Sunday, 19 January 2014


जायसी को पढ़ते हुए -
"बरसै मघा झकोरि झकोरी । मोर दुइ नैन चुवैं जस ओरी॥
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नैन चुवहिं जस महवट नीरू । तोहि बिनु अंग लाग सर चीरू॥"
मघा नक्षत्र में हवा बहुत तेज चलती है( मुख्यतः फैजाबाद, गोंडा,सुल्तानपुर, प्रतापगढ़ और जौनपुर विशेष रूप से अवध प्रान्त की जलवायु से प्रभावित क्षेत्र हैं। ) जायसी सुल्तानपुर के तत्कालीन जायस गाँव और वर्त्तमान में जायस स्टेशन के रहने वाले थे। जायस अवध प्रांत का मध्यवर्ती क्षेत्र है। जायसी का यह वर्णन मर्मस्पर्शी है। मघा नक्षत्र की वर्षा भयंकर रूप से झकझोर देने वाली होती है। लेकिन उसमें शीतलता कम होती है। परन्तु माघ महीना (शिशिर ऋतु ) में भी इस क्षेत्र में बारिश होती है। यह वर्षा बहुत दुखद होती है। इसका पानी इस क्षेत्र में रहने वाले लोगों के लिए ठंडी के कारण बाण के समान बेधक( मारक ) लगता है। कपड़े भी पहले पहनने पर प्रायः ठन्डे लगते हैं। यहाँ तक कि इस ऋतु में बिस्तर पर जाते समय जो कपड़े ओढ़ने होते हैं , वे भी शुरुआत में पहले ठन्डे लगते हैं। यह बात दूसरी है कि थोड़ी देर में शरीर की गर्मी से वे गर्म होकर सुखद हो जाते हैं। शिशिर ऋतु माघ से प्रारम्भ होकर फाल्गुन तक रहता है। इसमें जो पानी बरसता है, उसे महवट, महावट या मघवट कहते हैं। भाषा विज्ञान में ऐसा परिवर्तन उच्चारण भेद से सम्भव है। इन्हीं महीनों में माघ का अंतिम छः दिन और फाल्गुन का प्रारम्भिक छः दिन अर्थात इन बारह दिनों को यहाँ के निवासी चमर बरहा (चमन बाराह ) कहते हैं। इन बारह दिनों में पानी तो यहाँ प्रायः बरसता ही है। यह पानी बाण के समान बेधक लगता है। जायसी ने मघा नक्षत्र के पानी को झकझोर देने वाला तो कहा ही किन्तु उनका मन रानी नागमती की दुर्बल काया को देखकर संतुष्ट नहीं हुआ इसलिए उन्होंने मघा नक्षत्र के बारिश की तुलना महवट के नीर से की है । अब इसमें मघा नक्षत्र की वर्षा का झकझोरत्व और नागमती के नाजुक बदन के लिए मघा की वह बारिश भी उतनी ही भयंकर प्रतीत हो रही थी जितनी कि महवट की बारिश । यहाँ मघा नक्षत्र की वर्षा उपमेय है और महवट की बारिश उपमान है।  

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