Sunday, 26 January 2014

लोकतंत्र, अधिकारों का ही नहीं राष्ट्र के नागरिकों को कर्त्तव्यबोध का पाठ भी पढ़ाता है। "हमारी मांगे पूरी हों चाहे जो मजबूरी हो", मजबूरी को सरकारी ही नहीं निजी क्षेत्रों में कामगार तबके को समझना चाहिए।  कई बार सोचता हूँ- क्या मजदूर आन्दोलनों और हड़तालों ने देश के विकास की गति को अवरुद्ध नहीं किया है।   संसाधन होगा तभी मजबूती आएगी।  "हाँ देश के नागरिकों में संसाधनों का समान वितरण अहम् मसला है। "" दुनिया भर के इतिहास बोध यही संकेत करते हैं कि आंदोलन और हड़ताल महज स्वार्थी नेता और शासक पैदा करते हैं जो कालांतर में खुद शोषक बन जाते हैं।  होंगे इक्का दुक्का अपवाद। मजदूर आन्दोलनों का दूरगामी दुष्परिणाम यह हुआ कि अब आम परिवार और समाज से निकलकर लोकतांत्रिक नेतृत्व ख़ास परिवारों और समाज की रखैल बन बैठी। क्यों, क्या ख़याल है दोस्तों! 

Sunday, 19 January 2014


जायसी को पढ़ते हुए -
"बरसै मघा झकोरि झकोरी । मोर दुइ नैन चुवैं जस ओरी॥
***
नैन चुवहिं जस महवट नीरू । तोहि बिनु अंग लाग सर चीरू॥"
मघा नक्षत्र में हवा बहुत तेज चलती है( मुख्यतः फैजाबाद, गोंडा,सुल्तानपुर, प्रतापगढ़ और जौनपुर विशेष रूप से अवध प्रान्त की जलवायु से प्रभावित क्षेत्र हैं। ) जायसी सुल्तानपुर के तत्कालीन जायस गाँव और वर्त्तमान में जायस स्टेशन के रहने वाले थे। जायस अवध प्रांत का मध्यवर्ती क्षेत्र है। जायसी का यह वर्णन मर्मस्पर्शी है। मघा नक्षत्र की वर्षा भयंकर रूप से झकझोर देने वाली होती है। लेकिन उसमें शीतलता कम होती है। परन्तु माघ महीना (शिशिर ऋतु ) में भी इस क्षेत्र में बारिश होती है। यह वर्षा बहुत दुखद होती है। इसका पानी इस क्षेत्र में रहने वाले लोगों के लिए ठंडी के कारण बाण के समान बेधक( मारक ) लगता है। कपड़े भी पहले पहनने पर प्रायः ठन्डे लगते हैं। यहाँ तक कि इस ऋतु में बिस्तर पर जाते समय जो कपड़े ओढ़ने होते हैं , वे भी शुरुआत में पहले ठन्डे लगते हैं। यह बात दूसरी है कि थोड़ी देर में शरीर की गर्मी से वे गर्म होकर सुखद हो जाते हैं। शिशिर ऋतु माघ से प्रारम्भ होकर फाल्गुन तक रहता है। इसमें जो पानी बरसता है, उसे महवट, महावट या मघवट कहते हैं। भाषा विज्ञान में ऐसा परिवर्तन उच्चारण भेद से सम्भव है। इन्हीं महीनों में माघ का अंतिम छः दिन और फाल्गुन का प्रारम्भिक छः दिन अर्थात इन बारह दिनों को यहाँ के निवासी चमर बरहा (चमन बाराह ) कहते हैं। इन बारह दिनों में पानी तो यहाँ प्रायः बरसता ही है। यह पानी बाण के समान बेधक लगता है। जायसी ने मघा नक्षत्र के पानी को झकझोर देने वाला तो कहा ही किन्तु उनका मन रानी नागमती की दुर्बल काया को देखकर संतुष्ट नहीं हुआ इसलिए उन्होंने मघा नक्षत्र के बारिश की तुलना महवट के नीर से की है । अब इसमें मघा नक्षत्र की वर्षा का झकझोरत्व और नागमती के नाजुक बदन के लिए मघा की वह बारिश भी उतनी ही भयंकर प्रतीत हो रही थी जितनी कि महवट की बारिश । यहाँ मघा नक्षत्र की वर्षा उपमेय है और महवट की बारिश उपमान है।  

