किया जा रहा है ताकि विमर्शकार विमर्श और बयां जारी  करें.

Wednesday, 12 October 2011

buddh ke prayog

बुद्ध जानते हैं: भ्रष्टाचार सामाजिक बीमारी के रूप में पनप चुका है. इससे मुक्ति के लिए किसी अन्ना की जरुरत नहीं है बल्कि मुल्क के लोगों को खुद सचेत होना होगा.वे यह भी जानते हैं कि गाँधी जी का भरापूरा परिवार था . उन्हें घर काखर्चा चलाना पड़ता था.वे कभी हार मानने वालों में से न थे.अपनेसाथ चलने वालों वालों के बल पर उन्होंने जनांदोलन  खड़ा किया था.वे अथक थे.उनका प्रतिरोध अंग्रेजी साम्राज्यवादी ताकतों के खिलाफ़ था.उस समय का जनसंघर्ष स्वतः उद्भूत था .एक पवित्रता की सियासत मुल्क में हिलकोरें ले रही थी.बन्दूकबल पर अहिंसात्मक चुनौती भारी पड़ गई थी.सत्ता बनाम सियासत में सत्य और अहिसा कि सियासत भरी पड़ गई थी.बुद्ध यह भी जानते हैं कि करुणा का भाव बाद में चलकर हिन्दुओं ने बौद्धों से ही लिया.पूरी दुनिया में धार्मिक वितंडावाद और राजतंत्र के खिलाफ़ न तो बुद्ध जैसा सशक्त स्वर मुखरित होता है और न ही गाँधी जी जैसा सशक्त अभियान  इतिहास  के पृष्ठों में  दर्ज़  है.करुणा, दया ,सत्य एवंअहिंसात्मक रास्ते को शत शत नमन! बुद्ध की कामना है कि इतिहास के पृष्ठों में उपनिवेशवाद,नव उपनिवेशवाद,साम्राज्यवाद और नवसाम्राज्यवाद के खिलाफ़ सशक्त प्रतिरोध अहिंसात्मक ढंग से पनपे. बुद्ध यह भी जानते हैं कि सत्ता बंदूकों और जिद के दबाव से नहीं  बल्कि  अहिंसात्मक  जनांदोलनों के बल पर हासिल कि जाती है.जय हो आदिकालीन एवं पारंपरिक लोकतंत्र की जय हो!  

Tuesday, 11 October 2011

aadikavi valmiki

वाल्मीकि किसी ब्राह्मन कुल में उत्पन्न हुए मनुष्य नहीं थे बल्कि वे सामाजिक स्तरीकरण के सबसे निचले पायदान से आते थेl जंगल में घूमते घूमते किसी ने क्रौच का वध किया हो; संभव है कि घुमंतू जाति के वाल्मीकि ने उक्त दृश्य को देखा हो और उनका परिवर्तित ह्रदय कविता की पराकाष्ठा पर पहुंचकर महामानव, आदिकवि और अद्वितीय कवि के रूप में प्रतिष्ठित हुआ हो l    
     

Monday, 10 October 2011

vimarsh ka ghat

समकलीन हिंदी आलोचना में आलोचना के नाम पर एक दूसरे की छीछालेदर करने की प्रवृत्ति बढ़ी है.पत्र पत्रिकाओं में जिस तरह से आलोचना के नाम पर ईर्ष्या  प्रकट की जा रही है वह वर्तमान हिंदी
की  आलोचना के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है.इस समय पता नहीं कैसे उत्तर आधुनिक विमर्श और दलित विमर्श की  साठ गांठ हो चुकी है.दुई न होई एक संग भुवाला,हँसब ठठाई फुलाउब गाला.लेकिन यह क्या इधर के उत्तर आधुनिक विमर्शकार और दलित विमर्शकार: सिर्फ विमर्शकार ही साहित्यिक आलोचक नहीं; का गठबंधनहो गया है. तो अब साहित्य की दलित राजनीति उत्तर आधुनिक विमर्शकारों की गोद में  रोते हुए लोरी सुन रही है.       

jane chale jate hain kahan

लौटता मैं जब पाठशाला से घर, अपने हाथों से खाना खिलाती थी माँ.....आज न तो अम्मा हैं और न ही इसे गाकर अक्सर रुलाने वाले ग़ज़ल सम्राट जगजीत बाबू.निदिया उन्हें भी सुला गई.अब तो अम्मा के साथ उनकी भी यादें ही स्मृति शेष रह गई हैं.जाने चले जाते हैं कहाँ दुनिया में आने वाले, जाने चले जाते हैं कहाँ.....l     

Sunday, 9 October 2011

raj me lokniti ka abhav

आज के राज में निति का अभाव है. राज की कोई निति नहीं है. प्रतिदिन  दलबदल प्रभावी है. सत्ता संघर्ष के लिए इतना घमासान पहले कभी नहीं दिखलाई पड़ा. पहले राज का धर्म होता था.अब धर्म सत्ता प्राप्ति का माध्यम बन चुका है.राम के नाम पर सरकारें बनाने वाले लोगों का पर्दाफाश हो चुका है. धीरे धीरे जातिविहीन लोकनीति का बोलबाला होगा. विकास की नीति प्रभावी होगी.

buddh ke vachan

आज मुल्क में  जाति और सम्प्रदाय आधारित सच्चाई ही दिखलाई पड़ती है. ऐसे में बुद्ध के सारगर्भित
वचन ही समाज को नई दिशा दे सकते हैं.