Sunday, 5 January 2014

ऐसे तो विनाश हो जाएगा

लोकतंत्र  संरक्षित रखने के लिए जो भी व्यक्ति कार्यपालिका और न्यायपालिका का एक भी दिन अंग रह चुका हो उसे किसी भी कीमत पर व्यवस्थापिका का अंग बनने को अनिवार्य रूप से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। दरअसल व्यक्ति की मनोवृत्ति नौकरशाह अथवा न्यायिक की हो जाने के बाद तानाशाही प्रवृत्ति वाली हो जाती है। छात्र जीवन में ही करियर तय करने वाले लोग ही तीसरे अंग व्यवस्थापिका का अंग बनें। एक दूसरे के गड्ड मड्ड से लोकतंत्र का चेहरा विकृत होता है।  आप देखिये देश में उच्च नौकरशाह की बीबियाँ और सेवानिवृत्त जज चुनाव लड़ रहे हैं।

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