Saturday, 18 January 2014


जायसी को पढ़ते हुए -
"बरसै मघा झकोरि झकोरी । मोर दुइ नैन चुवैं जस ओरी॥
***
नैन चुवहिं जस महवट नीरू । तोहि बिनु अंग लाग सर चीरू॥"
मघा नक्षत्र में हवा बहुत तेज चलती है( मुख्यतः फैजाबाद, गोंडा,सुल्तानपुर, प्रतापगढ़ और जौनपुर विशेष रूप से अवध प्रान्त की जलवायु से प्रभावित क्षेत्र हैं। ) जायसी सुल्तानपुर के तत्कालीन जायस गाँव और वर्त्तमान में जायस स्टेशन के रहने वाले थे।  जायस अवध प्रांत का मध्यवर्ती क्षेत्र है।  जायसी का यह वर्णन मर्मस्पर्शी है।  मघा नक्षत्र की वर्षा भयंकर रूप से  झकझोर देने वाली होती है।  लेकिन उसमें शीतलता कम होती है। परन्तु माघ महीना (शिशिर ऋतु ) में भी इस क्षेत्र में बारिश होती है।  यह वर्षा बहुत दुखद होती है।  इसका पानी इस क्षेत्र में रहने वाले लोगों के लिए ठंडी के कारण बाण के समान बेधक( मारक ) लगता है। कपड़े भी पहले पहनने पर प्रायः ठन्डे लगते हैं।  यहाँ तक कि इस ऋतु में बिस्तर पर जाते समय जो कपड़े ओढ़ने होते हैं , वे भी शुरुआत में पहले ठन्डे लगते हैं।  यह बात दूसरी है कि थोड़ी देर में शरीर की गर्मी से वे गर्म होकर सुखद हो जाते हैं। शिशिर ऋतु माघ से प्रारम्भ होकर फाल्गुन तक रहता है। इसमें जो पानी बरसता है, उसे महवट, महावट या मघवट कहते हैं।  भाषा विज्ञान में ऐसा परिवर्तन उच्चारण भेद से सम्भव है।  इन्हीं महीनों में माघ का अंतिम छः दिन और फाल्गुन का प्रारम्भिक छः दिन अर्थात इन बारह दिनों को यहाँ के निवासी चमर बरहा  (चमन बाराह ) कहते हैं।  इन बारह दिनों में पानी तो यहाँ प्रायः बरसता ही है।  यह पानी बाण के समान बेधक लगता है। जायसी ने मघा नक्षत्र के पानी को झकझोर देने वाला तो कहा ही किन्तु उनका मन रानी नागमती की दुर्बल काया  को देखकर संतुष्ट नहीं हुआ इसलिए उन्होंने मघा नक्षत्र के बारिश की तुलना महवट के नीर से की है ।  अब इसमें मघा नक्षत्र की वर्षा का झकझोरत्व और नागमती के  नाजुक बदन के लिए मघा की वह बारिश  भी उतनी ही भयंकर प्रतीत हो रही  थी  जितनी कि महवट का बारिश । यहाँ मघा नक्षत्र की वर्षा उपमेय है और महवट की बारिश उपम
लोकतंत्र में सिर गिना जाता है। गाँवों के अधिकाँश सिरों के बटन दारू के  बल पर दबते हैं। होंगे इक्का दुक्का उर्वर मष्तिष्क के लोग, जिन्हें बिकने का खामियाजा पता होगा। प्रधानी के चुनाव में प्रति वोट रेट 500 रूपये है। यह दर विधान सभा चुनावों में 250 रूपये प्रति बटन हो जाती है। लोकसभा चुनाव में 100 रूपये में ही काम चलेगा। जितना बड़ा चुनाव उतना कम प्रति व्यक्ति रेट।  यह है असली लोकतंत्र।    

Tuesday, 14 January 2014

इस बात के लिए भी जनमतसंग्रह होना चाहिए कि इस मुल्क के कितने नेताओं को चुनाव के बाद जनता के  साथ वादाखिलाफी करने पर फांसी की  सजा  मिलनी चाहिए! 

Monday, 13 January 2014

नेताओं की नजर में इन दिनों जनता  किसी भगवान से कम नहीं, काम निकलने के बाद लोग भगवान को भी ठेंगा दिखा देते हैं.…… 

Wednesday, 8 January 2014

गरीब दवा के अभाव में मर रहा है -

 भारत के अधिकाँश चिकित्सक जन सेवा की बजाय रूपया बनाने में मस्त हैं। सेवा कौन करना चाहता है बंधु ! जो काम दो रुपये की दवा से हो सकता है उसके लिए मरीज को कई दिनों तक दवा खिलाना और दवा कंपनियों के हाथों बिक जाना, मरीज को मानसिक रूप से भयभीत करना भी चिकित्सकों की आदत में शुमार है।  इन दिनों भीषण ठण्ड की वजह से गरीबों की दवा के अभाव में ताबड़तोड़ मौतों का सिलसिला जारी है। कितनों के निजी चिकित्सालय में निर्धन व्यक्तियों का सेवा सुश्रूषा हो रही है।

Monday, 6 January 2014

सवाल औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति का है- 2

भारतीय समाज में "न्यूनाधिक" अधिकारियों और अपराधियों के सियासत का मात्र एक ही लक्ष्य है! राजनीति में लोकसभा और विधान सभा चुनाव लड़ने का मौक़ा उन्हीं लोगों को मिलना चाहिए जिन्होंने  जीवन में एक बार भी छात्र संघ का चुनाव लड़ा हो और बिना आपराधिक वारदात के छात्रसंघ का कार्यकाल पूरा किया हो। विश्वविद्यालय अथवा महाविद्यालयों के छात्रसंघ राजनीति की पाठशाला होते हैं।  कहने का आशय यह है कि अब  नेतागिरी को भी एक शालीन कैरियर के रूप में तराशा जाना चाहिए। इसमें भी उच्च शिक्षा से जुड़े हुए प्रोफ़ेसर ही योगदान दे सकते हैं।  

