Thursday, 24 October 2013

आज़ादी के बाद

आज़ादी के बाद क्या मिला? वंशानुगत शासन, पीढ़ी दर पीढ़ी क़र्ज़ चुकाते अभिशप्त किसान, बेरोज़गार युवक, साम्प्रदायिक उन्माद का दंश झेलते हिन्दू और मुसलमान, नौकरशाह के रूप में शोषक बन बैठे अपने ही बीच के आम; अब ख़ास भारतीय , सत्ता सुख के लिए सामाजिक विध्वंशक सियासी दल! सोचिये साथियों सोचिये! 

Wednesday, 23 October 2013

मित्र! यही रोना है कि आज़ाद भारत के इतिहास में जन -पक्ष -धर सरकारें नहीं बनीं। योजनायें खाने पीने वाली ही बनीं।  कमीशन खोरी और रिश्वतखोरी  का लम्बा इतिहास है।  अपने ही लुटेरे हैं। देश के नागरिकों को खेमों में बांटा गया।  संविधान को लहू लुहान किया गया। 
तानाशाही और लोकतंत्र-
हम लोग पहले ही उत्साहित हो जाते हैं। अब देखिये नारा दिया  रहा है कि मोदी लाओ देश बचाओ। ……… पिछली बार था- भाजपा लाओ देश बचाओ। ………. सवाल यह है कि क्या एक व्यक्ति के बहाने देश में प्रजातांत्रिक तानाशाह को नहीं तलाशा जा रहा है! तानाशाही के दौर में एक झूठ को दस बार बोला जाता है ताकि वह सच प्रतीत हो।   

Tuesday, 22 October 2013

रहस्यों में हैं भारत भाग्य विधाता-
मुझे नहीं लगता कि मोदी नए भारत भाग्य विधाता होंगे। वह लोक तंत्र जो पैसे के जोर पर चलता हो,  जहां ग्राम प्रधानी से लेकर सांसदी तक के निर्वाचन में शराब की निर्णायक भूमिका हो; उस लोक तंत्र का भविष्य आसानी से आंका जा सकता है। सवाल मोदी की सभा में भव्य मंच का है।  फ़िल्मी हीरो की तरह उनकी सभाओं के लिए टिकट लगते हैं।  सोच लीजिए पद अर्जित करने के पहले ही यह हाल है जब वे प्रधानमंत्री  बन जायेंगे तब न जाने किस किस पर टिकट लगेगा। साथियों! आप बता सकते हैं कि चुनावी जन सभाओं के पूर्व स्वतंत्र भारत के इतिहास में प्रधान मंत्री पद के किसी उम्मीदवार की किसी भी जन सभा में किसी भी तरह का टिकट लगाया गया हो।