भावनाओं और आस्था की सियासत बंद हो-
पिछले बीस वर्षों में सूबे का किसान तबाही के दौर में है। गन्ना किसानों की स्थिति नाजुक है। चीनी मिलें बंद हैं. गोरखपुर का खाद कारखाना आज तक बंद है। विकास के नाम पर कमीशनखोरी वाली सड़कें बनी हैं। क्या विकास हुआ है ? ज़रा सोचकर बताएं आप! असल में सरकारें जब विकास नहीं कर पातीं तब वे कभी गोवध और कभी आरक्षण जैसे मुद्दों पर राग अलाप कर जनता का ध्यान भंग कर वोट बैंक की सियासत करती हैं। दाल 180 रूपये किलो! खाद्य पदार्थों की कीमत इतनी कि दिहाड़ी मजदूर के लिए स्वप्न नुमा। बसपा के लिए दलित, सपा के लिए यादव और मुसलमान और बी जे पी के लिए हिन्दू। हिन्दू वाली राजनीति अब गाय माता पर आ टिकी है। गो माता में हमारी आस्था है। आस्था का सियासी करण और भावनाओं की राजनीति द्वारा जनहित का अंत सियासी दलों की साजिश है। Buddha Uvach
Friday, 16 October 2015
Thursday, 15 October 2015
विनय कांत मिश्र। साथियों! आरक्षण पर सियासत समाप्त की जानी चाहिए। आरक्षण पर बात करने का मतलब सियासत के चकमे में आ जाना है. जिस प्रदेश में सरकारों ने पिछले बीस वर्षों में आम जनहित का कोई कार्य नहीं किया गया. जातिवाद, धर्मवाद और साम्प्रदायिकता एवं उन्माद के द्वारा वोटों के ध्रुवीकरण की राजनीति की गयी। उत्तर प्रदेश का युवा बेरोजगार है। प्रौढ़ सरकारी सहायता के लिए दफ्तरों की चकरघिन्नी घिसने को अभिशप्त है। प्रदेश के समस्त चयन बोर्डों के अध्यक्षों को उच्च न्यायालय ने अयोग्य घोषित कर दिया है। अयोग्य व्यक्तियों द्वारा योग्य व्यक्तियों का चयन कैसे हो सकता है ? सवाल इन चयन बोर्डों के कार्यकाल में नियुक्त अभ्यर्थियों को हटाने का भी है। क्या गारंटी है कि रिश्वत लेकर चयन नहीं किया गया होगा! सवाल अनिल यादव के कार्यकाल के दौरान इनके द्वारा अर्जित की गई धनराशि को सार्वजनिक किये जाने का भी है। एक ऐसे व्यक्ति के हवाले प्रदेश के प्रतियोगी अभ्यर्थियों को कर देना, क्या किसी अपराध से कम है! चयन का ही सियासीकरण और जातिकरण पहली बार देखने को मिला! सवाल इन वास्तविक मुद्दों की तरफ देखने का है ! आरक्षण पर बात करना महज सियासी चोंचले बाजी है।
Friday, 9 October 2015
Friday, 17 July 2015
Monday, 6 July 2015
जे एन यू में क्षरण का दौर -
जे एन यू के भारतीय भाषा केंद्र को एक बार फिर प्रोफ़ेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल जी की जरुरत है। वे छात्रों को गढ़ते हैं। इसके साथ ही डॉ आशुतोष कुमार को भी जे एन यू में ही होना चाहिए। बहुत अच्छे शिक्षक के साथ वे एक अच्छे इंसान भी हैं। एक बात यह कि जो जे एन यू अपने शिक्षकों और छात्रों की वजह से जाना जाता था, आज इसके कई शिक्षक जे एन यू के ब्रांड लेबिल की वजह से जाने जाते हैं। मिली जानकारी के मुताबिक़ सी आई एल के हिन्दी विभाग की सेहत अब दुरुस्त नहीं है। अब न तो नामवर जी हैं , प्रो मैनेजर पाण्डेय हैं, न पुरुषोत्तम अग्रवाल जी हैं और न ही प्रो वीर भारत तलवार जी ही हैं। केदार जी अब क्लास नहीं लेते। गौरतलब है कि उक्त शिक्षकों के मेहनत की वजह से सी आई एल ने पूरे देश में अपनी धाक जमाई। तब डॉ राम विलास शर्मा जी को एक लेख के जवाब में पूरी किताब लिखना पड़ता था और आज ! तब यहां के प्रतिभाशाली शिक्षकों और छात्रों से देश के अन्य विश्वविद्यालयों के शिक्षक भी ईर्ष्या करते थे। अब! ..........
जे एन यू के भारतीय भाषा केंद्र को एक बार फिर प्रोफ़ेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल जी की जरुरत है। वे छात्रों को गढ़ते हैं। इसके साथ ही डॉ आशुतोष कुमार को भी जे एन यू में ही होना चाहिए। बहुत अच्छे शिक्षक के साथ वे एक अच्छे इंसान भी हैं। एक बात यह कि जो जे एन यू अपने शिक्षकों और छात्रों की वजह से जाना जाता था, आज इसके कई शिक्षक जे एन यू के ब्रांड लेबिल की वजह से जाने जाते हैं। मिली जानकारी के मुताबिक़ सी आई एल के हिन्दी विभाग की सेहत अब दुरुस्त नहीं है। अब न तो नामवर जी हैं , प्रो मैनेजर पाण्डेय हैं, न पुरुषोत्तम अग्रवाल जी हैं और न ही प्रो वीर भारत तलवार जी ही हैं। केदार जी अब क्लास नहीं लेते। गौरतलब है कि उक्त शिक्षकों के मेहनत की वजह से सी आई एल ने पूरे देश में अपनी धाक जमाई। तब डॉ राम विलास शर्मा जी को एक लेख के जवाब में पूरी किताब लिखना पड़ता था और आज ! तब यहां के प्रतिभाशाली शिक्षकों और छात्रों से देश के अन्य विश्वविद्यालयों के शिक्षक भी ईर्ष्या करते थे। अब! ..........
यह किताबें तकदीर नहीं बदलती -
किताबें बोझ नहीं होतीं। संयोग से विश्वविद्यालयों के शिक्षक किताबों को बोझ बनाने पर तुले हुए हैं। थोक के भाव चिंतनहीन किताबें लिखकर विद्यार्थियों का बेड़ा गर्क कर रहे हैं। असल में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर से एसोसिएट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफ़ेसर से प्रोफ़ेसर बनने के लिये कुछ किताब - विताब छप जानी चाहिए, उसी प्रक्रिया के तहत दे किताबें, दे किताबें। किताब नहीं कितबिया लिख रहे हैं। जय हो लेखक देवता की , जय हो।
किताबें बोझ नहीं होतीं। संयोग से विश्वविद्यालयों के शिक्षक किताबों को बोझ बनाने पर तुले हुए हैं। थोक के भाव चिंतनहीन किताबें लिखकर विद्यार्थियों का बेड़ा गर्क कर रहे हैं। असल में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर से एसोसिएट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफ़ेसर से प्रोफ़ेसर बनने के लिये कुछ किताब - विताब छप जानी चाहिए, उसी प्रक्रिया के तहत दे किताबें, दे किताबें। किताब नहीं कितबिया लिख रहे हैं। जय हो लेखक देवता की , जय हो।
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