Friday, 20 April 2012

aarakshan ki rajaniti

आरक्षण एक सियासी रोटी का टुकड़ा है-
जो योग्यतम हो उसे अवसर मिले. पढाई लिखाई में सरकारी सहयोग हो लेकिन नौकरियों में आरक्षण! पत्रकारिता में आरक्षण! अध्यापन पेशे में आरक्षण! न्यायपालिका में आरक्षण! सियासत में आरक्षण!.....फिर संविधान अवसर की समानता का छद्म क्यों  रचता है?  सेना में आरक्षण क्यों नहीं है? जब एक भारतीय नागरिक को वोट देने का अधिकार है तो उसे सिर्फ सवर्ण जाति के आधार पर  राजनीति में प्रवेश से क्यों वंचित किया जाता है? आरक्षण जब सिर्फ वंचितों और दलितों लिए था तो अब अल्पसंख्यक आरक्षण के पत्ते क्यों तराशे जा रहे हैं? जबकि भारत में इस्लाम के शासन का मजबूत इतिहास 1192  ईस्वी से लेकर 1857 तक का रहा है. जरा सोचिए तो मित्रों!   

Tuesday, 17 April 2012

mata pita saty hain-

कुछ तो है-
वप से बना है 'बाप' अर्थात बीजवपन करने वाला मतलब पिता. दुनिया में बाप अथवा पिता का  होना अथवा न होना जितना सच है उतना ही सच ईश्वर का होना या न होना भी है. दुनिया में बहुत सी चीजें हम सिर्फ महसूस ही कर सकते है. हम ईश्वर को नहीं देख पाते लेकिन प्रत्येक अच्छाई और बुराई को खुद के साथ घटित होता हुआ महसूस करते हैं. हमारे भीतर देवत्व की कल्पना मन के सुन्दरतम पुरुष छवि की होती है और देवी की कल्पना को माँ के रूप में मूर्त पाते है. तो यह मान लिया जाना चाहिए कि हम अपने विश्वास और आस्थाओं को सुन्दरतम प्रतिरूप में गढ़ते ही हैं.   

man ka sundaratam pratiroop hai-

कुछ तो है-
बपु से बना है 'बाप' अर्थात बीजवपन करने वाला मतलब पिता. दुनिया में बाप अथवा पिता का  होना अथवा न होना जितना सच है उतना ही सच ईश्वर का होना या न होना भी है. दुनिया में बहुत सी चीजें हम सिर्फ महसूस ही कर सकते है. हम ईश्वर को नहीं देख पाते लेकिन प्रत्येक अच्छाई और बुराई को खुद के साथ घटित होता हुआ महसूस करते हैं. हमारे भीतर देवत्व की कल्पना मन के सुन्दरतम पुरुष छवि की होती है और देवी की कल्पना को माँ के रूप में मूर्त पाते है. तो यह मान लिया जाना चाहिए कि हम अपने विश्वास और आस्थाओं को सुन्दरतम प्रतिरूप में गढ़ते ही हैं.   

Monday, 16 April 2012

vamapanth ke samaksh chunauti

भारत में वामपंथ-
हम समझते हैं कि जन जन में व्याप्त ईश्वरीय आस्था और विश्वास को चुनौती देकर हम भारत में वामपंथ को मजबूत कर सकते हैं.ऐसा कदापि संभव नहीं है. आप को उत्तर भारत के उन किसानों और मजदूरों के  बीच काम करना है जिनकी जुबाँ पर राम और कृष्ण की कहानियाँ सर्वथा रहती हैं. जिनके माता-पिता ने अपने माता, पिता  और गुरु का पैर छूया है. भारतीय परिवेश में मार्क्सवादियों को चाहिए कि वे धार्मिक मुदद्दों पर बोलने की बजाय सामाजार्थिक वर्गीय निर्धारण पर बोलें. बात ज्यादा बनती नजर आएगी. दरअसल भारतीय वाम पंथ के साथ समस्या यही है कि वह पहले भगवान को गाली गलौज देता है. अब इसने फैशन का स्वरुप ग्रहण कर लिया है. ईश्वरीय सत्ता को फैशन स्वरुप गरियाने वाले कितने वामपंथी, किसानों और मजदूरों की सहायता के लिए गाँव की तरफ मुखातिब होते हैं! आप सोचिए जिस देश की किसानी प्रकृति अर्थात ( गाँव की भाषा में भगवान ) के भरोसे चलती हो. जहां की फसलें बाढ़ और सूखे की भेंट चढ़ जाती हों, वहां भला इस देश का किसान ईश्वरीय चेतना से कैसे विमुक्त हो सकता है? आप को संशोधित स्वरुप में किसानों और मजदूरों के बीच जाना ही होगा!

bharateey vaamapanth

भारत में वामपंथ-
हम समझते हैं कि जन जन में व्याप्त ईश्वरीय आस्था और विश्वास को चुनौती देकर हम भारत में वामपंथ को मजबूत कर सकते हैं.ऐसा कदापि संभव नहीं है. आप को उत्तर भारत के उन किसानों और मजदूरों के  बीच काम करना है जिनके जुबाँ पर राम और कृष्ण की कहानियाँ सर्वथा रहती हैं. जिनके माता-पिता ने अपने माता, पिता  और गुरु का पैर छूया है. भारतीय परिवेश में मार्क्सवादियों को चाहिए कि वे धार्मिक मुदद्दों पर बोलने की बजाय सामाजार्थिक वर्गीय निर्धारण पर बोलें. बात ज्यादा बनती नजर आएगी. दरअसल भारतीय वाम पंथ के साथ समस्या यही है कि वह पहले भगवान को गाली गलौज देता है. अब इसने फैशन का स्वरुप ग्रहण कर लिया है. ईश्वरीय सत्ता को फैशन स्वरुप गरियाने वाले कितने वामपंथी, किसानों और मजदूरों की सहायता के लिए गाँव की तरफ मुखातिब होते हैं! आप सोचिए जिस देश की किसानी प्रकृति अर्थात ( गाँव की भाषा में भगवान ) के भरोसे चलती हो. जहां की फसलें बाढ़ और सूखे की भेंट चढ़ जाती हों, वहां भला इस देश का किसान ईश्वरीय चेतना से कैसे विमुक्त हो सकता है? आप को संशोधित स्वरुप में किसानों और मजदूरों के बीच जाना ही होगा!