भारत के अधिकाँश चिकित्सक जन सेवा की बजाय रूपया बनाने में मस्त हैं। सेवा कौन करना चाहता है बंधु ! जो काम दो रुपये की दवा से हो सकता है उसके लिए मरीज को कई दिनों तक दवा खिलाना और दवा कंपनियों के हाथों बिक जाना, मरीज को मानसिक रूप से भयभीत करना भी चिकित्सकों की आदत में शुमार है। इन दिनों भीषण ठण्ड की वजह से गरीबों की दवा के अभाव में ताबड़तोड़ मौतों का सिलसिला जारी है। कितनों के निजी चिकित्सालय में निर्धन व्यक्तियों का सेवा सुश्रूषा हो रही है।
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