सामाजिक भागेदारी-
औरतें अपनी शर्तों पर अपनी सामाजिक भागेदारी तय करें। माफ़ करिएगा मैम! कन्या भ्रूण हत्या में शामिल डाक्टर और नर्स एक महिला ही होती है। खुद के प्रति स्त्री प्रतिबद्धता का मुद्दा भी बेहद अहम् है। Friday, 26 April 2013
Wednesday, 24 April 2013
समान ड्रेस कोड
समान ड्रेस कोड-
भारत के सभी स्कूलों में समान ड्रेस कोड लागू किया जाए। सरकारी स्कूलों के बच्चों के समान ही निजी क्षेत्रों के स्कूली बच्चे एक समान ड्रेस पहनें। देखने में आता है कि स्कूलों में किशोर वय के छात्र और छात्रा ड्रेस तो पहनते हैं लेकिन कोचिंग सेंटर में वही बच्चे फैशन शो की तरह शिरकत करते है। इसलिए कोचिंग केन्द्रों में भी एक किस्म का स्कूली ड्रेस कोड लागू किया जाना निहायत जरुरी है। समान ड्रेस कोड लागू कर सभी वर्गों के विद्यार्थियों को समान अवसर का संवैधानिक अवसर भी प्रदान कर सकते हैं।
भारत के सभी स्कूलों में समान ड्रेस कोड लागू किया जाए। सरकारी स्कूलों के बच्चों के समान ही निजी क्षेत्रों के स्कूली बच्चे एक समान ड्रेस पहनें। देखने में आता है कि स्कूलों में किशोर वय के छात्र और छात्रा ड्रेस तो पहनते हैं लेकिन कोचिंग सेंटर में वही बच्चे फैशन शो की तरह शिरकत करते है। इसलिए कोचिंग केन्द्रों में भी एक किस्म का स्कूली ड्रेस कोड लागू किया जाना निहायत जरुरी है। समान ड्रेस कोड लागू कर सभी वर्गों के विद्यार्थियों को समान अवसर का संवैधानिक अवसर भी प्रदान कर सकते हैं।
Monday, 22 April 2013
ऐसे बदलेगी औरत
बेटी, बहन, माँ और पत्नी के रूपों में औरतों को स्नेह, सम्मान, प्रेम और स्वतन्त्रता समय की मांग है। बी पी एल से नीचे जिन्दगी बसर करने वाली देश की नब्बे प्रतिशत आम जनता हो अथवा छह प्रतिशत निम्न मध्यवर्ग हो याकि दो प्रतिशत की आबादी वाला मध्य मध्य वर्ग और 1.5 प्रतिशत उच्च मध्यवर्गीय जनता हो और 0.5 प्रतिशत उच्च वर्ग के लोग हों, सभी जगह स्त्रियों की समान दशा नहीं है। गाँवों में खुले में शौच के कारण आए दिन हिंसक वारदातें होती रहती हैं। स्कूलों अथवा देश के विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रम देश के भविष्य को भाग्यवादी बना रही है। नन्हीं परी और गुड़िया मेरी प्यारी गुड़िया जैसे पाठों को समाप्त कर झांसी की रानी जैसे पाठों को प्रत्येक कक्षाओं के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए। प्रारंभिक कक्षाओं से ही लड़कियों को जूडो और कराटे सिखलाकर आत्म रक्षा के गुर सिखलाए जाएं। स्कूलों और कालेजों में शिक्षकों की आधी संख्या महिलाओं की हो। देश के पुलिस थानों में महिला पुलिस की तैनाती भी जरुरी है। इसके अलावा जरुरी है कि देश की केंद्र अथवा राज्य सरकारों में मंत्रियों की आधी संख्या महिलाओं की हो। संघ लोक सेवा आयोग और राज्य लोक सेवा आयोग से चयनित होने वाले अफसरों में आधी संख्या महिलाओं की होनी चहिए। सवाल सत्ता में महिलाओं की हिस्सेदारी का है। सत्ता प्रतिष्ठानों में महिलाओं की भागेदारी से महिलाओं की प्रस्थिति में सुधार आ सकता है। दुःख तब होता है जब जिले की महिला पुलिस कप्तान को सर कहकर संबोधित किया जाता है! क्या मैम के रूप में संबोधित होकर वह अफसरी नहीं कर सकती हैं। औरतों के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण को परिवर्तित किए जाने की सर्वाधिक जरुरत है।
