Sunday, 26 January 2014

लोकतंत्र, अधिकारों का ही नहीं राष्ट्र के नागरिकों को कर्त्तव्यबोध का पाठ भी पढ़ाता है। "हमारी मांगे पूरी हों चाहे जो मजबूरी हो", मजबूरी को सरकारी ही नहीं निजी क्षेत्रों में कामगार तबके को समझना चाहिए।  कई बार सोचता हूँ- क्या मजदूर आन्दोलनों और हड़तालों ने देश के विकास की गति को अवरुद्ध नहीं किया है।   संसाधन होगा तभी मजबूती आएगी।  "हाँ देश के नागरिकों में संसाधनों का समान वितरण अहम् मसला है। "" दुनिया भर के इतिहास बोध यही संकेत करते हैं कि आंदोलन और हड़ताल महज स्वार्थी नेता और शासक पैदा करते हैं जो कालांतर में खुद शोषक बन जाते हैं।  होंगे इक्का दुक्का अपवाद। मजदूर आन्दोलनों का दूरगामी दुष्परिणाम यह हुआ कि अब आम परिवार और समाज से निकलकर लोकतांत्रिक नेतृत्व ख़ास परिवारों और समाज की रखैल बन बैठी। क्यों, क्या ख़याल है दोस्तों! 

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