Friday, 16 October 2015

भावनाओं और आस्था की सियासत बंद हो-
पिछले बीस वर्षों में सूबे का किसान तबाही के दौर में है।  गन्ना किसानों की स्थिति नाजुक है। चीनी मिलें बंद हैं. गोरखपुर का खाद कारखाना आज तक बंद है।  विकास के नाम पर कमीशनखोरी वाली सड़कें बनी हैं।  क्या विकास हुआ है ?  ज़रा सोचकर बताएं आप! असल में सरकारें जब विकास नहीं कर पातीं तब वे कभी गोवध और कभी आरक्षण  जैसे मुद्दों पर राग अलाप कर जनता का ध्यान भंग कर वोट बैंक की सियासत करती हैं।  दाल 180 रूपये किलो! खाद्य पदार्थों की कीमत इतनी कि दिहाड़ी मजदूर के लिए स्वप्न नुमा। बसपा के लिए दलित, सपा के लिए यादव और मुसलमान और बी जे पी के लिए हिन्दू। हिन्दू वाली राजनीति अब गाय माता पर आ टिकी है।  गो माता  में  हमारी आस्था है। आस्था का सियासी करण और भावनाओं की राजनीति द्वारा जनहित का अंत सियासी दलों की साजिश है।  

Thursday, 15 October 2015

विनय कांत मिश्र। साथियों! आरक्षण पर सियासत समाप्त की जानी चाहिए।  आरक्षण पर बात करने का मतलब सियासत के चकमे में आ जाना है. जिस प्रदेश में सरकारों ने पिछले बीस वर्षों में आम जनहित का कोई कार्य नहीं किया गया. जातिवाद, धर्मवाद और साम्प्रदायिकता एवं उन्माद के द्वारा वोटों के ध्रुवीकरण की राजनीति की गयी।  उत्तर प्रदेश का युवा बेरोजगार है।  प्रौढ़ सरकारी सहायता के लिए दफ्तरों की चकरघिन्नी घिसने को अभिशप्त है।  प्रदेश के समस्त चयन बोर्डों के अध्यक्षों को उच्च न्यायालय ने अयोग्य घोषित कर दिया है।  अयोग्य व्यक्तियों द्वारा योग्य व्यक्तियों का चयन कैसे हो सकता है ? सवाल इन चयन बोर्डों के कार्यकाल में नियुक्त अभ्यर्थियों को  हटाने का भी है।  क्या गारंटी है कि रिश्वत लेकर चयन नहीं किया गया होगा! सवाल अनिल यादव के कार्यकाल के दौरान इनके द्वारा अर्जित की गई धनराशि को सार्वजनिक किये जाने का भी है। एक ऐसे व्यक्ति के हवाले प्रदेश के प्रतियोगी अभ्यर्थियों को कर  देना, क्या किसी अपराध से कम है! चयन का ही सियासीकरण और जातिकरण पहली बार देखने को मिला! सवाल इन वास्तविक मुद्दों की तरफ देखने का है ! आरक्षण पर बात करना महज सियासी चोंचले बाजी है।