Sunday, 21 April 2013
मानवाधिकार कार्यकर्ता
मानवाधिकार कार्यकर्ता-
मानवाधिकार कार्यकर्ता भले ही कुछ कहें लेकिन हकीकत यह है पुलिस अक्सर सही कार्य करती है। कहीं न कहीं आदमी की आपराधिक संलिप्तता होती है तभी पुलिस उठाती है। सेना भी यही कार्य करती है। अभी एक महानगर में जाति और धर्म विशेष की एक आपराधिक बस्ती बसने वाली है जिसके इंजीनियर को निर्देशित किया गया है कि कालोनी के लिए महज 10 फुट का रास्ता ही दें ताकि पुलिस की जीप रास्ते में जाकर वापस न आ सके। पुलिस और सेना के अफसरों और कर्मचारियों की शहादत पर मानवाधिकार कार्यकर्ता क्यों चुप्पी साध लेते हैं। तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्ता पुलिस और सेना का ऐसा चरित्र प्रस्तुत करते हैं मानो पुलिस अपराधी हो और अपराधी महमना। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को पुलिस सुधार की वकालत करनी चाहिए। इसके साथ ही दूधियों के आतंक पर भी विचार विमर्श जरुरी है। खाद्यान्न में मिलावट पर भी पुलिस की बजाय लाला जी को कोसना चाहिये।
मानवाधिकार कार्यकर्ता भले ही कुछ कहें लेकिन हकीकत यह है पुलिस अक्सर सही कार्य करती है। कहीं न कहीं आदमी की आपराधिक संलिप्तता होती है तभी पुलिस उठाती है। सेना भी यही कार्य करती है। अभी एक महानगर में जाति और धर्म विशेष की एक आपराधिक बस्ती बसने वाली है जिसके इंजीनियर को निर्देशित किया गया है कि कालोनी के लिए महज 10 फुट का रास्ता ही दें ताकि पुलिस की जीप रास्ते में जाकर वापस न आ सके। पुलिस और सेना के अफसरों और कर्मचारियों की शहादत पर मानवाधिकार कार्यकर्ता क्यों चुप्पी साध लेते हैं। तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्ता पुलिस और सेना का ऐसा चरित्र प्रस्तुत करते हैं मानो पुलिस अपराधी हो और अपराधी महमना। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को पुलिस सुधार की वकालत करनी चाहिए। इसके साथ ही दूधियों के आतंक पर भी विचार विमर्श जरुरी है। खाद्यान्न में मिलावट पर भी पुलिस की बजाय लाला जी को कोसना चाहिये।
Saturday, 20 April 2013
पुलिस को सियासत ने नपुंसक बना डाला है
पुलिस को सियासत ने नपुंसक बना डाला है-
पुलिस का फंडा हनक पर काम करता है। इस देश की सिविल पुलिस को सियासत ने नपुंसक बना डाला है। स्वतंत्र ढंग से कार्य करने हेतु जिलों के पुलिस कप्तानों की नियुक्ति राष्ट्रीय स्तर पर सुनिश्चित की जानी चाहिए। आई पी एस संवर्ग को राज्यों के दबाव से मुक्त किया जाना भी निहायत जरुरी है। बलात्कारियों को सरेआम चौराहों पर कोड़े लगवाकर फांसी दिलवाए जाने का संवैधानिक प्रावधान सुनिश्चित होना चाहिए। यदि किसी ने बलात्कारियों के मानवाधिकार की बात की तो उसे भी जूते मरवाए जाने का संवैधानिक प्रावधान किया जाना भी जरुरी है। और अंत में देश की जनता से एक आह्वान- "तख़्त बदल दो ताज बदल दो, क्लीवों का अभिशाप बदल दो।"।