Sunday, 5 January 2014

ऐसे तो विनाश हो जाएगा

लोकतंत्र  संरक्षित रखने के लिए जो भी व्यक्ति कार्यपालिका और न्यायपालिका का एक भी दिन अंग रह चुका हो उसे किसी भी कीमत पर व्यवस्थापिका का अंग बनने को अनिवार्य रूप से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। दरअसल व्यक्ति की मनोवृत्ति नौकरशाह अथवा न्यायिक की हो जाने के बाद तानाशाही प्रवृत्ति वाली हो जाती है। छात्र जीवन में ही करियर तय करने वाले लोग ही तीसरे अंग व्यवस्थापिका का अंग बनें। एक दूसरे के गड्ड मड्ड से लोकतंत्र का चेहरा विकृत होता है।  आप देखिये देश में उच्च नौकरशाह की बीबियाँ और सेवानिवृत्त जज चुनाव लड़ रहे हैं।

Thursday, 2 January 2014

प्रत्येक युग का इतिहास काल संक्रमण होता है।  काल संक्रमण किसी भी नई सम्भावना का प्रस्थान बिंदु भी होता है।  सोचिए कितने प्रस्थान बिंदु सकारात्मक हुए हैं? 



मुस्लिम से हिंदू बने परिवार को दिया राठी गोत्र लाखनमाजरा.वर्षो से लाखनमाजरा में रह रहे एक मुस्लिम परिवार ने मंदिर में हवन-यज्ञ किया और हिंदू धर्म अपना लिया। ग्रामीणों ने परिवार को जाट समुदाय का राठी गोत्र दिया है। गांव निवासी राजबीर सिंह का परिवार वर्षो से गांव में रह रहा है। उसका कहना है कि उसके दादा गफूर ने उन्हें बताया था कि पहले वे भी हिंदू धर्म मानते थे, लेकिन औरंगजेब के अत्याचारों से तंग होकर उनके पूर्वजों ने मुस्लिम धर्म ग्रहण किया था। बाद में कई बार मन में टीस उठी कि दोबारा से हिंदू धर्म ग्रहण कर लें। यहां तक कि उसने अपने बच्चों की शादी भी हिंदू समुदाय में की हैं, लेकिन विधिवत तौर पर हिंदू धर्म ग्रहण नहीं किया था। उसके बच्चों की शादी में गंगोली के जाटों ने भात भरा था। उसने ग्रामीणों को कई बार हिंदू धर्म अपनाने के लिए अपने मन की बात रखी। ग्रामीणों ने भी उसकी भावनाओं को समझा। इसके लिए श्रीराम मंदिर में उसको पगड़ी बांधकर हिन्दू धर्म में शामिल कर लिया। मंदिर के पुजारी भान शर्मा ने वैदिक रीति रिवाज के साथ पूरे परिवार को हिंदू धर्म ग्रहण करवाया। इस मौके पर गांव निवासी पंडित राजेंद्र, सत्यवान, बल्लू शर्मा, बलवान नंबरदार, रामफल, सुरेश कुमार, दयानंद, बारू, बसाऊ राम, बाजेराज सहित दर्जनों ग्रामीण भी मौजूद थे। पुजारी भान शर्मा ने कहा कि राजबीर सिंह के परिवार को ग्रामीणों की सहमति से जाट समुदाय का राठी गोत्र दिया गया है।
मेरा इसे पोस्ट करने का मकसद ये बिलकुल नहीं था की इस्लाम के लोग हिंदू धर्म अपना रहे है इसके लिए में ३००० लोगो के इस्लाम से हिंदू धर्म बाले पोस्ट कर सकता था ..लेकिन ये पोस्ट कुछ खास है इसमें बताया गया है की कैसे उसके पूर्वज मुस्लमान बने अत्याचारों के कारन ..और बो खुद हिंदू बनना चाहता था लेकिन बन नहीं पा रहा था कैसे उसने फले अपनी संतानों का विवाह हिन्दुओ में किया और फिर खुद हिंदू बना ....ये बात है .... खास ... क्युकी आज भी लाखो मुस्लमान जिनके पूर्वजो को जबरदस्ती मुस्लमान बनाया गया था बो हिंदू धर्म में आना चाहते है लेकिन डर के कारन (कुरम के अनुसार इस्लाम को छोड़ने बलों को क़त्ल कर दो ) इस्लाम छोड़ नहीं प् रहे है मेरे खुद के कुछ मित्र है जो मेरे को बोलते है की इस्लाम बहुत खराब है ..लेकिन बो मजबूर है ...लेकिन कब तक ... बो बंधे रहेगे एक न एक दिन बो खुद इस्लाम को छोड़ कर डर को लात मर कर हिंदू धर्म में आ जायेगे ...ये तो बस शुरुआत है ..... 
Source: भास्कर न्यूज |