पुलिस का फंडा हनक पर काम करता है। इस देश की सिविल पुलिस को सियासत ने नपुंसक बना डाला है। स्वतंत्र ढंग से कार्य करने हेतु जिलों के पुलिस कप्तानों की नियुक्ति राष्ट्रीय स्तर पर सुनिश्चित की जानी चाहिए। आई पी एस संवर्ग को राज्यों के दबाव से मुक्त किया जाना भी निहायत जरुरी है। बलात्कारियों को सरेआम चौराहों पर कोड़े लगवाकर फांसी दिलवाए जाने का संवैधानिक प्रावधान सुनिश्चित होना चाहिए। यदि किसी ने बलात्कारियों के मानवाधिकार की बात की तो उसे भी जूते मरवाए जाने का संवैधानिक प्रावधान किया जाना भी जरुरी है। और अंत में देश की जनता से एक आह्वान- "तख़्त बदल दो ताज बदल दो, क्लीवों का अभिशाप बदल दो।"।
Friday, 19 April 2013
अक्षरों की सत्ता सार्वकालिक है
अक्षरों की सत्ता सार्वकालिक है-
अक्षर अर्थात जिसका क्षरण न हो सके। जिस तरह अक्षरों की सत्ता सार्वकालिक है ठीक उसी तरह ईश्वरीय सत्ता भी है। अनगिनत रूपों में ईश्वरीय चेतना सार्वकालिक है। रही बात "नास्ति" की तो यह शब्द भी अक्षरों का सार्थक समूह ही है। "नास्ति" का अनुगामी ही नास्तिक है। जब कुछ है ही नहीं तब फिर किसका अनुयायी! असल में सत्ता तो शब्द की ही होती है। जिसकी सत्ता होगी वह निराकार तो होगा नहीं, यहीं से एक नए विमर्श की सम्भावना भी बनती है। अक्षरों की सत्ता सार्वकालिक है
अक्षरों की सत्ता सार्वकालिक है-
अक्षर अर्थात जिसका क्षरण न हो सके। जिस तरह अक्षरों की सत्ता सार्वकालिक है ठीक उसी तरह ईश्वरीय सत्ता भी है। अनगिनत रूपों में वे सार्वकालिक और सर्वव्यापी हैं। रही बात नास्तिक की तो यह शब्द भी अक्षरों का सार्थक समूह ही है। असल में सत्ता तो शब्द की ही होती है। जिसकी सत्ता होगी वह निराकार तो होगा नहीं, यहाँ से एक नए विमर्श की सम्भावना भी बनती है। Tuesday, 16 April 2013
Thursday, 4 April 2013
नशे का लोकतंत्र
धड़कते हुए दिल को थामते हुए होशियार सिंह ने परिजनों से कहा कि अबकी बार फिर हमारी जीत पक्की है। उधर हरिजन बस्ती में आज़ादी के 6 5 साल बाद होने वाले ग्राम प्रधानी के इलेक्शन में चरन दास जिंदाबाद का नारा सुनाई पड़ रहा था। यादव टोली के यादव टिर्रा यादव को ग्राम प्रधान बनाना चाहते थे। जैसे ही सुबह 7 बजे से पोलिंग शुरू हुई, दो घंटे बाद दलित बस्ती में दारू की बोतल और एक हजारा नोट बंटने लगा। सब तितर बितर, होशियार सिंह फिर ग्राम प्रधान बने।
Wednesday, 3 April 2013
पिछड़ी जातियों में वर्चस्व की राजनीति
देश की राजनीति में पिछड़ी जातियों में वर्चस्व की राजनीति चल रही है। बेनी प्रसाद कुर्मी उप बिरादरी के नेता
के रूप में अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं जबकि मुलायम सिंह यादव का पिछड़ी राजनीति पर वर्चस्व स्थापित है। उत्तर प्रदेश में पिछड़ों की संगठित शक्ति को कांग्रेस बिखेरने का प्रयास कर रही है। पदोन्नति में आरक्षण के मुद्दे पर विरोध का स्वर मुलायम ने बुलंद किया था तब बेनी प्रसाद कहाँ थे! बिहार के नितीश बाबू भी चुप थे!
के रूप में अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं जबकि मुलायम सिंह यादव का पिछड़ी राजनीति पर वर्चस्व स्थापित है। उत्तर प्रदेश में पिछड़ों की संगठित शक्ति को कांग्रेस बिखेरने का प्रयास कर रही है। पदोन्नति में आरक्षण के मुद्दे पर विरोध का स्वर मुलायम ने बुलंद किया था तब बेनी प्रसाद कहाँ थे! बिहार के नितीश बाबू भी चुप थे!
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